जिस अलॉटी ने जानबूझकर कम एरिया की लीज़ ली, वह पूरे 'ज़ीरो पीरियड' का फ़ायदा नहीं ले सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जिस डेवलपर ने उसे अलॉट की गई ज़मीन के एक छोटे और बिखरे हुए हिस्से की लीज़ ली—यह जानते हुए भी कि बाकी ज़मीन डेवलपमेंट अथॉरिटी के कब्ज़े में नहीं थी—वह पूरे 'ज़ीरो पीरियड' का फ़ायदा नहीं ले सकता, भले ही अथॉरिटी की ही गलती क्यों न हो।
'ज़ीरो पीरियड' एक ऐसी छूट है, जो अटके हुए ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्ट्स के अलॉटीज़ को समय-समय पर जारी सरकारी आदेशों के तहत दी जाती है। जिस अवधि को 'ज़ीरो' घोषित किया जाता है, उस दौरान ब्याज और पेनल्टी ब्याज नहीं लिया जाता और किश्तों को आगे बढ़ा दिया जाता है। 05.12.2019 के सरकारी आदेश के तहत अगर अलॉट की गई ज़मीन का 30% से ज़्यादा हिस्सा प्रभावित है तो यह पूरी ज़मीन (100%) के लिए उपलब्ध होता है।
जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने कहा,
"कोर्ट ने इस बात पर ध्यान दिया कि जब कम ज़मीन के लिए लीज़ एग्रीमेंट हुआ था, तब रेस्पॉन्डेंट-1 के पास बाकी एरिया छोड़ने का विकल्प था। हालांकि, ज़मीन की लोकेशन की जानकारी होने के बावजूद, रेस्पॉन्डेंट-1 ने कम एरिया के लिए लीज़ एग्रीमेंट किया। साथ ही यह भी कहा कि वह YEIDA के पास बाकी एरिया उपलब्ध होने का इंतज़ार करेगा। इसलिए रेस्पॉन्डेंट-1 को अच्छी तरह पता था कि 2012 में लीज़ एग्रीमेंट के समय कुछ एरिया निश्चित रूप से YEIDA के कब्ज़े में नहीं था। इसलिए, रेस्पॉन्डेंट-1 को 'ज़ीरो पीरियड' का फ़ायदा तो दिया जा सकता है, लेकिन पूरा नहीं।"
यमुना एक्सप्रेसवे इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी (YEIDA) ने 2011 में एक रेजिडेंशियल टाउनशिप स्कीम शुरू की थी और 16 अगस्त 2011 को M/s सनवर्ल्ड सिटी प्राइवेट लिमिटेड की अगुवाई वाली चार कंपनियों के कंसोर्टियम को प्लॉट नंबर TS-7, सेक्टर 22D (एरिया 414538 वर्ग मीटर) के लिए अलॉटमेंट लेटर जारी किया। कंसोर्टियम दो बार समय बढ़ाने के बाद भी बाकी प्रीमियम जमा नहीं कर पाया और 1 फरवरी 2012 को अलॉटमेंट रद्द कर दिया गया।
इस कैंसिलेशन को चुनौती दी गई और हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि पेनल्टी ब्याज के साथ अलॉटमेंट की रकम जमा करने पर कैंसिलेशन रद्द माना जाएगा, और YEIDA लीज़ डीड करेगा और बिना विवाद वाली ज़मीन का कब्ज़ा सौंपेगा। अलॉटी को यह तय करना था कि वह अलॉट की गई पूरी ज़मीन पर अपना दावा करेगा या जितनी ज़मीन का कब्ज़ा मिल सकता है, उतने से ही संतुष्ट हो जाएगा।
इसके बाद YEIDA ने कंसोर्टियम को बताया कि सिर्फ़ 2,63,483 वर्ग मीटर ज़मीन ही उपलब्ध है। 20 अगस्त 2012 के एक पत्र में अलॉटी ने कहा कि उसे पूरा प्लॉट चाहिए, लेकिन अभी के लिए वह उपलब्ध ज़मीन की लीज़ ले लेगा और बाकी ज़मीन तब लेगा जब YEIDA को उसका कब्ज़ा मिल जाएगा। 2,63,483 वर्ग मीटर ज़मीन के लिए लीज़ डीड 14 सितंबर 2012 को साइन की गई।
कोई निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ। ज़मीन का कुछ हिस्सा हाई कोर्ट के अंतरिम आदेशों के दायरे में था और लीज़ वाली जगह में मौजूद गाँव सभा की ज़मीन वापस नहीं ली गई। 19 अप्रैल 2017 के एक आदेश से YEIDA ने ज़मीन के एक हिस्से के लिए 16.11.2011 से 31.12.2016 तक 'ज़ीरो पीरियड' की मंज़ूरी दी, लेकिन उन शर्तों का पालन नहीं किया गया। 2019 में अलॉटी ने प्लॉट सरेंडर करने के लिए आवेदन किया; सरेंडर को मंज़ूरी दी गई, लेकिन कंसोर्टियम के एक अन्य सदस्य की आपत्ति और नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में मामला ले जाने के बाद 29 फरवरी 2020 को उस मंज़ूरी को रद्द कर दिया गया। NCLT के सामने दायर वह याचिका 6 मार्च 2025 को वापस ले ली गई।
21 दिसंबर 2023 को राज्य सरकार द्वारा अटके हुए रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स के लिए 'लिगेसी पॉलिसी' की घोषणा के बाद YEIDA ने बकाया राशि का 25% जमा करने की मांग की। अलॉटी ने यूपी अर्बन प्लानिंग एंड डेवलपमेंट एक्ट, 1973 की धारा 41(3) के तहत राज्य सरकार के सामने एक रिविज़न याचिका दायर की।
2 जुलाई 2025 के आदेश से रिविज़न अथॉरिटी ने अलॉटमेंट की तारीख से लेकर उस आदेश की तारीख तक 'ज़ीरो पीरियड' की मंज़ूरी दी और निर्देश दिया कि बाकी ज़मीन की लीज़ डीड साइन की जाए और उसका कब्ज़ा दिया जाए। YEIDA ने उस आदेश को चुनौती दी।
YEIDA ने तर्क दिया कि अलॉटी ने न तो 5 दिसंबर 2019 के सरकारी आदेश के तहत तय दो महीनों के अंदर आवेदन किया और न ही 30 जून 2021 तक काम पूरा करने का लिखित भरोसा दिया था। उसने प्लॉट "जैसा है, जहाँ है" (as is where is) के आधार पर लिया और बिना किसी शर्त के कब्ज़े का सर्टिफ़िकेट साइन किया था; उसे पहले ही लेगेसी पॉलिसी और कोविड के समय के लिए ज़ीरो पीरियड का फ़ायदा दिया जा चुका था। रिविज़नल अथॉरिटी ने अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया था और सरेंडर की कार्यवाही को नज़रअंदाज़ किया।
अलॉटी की तरफ़ से कहा गया कि कब्ज़ा सिर्फ़ कागज़ों पर और बिखरी हुई हालत में दिया गया, वहां अभी भी कोई अप्रोच रोड नहीं थी और सरेंडर की प्रक्रिया कभी पूरी नहीं हुई, क्योंकि ब्रोशर में दी गई शर्तें पूरी नहीं की गईं। तर्क दिया गया कि लीज़ डीड के क्लॉज़ 21 के तहत YEIDA को ही पेरिफेरल डेवलपमेंट (आस-पास का विकास) करना था, और वह "जैसा है, जहां है" वाले क्लॉज़ का सहारा नहीं ले सकती थी, क्योंकि उसने ऐसी ज़मीन अलॉट की थी जो न तो उसके मालिकाना हक़ में थी और न ही उसके कब्ज़े में।
कोर्ट ने अलॉटी की इस दलील को खारिज किया कि उसे बाद में पता चला कि गाँव सभा की ज़मीन वापस नहीं ली गई; कोर्ट ने कहा कि लीज़ करते समय उसे उपलब्ध ज़मीन के दायरे का पता था, और कम एरिया के लिए ही नक्शा भी मंज़ूर किया गया।
"इसलिए ज़मीन की असल स्थिति के बारे में पूरी तरह अनजान होने का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसलिए सिर्फ़ YEIDA की चूक के आधार पर ज़ीरो पीरियड का फ़ायदा नहीं माँगा जा सकता।"
कोर्ट ने आगे कहा कि हालाँकि YEIDA ने लीज़ से पहले साफ़ कर दिया कि सिर्फ़ 2,63,483 वर्ग मीटर ज़मीन उपलब्ध है, लेकिन उसने यह नहीं बताया कि वह एरिया भी एक साथ (लगातार) नहीं है।
"YEIDA का व्यवहार भी ईमानदारी भरा नहीं है। उन्हें ज़मीन की प्रकृति के बारे में पता था और यह भी पता था कि वे पूरी ज़मीन सौंपने की स्थिति में नहीं हैं।"
2019 की पॉलिसी पर कोर्ट ने कहा कि इसका फ़ायदा उस अलॉटी को नहीं दिया जा सकता, जिसने उस समय इसके लिए आवेदन नहीं किया था और जून 2021 तक प्रोजेक्ट पूरा करने का कोई अंडरटेकिंग (लिखित भरोसा) नहीं दिया। कोर्ट ने कहा कि इससे मामला खत्म नहीं होता, क्योंकि 27 अक्टूबर 2023 के बाद के सरकारी आदेश में भी वैसी ही शर्तें थीं और ज़ीरो पीरियड की गणना का वही तरीका अपनाया गया। कोर्ट ने कहा कि अलॉटी (जिसे ज़मीन अलॉट की गई) इसके तहत विचार किए जाने का हकदार है, और 2019 की पॉलिसी पर YEIDA की आपत्तियां इसमें बाधा नहीं बन सकती ।
रिविजनल अथॉरिटी के सामने रखी गई रिपोर्ट पर गौर करते हुए - जिसमें बताया गया कि 1,26,470 वर्ग मीटर ज़मीन कानूनी अड़चनों से प्रभावित थी (जो अलॉट की गई कुल ज़मीन का 30% से ज़्यादा है) और दोनों पक्ष अपनी ज़िम्मेदारियां पूरी करने में नाकाम रहे थे - कोर्ट ने कहा कि अलॉटी 2023 की स्कीम का फ़ायदा लेने का हकदार है, लेकिन चूंकि उसने जानबूझकर कम ज़मीन की लीज़ ली थी, इसलिए उसे पूरा फ़ायदा नहीं मिल सकता।
आगे कहा गया,
"ज़ीरो पीरियड का फ़ायदा देने में कोई गैर-कानूनी बात नहीं है। हालांकि यह निर्देश दिया जाता है कि रेस्पॉन्डेंट-1 (अलॉटी) इसका कम से कम 25% फ़ायदा घर खरीदारों तक पहुंचाए और चूंकि अब पूरी ज़मीन उपलब्ध है, इसलिए याचिकाकर्ता-YEIDA बाकी ज़मीन की लीज़ की प्रक्रिया एक महीने के भीतर पूरी करेगा ताकि निर्माण कार्य शुरू हो सके।"
कोर्ट ने कहा कि अगर अलॉटी बाकी ज़मीन की लीज़ का एग्रीमेंट पूरा नहीं करवा पाता है, या लीज़ और पूरी ज़मीन मिलने के नौ महीने के भीतर कम से कम 25% निर्माण कार्य पूरा नहीं कर पाता है तो यह फ़ायदा खत्म हो जाएगा। दोनों पक्षों को निर्देश दिया गया कि YEIDA के अंतिम निर्णय पर पहुंचने से पहले वे अपनी-अपनी गणनाओं (Calculations) का आदान-प्रदान करें, साथ ही दोनों पक्षों को समय बढ़ाने के लिए आवेदन करने की छूट भी दी गई।
इसके साथ ही रिट याचिका का निपटारा कर दिया गया।
Case Title: Yamuna Expressway Industrial Development Authority v. Ms Sunworld City Pvt. Ltd. And Another