सिर्फ़ बिज़नेस कॉम्पिटिशन की वजह से किसी दूसरे पेट्रोल पंप को मिली मंज़ूरी को चुनौती देने का अधिकार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी मौजूदा पेट्रोल पंप मालिक को किसी दूसरे पेट्रोल पंप को मिली मंज़ूरी या 'नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' (NOC) को चुनौती देने का अधिकार नहीं है, सिर्फ़ इसलिए कि नए पेट्रोल पंप के खुलने से उसके बिज़नेस की आर्थिक स्थिति पर बुरा असर पड़ सकता है।
जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच ने बहराइच में मौजूद एक पेट्रोल पंप के मालिक की याचिका को खारिज करते हुए यह बात कही। मालिक ने अपने पेट्रोल पंप के पास एक और पेट्रोल पंप खोलने के लिए दी गई मंज़ूरी और NOC को चुनौती दी थी।
बेंच ने अपने आदेश में कहा,
"याचिकाकर्ताओं को प्राइवेट रेस्पॉन्डेंट (प्रतिवादी) से कॉम्पिटिशन का डर है और उन्हें लगता है कि उनकी कमाई कम हो सकती है, लेकिन संविधान के आर्टिकल 226 के तहत कोर्ट किसी प्राइवेट पार्टी को कानून के मुताबिक बिज़नेस करने से नहीं रोक सकता, सिर्फ़ इस आधार पर।"
मामले की संक्षिप्त जानकारी
याचिकाकर्ता (M/S D.K. Automobiles) बहराइच ज़िले में इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन का पेट्रोल पंप चलाता है। वह पास के ही एक प्लॉट पर प्राइवेट रेस्पॉन्डेंट को नया पेट्रोल पंप अलॉट किए जाने से नाराज़ था।
उसने डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट द्वारा 9 फरवरी, 2026 को जारी मंज़ूरी के आदेश और सिटी मजिस्ट्रेट द्वारा 13 फरवरी, 2026 को जारी NOC को चुनौती दी।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि नया पेट्रोल पंप खोलना स्टेट रोड पर फ्यूल स्टेशन की लोकेशन, लेआउट और एक्सेस से जुड़े नियमों और गाइडलाइंस के खिलाफ़ है।
2022 की गाइडलाइंस के क्लॉज़ 3.1 और 3.2 का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि फ्यूल स्टेशनों के बीच 300 मीटर (बिना डिवाइडर वाली सड़क के मामले में) और 1,000 मीटर (डिवाइडर वाली सड़क के मामले में) की दूरी होनी चाहिए, सिवाय उस स्थिति के जब 7 मीटर चौड़ी सर्विस लेन से एक्सेस दिया गया हो।
याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि पास-पास दो पेट्रोल पंप होने से मौजूदा पेट्रोल पंप की आर्थिक स्थिति पर बुरा असर पड़ेगा। इसलिए पब्लिक पॉलिसी के तौर पर इसकी इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए। दूसरी ओर, प्राइवेट प्रतिवादियों (राज्य के अधिकारियों और रिलायंस बीपी मोबिलिटी लिमिटेड) ने रिट याचिका की स्वीकार्यता को चुनौती दी।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों जस भाई मोती भाई देसाई बनाम रोशन कुमार (1975), नगर राइस एंड फ्लोर मिल्स बनाम एन.टी. गौड़ा (1970) और मिथिलेश गर्ग बनाम भारत संघ का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि कोई प्रतिद्वंद्वी व्यवसायी केवल किसी प्रतियोगी को बाजार में आने से रोकने के लिए रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं कर सकता है।
बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक पुराने आदेश का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया कि पेट्रोल पंप मालिक के पास किसी दूसरे ऑपरेटर को अपने पेट्रोल पंप के पास कारोबार शुरू करने से रोकने का "कोई मौलिक या वैधानिक अधिकार" नहीं है।
इसके अनुसार, बेंच ने माना कि याचिकाकर्ता के पास "मौजूदा रूप में इस याचिका को बनाए रखने का कोई अधिकार (लोकस स्टैंडी) नहीं है" और यह रिट याचिका सुनवाई योग्य नहीं थी।
कोर्ट ने आगे कहा कि प्रस्तावित पेट्रोल-पंप ऑपरेटरों का अपना आउटलेट स्थापित करने का अधिकार उतना ही "मौलिक अधिकार" था जितना कि मौजूदा याचिकाकर्ता का।
कोर्ट ने माना कि जब तक नए ऑपरेटर याचिकाकर्ता के संबंधित मौलिक अधिकार को नुकसान पहुंचाए बिना अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हैं, तब तक मौजूदा पेट्रोल पंप मालिक को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है, ऐसा कहा जा सकता है।
कोर्ट ने उसी पेट्रोल आउटलेट को खोलने से जुड़ी पहले की PIL नंबर 293/2026 पर भी ध्यान दिया।
उस मामले में कोर्ट को बताया गया कि गाइडलाइंस में बदलाव किया गया और दूरी की पाबंदी वहां लागू नहीं होगी, जहां आने-जाने का रास्ता कम से कम 7 मीटर चौड़ी कॉमन सर्विस रोड से हो।
कोर्ट को यह भी बताया गया कि 7 मीटर की सर्विस रोड बना दी गई और जब तक ज़रूरी सड़क नहीं बन जाती, तब तक नए पेट्रोल पंप को चलाने की आखिरी मंज़ूरी नहीं दी जाएगी।
बेंच ने देखा कि पहले की PIL में भी इसी आपत्ति पर विचार किया गया और कहा कि याचिकाकर्ता ने मौजूदा रिट याचिका में वही आधार बनाए रखते हुए सिर्फ़ "अपनी मांग का तरीका बदला" है।
इसलिए कोर्ट ने मौजूदा याचिका को "कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग" बताया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि नए पेट्रोल आउटलेट से उसके कारोबार पर बुरा असर पड़ेगा।
कोर्ट ने कहा,
"...हमें लगता है कि मौजूदा याचिका का मकसद असल में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को खत्म करना है और यह एकाधिकारवादी (Monopolistic) प्रकृति की है। किसी भी हाल में यह कोर्ट याचिकाकर्ता के कारोबार की सेहत की गारंटी देने वाली बीमा कंपनी की तरह काम नहीं कर सकता।"
इसके बाद हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज की।
Case title - M/s D.K.Automobiles Thru. Sole Proprietor Smt.Shradha Agarwal and another vs Union of India,Thru. Secy. Ministry of Petroleum and Natural Gas New Delhi and 7 others 2026 LiveLaw (AB) 586