मुश्किल समय में माता-पिता से मदद मिलने पर भी पति अपनी पत्नी के भरण-पोषण की कानूनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-06-28 12:33 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी को मुश्किल समय में उसके माता-पिता से आर्थिक मदद मिलने के आधार पर CrPC की धारा 125 के तहत पति से भरण-पोषण पाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

जस्टिस गरिमा प्रसाद की बेंच ने कहा कि पत्नी के माता-पिता की आय को पत्नी की आय नहीं माना जा सकता। साथ ही माता-पिता की मदद पति की पत्नी के भरण-पोषण की कानूनी ज़िम्मेदारी का विकल्प नहीं हो सकती।

बेंच ने यह टिप्पणी बुलंदशहर की फैमिली कोर्ट के दिसंबर 2023 के आदेश के खिलाफ पत्नी और उसके 2 नाबालिग बच्चों द्वारा दायर क्रिमिनल रिविज़न याचिका को मंज़ूरी देते हुए की।

फैमिली कोर्ट ने पत्नी के भरण-पोषण के दावे को पूरी तरह से खारिज किया, जबकि प्रत्येक बच्चे को भरण-पोषण के तौर पर 3,000 रुपये प्रति माह देने का आदेश दिया।

मामले का संक्षिप्त विवरण

रिविज़न याचिकाकर्ता-पत्नी ने शुरू में CrPC की धारा 125 के तहत अपने पति से भरण-पोषण की मांग करते हुए आवेदन दायर किया। उसने आरोप लगाया कि शादी के बाद उसे और उसके परिवार के सदस्यों द्वारा परेशान किया गया, ताने मारे गए और क्रूरता का शिकार बनाया गया।

आरोप था कि उसके पति (विपक्षी पार्टी नंबर 2), जो सेना के रिटायर्ड कर्मचारी हैं, उसने उसके साथ वैवाहिक संबंध खत्म कर दिए और बाद में उसे बताया कि उन्होंने दूसरी महिला से शादी कर ली।

अंत में, उसका कहना था कि जनवरी 2020 में उसके साथ मारपीट की गई और उसे बच्चों के साथ ससुराल से निकाल दिया गया। तब से वह अपने माता-पिता के घर रह रही है, उसकी आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है और वह अपने माता-पिता पर निर्भर है।

दूसरी ओर, पति ने दलील दी कि पत्नी बिना किसी ठोस कारण के ससुराल छोड़कर चली गई और कथित तौर पर कुछ लोगों के साथ उसके अवैध संबंध थे।

उन्होंने आगे कहा कि सेना में अपनी सेवा के दौरान, नवंबर 2020 में रिटायरमेंट तक उनकी सैलरी से 11,303 रुपये प्रति माह काटकर उनकी पत्नी और बच्चों को दिए जाते थे।

अंत में, उन्होंने दावा किया कि रिटायरमेंट के बाद उन्हें लगभग 21,025 रुपये प्रति माह पेंशन मिलती है और आय का कोई अन्य स्रोत नहीं है। दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद फैमिली कोर्ट ने पत्नी के मामले पर यकीन नहीं किया, क्योंकि वह दहेज की मांग, मारपीट या दूसरी शादी की खास घटनाओं को साबित नहीं कर पाई।

कोर्ट ने यह भी कहा कि दोनों पक्षों के आरोप साबित नहीं हुए और पत्नी क्रूरता साबित करने में नाकाम रही।

इस आधार पर कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि वह बिना किसी ठोस वजह के अलग रह रही है, इसलिए गुज़ारा-भत्ता पाने की हकदार नहीं है।

हाईकोर्ट के सामने दलीलें

हाईकोर्ट के सामने पत्नी (याचिकाकर्ता) का तर्क था कि फैमिली कोर्ट ने CrPC की धारा 125 के मकसद के उलट तरीका अपनाया, क्योंकि उसने मामले का फैसला ऐसे किया जैसे कि यह क्रूरता और व्यभिचार (adultery) पर कोई पूरा वैवाहिक मुकदमा हो।

उसने तर्क दिया कि CrPC की धारा 125 के तहत कार्यवाही संक्षिप्त (summary) होती है। इसका मकसद बेसहारा होने से बचाना और उपेक्षित आश्रितों के लिए बुनियादी आर्थिक सुरक्षा और गुज़ारा सुनिश्चित करना है।

यह भी कहा गया कि फैमिली कोर्ट ने खुद दर्ज किया कि पति (विपक्षी संख्या 2) ने नवंबर 2020 के बाद पत्नी और बच्चों को कोई गुज़ारा-भत्ता नहीं दिया, फिर भी उसने गलत तरीके से यह निष्कर्ष निकाला कि पत्नी उपेक्षित नहीं थी और उसके पास अलग रहने की कोई ठोस वजह नहीं थी।

हाईकोर्ट की टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने विवादित फ़ैसले और दोनों पक्षों के रुख़ पर विचार करते हुए कहा कि पत्नी को गुज़ारा-भत्ता (मेंटेनेंस) देने से इनकार करने के लिए फ़ैमिली कोर्ट ने जो तर्क दिया, वह सही नहीं है।

जस्टिस प्रसाद ने साफ़ किया कि CrPC की धारा 125 के तहत कार्यवाही में कोर्ट को क्रूरता के पक्के सबूत की ज़रूरत नहीं होती, जैसा कि आपराधिक मुक़दमे या वैवाहिक विवाद के मामले में ज़रूरी होता है।

बेंच ने कहा,

"जांच का दायरा सीमित है। कोर्ट को यह देखना होता है कि क्या पत्नी के पास अलग रहने का कोई वाजिब कारण है और क्या पति के पास साधन होने के बावजूद उसने पत्नी का भरण-पोषण करने में लापरवाही बरती है या इनकार किया है। यहाँ 'बिना किसी शक के साबित करने' (standard of proof beyond reasonable doubt) का नियम लागू नहीं होता। न ही कोर्ट CrPC की धारा 125 के तहत कार्यवाही को वैवाहिक दुर्व्यवहार से जुड़े हर आरोप और जवाबी-आरोप के ट्रायल में बदल सकता है।"

बेंच ने आगे कहा कि ये बातें मानी हुईं कि दोनों पक्षों के बीच गंभीर वैवाहिक कलह थी, पत्नी और बच्चे अलग रह रहे थे और पति ने क्रॉस-एग्जामिनेशन में माना कि नवंबर 2020 के बाद उसने कोई गुज़ारा-भत्ता नहीं दिया; ये बातें यह दिखाने के लिए काफ़ी थीं कि पत्नी बिना किसी कारण के अलग नहीं रह रही थी और उसे नज़रअंदाज़ किया जा रहा था।

कोर्ट ने यह भी कहा कि जहां पति ने तलाक़ की कार्यवाही शुरू की हो, जहां दोनों पक्ष गंभीर वैवाहिक कलह के कारण अलग-अलग रह रहे हों और जहां पत्नी के पास दो नाबालिग बच्चों की कस्टडी हो, वहां यह आसानी से नहीं कहा जा सकता कि वह बिना किसी ठोस कारण के अलग रह रही है।

पत्नी पर पति के व्यभिचार (adultery) के आरोपों पर बेंच ने टिप्पणी की कि यह साबित करने के लिए कोई स्वतंत्र गवाह, दस्तावेज़ या भरोसेमंद सबूत पेश नहीं किया गया कि वह व्यभिचार में रह रही थी।

कोर्ट ने कहा कि CrPC की धारा 125(4) के तहत रोक तभी लागू होती है जब यह साबित हो जाए कि पत्नी व्यभिचार में रह रही है। कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि सिर्फ़ आरोपों, शक या चरित्र हनन के आधार पर पत्नी को गुज़ारा-भत्ते से वंचित नहीं किया जा सकता।

पत्नी की आय के सवाल पर कोर्ट ने ज़ोर दिया कि शारीरिक रूप से सक्षम पति अपनी आय छिपाकर या पत्नी को उसके माता-पिता से मिल रही मदद का हवाला देकर अपनी पत्नी और बच्चों के भरण-पोषण की कानूनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकता।

बेंच ने आगे कहा कि जब कोर्ट ने यह मान लिया कि पत्नी की पर्याप्त स्वतंत्र आय का कोई सबूत नहीं है तो उसे गुज़ारा-भत्ता देने से इनकार करने का कोई औचित्य नहीं था। कोर्ट ने फ़ैमिली कोर्ट के प्रति बच्चे के लिए 3,000 रुपये प्रति महीने के फ़ैसले पर भी सवाल उठाए और इसे "पूरी तरह से अपर्याप्त और अवास्तविक" बताया।

कोर्ट ने कहा कि यह रकम स्कूल जाने वाले बच्चों के खाने-पीने, कपड़ों, पढ़ाई-लिखाई, किताबों, आने-जाने और मेडिकल ज़रूरतों जैसे कम से कम ज़रूरी खर्चों को पूरा करने के लिए काफ़ी नहीं थी।

इसके अलावा, क्योंकि पति अपनी आर्थिक संपत्ति की पूरी जानकारी देने में नाकाम रहा और परिवार की खेती-बाड़ी की ज़मीन और डेयरी के काम से जुड़ी आय के रिकॉर्ड छिपाए, इसलिए कोर्ट ने ज़रूरी जानकारी छिपाने के लिए उसके ख़िलाफ़ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला, जबकि सबसे अच्छे सबूत उसी के पास थे।

इस तरह विवादित आदेश में बदलाव करते हुए हाईकोर्ट ने पति को पत्नी को हर महीने 5,000 रुपये का गुज़ारा-भत्ता देने का निर्देश दिया। साथ ही दो नाबालिग बच्चों के लिए गुज़ारा-भत्ते की रकम को भी बढ़ाकर 4,000 रुपये प्रति बच्चा कर दिया।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अगर रिटायर हो चुके सेना के जवान पेमेंट करने में चूक करते हैं तो पत्नी और बच्चे सक्षम कोर्ट में अर्ज़ी देकर सीधे उनकी मिलिट्री पेंशन और दूसरी कानूनी तौर पर मिलने वाली रकम से गुज़ारा-भत्ते की रकम कटवाने और वसूलने की मांग कर सकते हैं।

Case title - Vikas Sharma vs. State of U.P. and another 2026 LiveLaw (AB) 337

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