इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपनी 'फुल कोर्ट मीटिंग्स' (सभी जजों की बैठक) में चर्चा की गुणवत्ता पर सवाल उठाए। कोर्ट ने देखा कि इन बैठकों की कार्यवाही में अलग-अलग जजों की सहमति या असहमति को रिकॉर्ड नहीं किया जाता है।

कोर्ट ने यह भी महसूस किया कि पिछली दो फुल कोर्ट मीटिंग्स "सरकार द्वारा विश्वास मत के दौरान अपने सदस्यों को व्हिप जारी करके नियंत्रित करने" के तरीके से "पहले से तय (स्टेज-मैनेज्ड)" लग रही हैं।

जस्टिस विनोद दिवाकर की बेंच ने 4 मामलों से जुड़े एक फैसले में यह बात कही। इन मामलों में निचली अदालतों में देरी, ज़मानत से जुड़े निर्देशों का पालन न होने और न्यायिक अनुशासन जैसे बड़े मुद्दों को उठाया गया।

हाईकोर्ट के प्रशासनिक कामकाज की समीक्षा करते हुए कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट नियम, 1952 के तहत फुल कोर्ट की भूमिका पर ध्यान दिया। इसमें बैठकों की आवृत्ति, उसके सामने रखे जाने वाले मामले और चर्चाओं को रिकॉर्ड करने का तरीका शामिल है।

जस्टिस दिवाकर ने सवाल किया कि क्या फुल कोर्ट चर्चा और अलग-अलग जजों की राय को आपसी मान्यता देने के लिए एक सार्थक सामूहिक मंच (कोलेजिएट फोरम) के तौर पर काम कर रहा है।

10 सालों में सिर्फ़ 16 फुल कोर्ट मीटिंग्स

इलाहाबाद हाईकोर्ट नियम, 1952 के अध्याय III के नियम 8 का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि चीफ जस्टिस को गर्मियों की छुट्टियों को छोड़कर हर तीन महीने में एक बार फुल कोर्ट मीटिंग बुलानी होती है।

नियम में यह भी कहा गया कि अगर ऐसी बैठक के लिए कम से कम पाँच जज अनुरोध करते हैं, तो अनुरोध के एक हफ़्ते के भीतर बैठक बुलानी ज़रूरी है।

हालाँकि, कोर्ट ने पाया कि पिछले दस सालों में माननीय चीफ जस्टिस द्वारा केवल 16 फुल कोर्ट मीटिंग्स बुलाई गई।

कोर्ट ने यह भी देखा कि इस दौरान असल में फुल कोर्ट के सामने क्या-क्या मामले रखे गए।

कोर्ट ने पाया कि पिछली 10 फुल कोर्ट मीटिंग्स के एजेंडे की समीक्षा से पता चला कि सीनियर एडवोकेट का दर्जा देने का मामला दो बार फुल कोर्ट के सामने रखा गया। फ़ैसले में कहा गया कि उन मौकों में से एक पर मंज़ूर किए गए पदों को न्यायिक पक्ष में चुनौती दी गई, और यह मामला लखनऊ बेंच के पास लंबित है।

बाकी एजेंडा आइटम न्यायिक अधिकारियों की सेवा शर्तों से जुड़े हैं।

हालांकि, कोर्ट ने यह टिप्पणी की:

"इस दौरान सामान्य नीति का कोई मामला, कोर्ट की शक्तियों और दर्जे को प्रभावित करने वाला कोई मामला और न्याय प्रशासन पर कोई वार्षिक रिपोर्ट 'फुल कोर्ट' के सामने नहीं रखी गई।"

इसमें यह भी कहा गया कि न्याय प्रशासन पर सामान्य वार्षिक रिपोर्ट न तो 'फुल कोर्ट' के सामने रखी गई और न ही नियमों के तहत सरकार को भेजी गई।

कोर्ट ने कहा कि यह हाईकोर्ट में कामकाज के मौजूदा तरीके और प्रशासनिक संस्कृति को दिखाने के लिए काफ़ी है।

अपनी चर्चा के एक फ़ुटनोट में कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण बात कही:

"ऐसा आभास दिया गया कि इस कोर्ट की पिछली दो 'फुल कोर्ट' बैठकें उसी तरह से आयोजित की गईं जैसे सरकार अविश्वास प्रस्ताव के दौरान अपने सदस्यों को व्हिप जारी करके नियंत्रित करती है। यह एक जज के पद की गरिमा का अपमान है।"

जस्टिस दिवाकर ने यह भी टिप्पणी की कि 'फुल कोर्ट' की कार्यवाही में अलग-अलग जजों की सहमति या असहमति दर्ज नहीं की जाती है।

बेंच ने कहा,

"जब कोई सामूहिक निकाय अपने सदस्यों के विचारों को दर्ज किए बिना कोई प्रस्ताव पारित करता है तो जिस विचार-विमर्श के लिए वह मंच बना है, उसका कोई सबूत रिकॉर्ड में नहीं मिलता"।

'फुल कोर्ट' का उद्देश्य

'फुल कोर्ट' बुलाने के पीछे के संस्थागत उद्देश्य को समझाते हुए सिंगल जज ने टिप्पणी की कि 'फुल कोर्ट' बुलाने का आधार जजों के व्यक्तिगत विचारों को 'आपसी सम्मान' देने के सिद्धांत पर टिका है।

इसमें कहा गया कि 'फुल कोर्ट' केवल एक ऐसा मंच नहीं है, जहां औपचारिक रूप से अंतिम प्रस्ताव दर्ज किया जाता है। कोर्ट के अनुसार, इसका उद्देश्य सामूहिक विचार-विमर्श के माध्यम से सदस्यों के व्यक्तिगत विचारों को मान्यता देना है।

इसलिए बेंच ने कहा कि जब अलग-अलग जजों के विचारों को दिखाए बिना कोई प्रस्ताव दर्ज किया जाता है तो उस मंच का संस्थागत उद्देश्य उसके रिकॉर्ड में पूरी तरह से नहीं झलकता है।

इसने देखा कि नियमों की अनदेखी करना और 'फुल कोर्ट' की बैठकों में व्यक्तिगत सहमति या असहमति दर्ज न करना किसी जज की व्यक्तिगत पहचान और गरिमा के प्रति अनादर की धारणा पैदा कर सकता है।

जस्टिस दिवाकर ने यह भी कहा कि इन कमेटियों, या माननीय चीफ जस्टिस द्वारा बनाई गई किसी भी कमेटी की कार्यवाही का ब्यौरा कभी भी 'फुल कोर्ट' को नहीं बताया गया, जिससे ऐसा लगता है कि उनका कामकाज हाई कोर्ट से अलग और स्वतंत्र है।

अदालत ने कहा,

"नतीजतन, हाईकोर्ट के अंदर ऐसे मुद्दों को उठाने के लिए कोई संस्थागत मंच नहीं है, सिवाय इसके कि उन्हें न्यायिक आदेशों के ज़रिए उठाया जाए। वरना, जजों को ऐसे माहौल में निराशाजनक पेशेवर ज़िंदगी बितानी पड़ेगी, जो न तो न्यायिक कामकाज के लिए सही है और न ही इस महान संस्थान की गरिमा के अनुरूप है।"

अदालत ने चेतावनी दी कि अगर ऐसे मामलों को संयम से नहीं निपटाया गया, तो इससे संस्थागत अनुशासन कमज़ोर हो सकता है और कानून के शासन को नुकसान पहुँच सकता है।

अदालत ने आगे कहा कि व्यक्तिगत अपमान या पहचान से जुड़ी निजी सोच के आधार पर प्रतिक्रिया देने से "मनमानापन, पक्षपात और स्थापित कानूनी नियमों से विचलन" हो सकता है, जो प्रक्रियात्मक निष्पक्षता और प्राकृतिक न्याय के खिलाफ होगा।

इससे व्यक्तिगत विचारों को दर्ज करना सिर्फ़ प्रशासनिक कागज़ी कार्रवाई का मामला नहीं रह जाता: अदालत इसे संस्थागत अनुशासन, प्रक्रियात्मक निष्पक्षता और न्यायिक पद की गरिमा से जोड़ती है।

अदालत ने कहा कि औपचारिक समीक्षा व्यवस्था न होने पर, "जज को परखने" की ज़िम्मेदारी अनौपचारिक रूप से संस्थान पर ही आ जाती है - "फुल-कोर्ट विचार-विमर्श, आंतरिक जाँच और तेज़ी से बढ़ती सार्वजनिक छानबीन" के ज़रिए।

हालांकि, अदालत ने चेतावनी दी कि ऐसी बिखरी हुई जवाबदेही नाकाफ़ी हो सकती है और "स्पष्ट रूप से बताए गए प्रशासनिक मानक, फ़ैसले का कारण बताने की बाध्यता और नियमों पर आधारित प्रक्रिया पर टिकी सीमित लेकिन सार्थक समीक्षा व्यवस्था" की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।

इसलिए फ़ैसले में 'फुल कोर्ट' को संस्थान के आंतरिक विचार-विमर्श और जवाबदेही के अपने ही तंत्रों में से एक के तौर पर अहमियत दी गई।

हाईकोर्ट प्रशासन के चीफ जस्टिस-केंद्रित मॉडल में 'बदलाव'

अपने 80 पन्नों के फ़ैसले में जस्टिस दिवाकर ने हाईकोर्ट प्रशासन के चीफ जस्टिस-केंद्रित मॉडल में 'बदलाव' की भी बात कही, क्योंकि उन्होंने ज़्यादा विचार-विमर्श वाले, संस्थागत रूप से संतुलित और सबकी भागीदारी वाले नज़रिए के साथ-साथ मज़बूत संस्थागत जवाबदेही की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट लेवल पर जजों के बीच न्यायिक कामकाज के बंटवारे से जुड़े मामलों पर "सोच-समझकर और मिल-जुलकर बातचीत" की बहुत कम गुंजाइश होती है।

कोर्ट ने गौर किया कि काम का बंटवारा परफॉर्मेंस से जुड़ा नहीं है और अगले लेवल पर प्रमोशन या पदोन्नति के लिए कोई "तय, लिखित और नोटिफाइड नियम" नहीं है।

कोर्ट ने आगे कहा:

"सबसे बड़ी बात यह है कि एडमिनिस्ट्रेटिव लेवल पर लिए गए फैसलों के लिए कोई जवाबदेही तय नहीं होती और न ही किसी स्वतंत्र एजेंसी से इनका ऑडिट होता है, जिससे पक्षपात, भेदभाव या बाहरी वजहों से लिए गए फैसलों के मामलों में जवाबदेही तय की जा सके।"

कोर्ट ने कहा कि इन मुद्दों का कुल मिलाकर असर यह होता है कि "न्यायिक चरित्र के निर्माण के लिए ज़रूरी माहौल कमज़ोर पड़ता है"। कोर्ट ने यह भी कहा कि "बिना किसी रोक-टोक और बिना किसी गाइडलाइन वाली मनमानी शक्तियों का न्याय-प्रशासन पर बहुत बुरा असर पड़ा है"।

Case title - Pappu Met @ Pappu vs. State of U.P. and Another

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