नाबालिग से दुष्कर्म मामलों में जमानत सुनवाई पीड़ित की गैरहाजिरी में भी हो सकती है, यदि उसे नोटिस दिया गया हो: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 483(2) की व्याख्या करते हुए महत्वपूर्ण फैसला दिया। अदालत ने कहा कि नाबालिग से दुष्कर्म जैसे मामलों में जमानत अर्जी पर सुनवाई केवल इसलिए नहीं रोकी जा सकती, क्योंकि पीड़ित या शिकायतकर्ता अदालत में उपस्थित नहीं हुआ, बशर्ते उसे सुनवाई की सूचना विधिवत दे दी गई हो।
जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की एकलपीठ ने कहा कि कानून का उद्देश्य शिकायतकर्ता को सुनवाई का अवसर देना है। इसके बाद अदालत में उपस्थित होना या न होना उसकी अपनी इच्छा पर निर्भर करता है।
अदालत ने कहा,
“शिकायतकर्ता को सुनवाई का अवसर प्रदान करना अनिवार्य है लेकिन उसके बाद अदालत में उपस्थित होना या नहीं होना उसकी अपनी इच्छा का विषय है।”
मामला एक 20 वर्षीय युवक की जमानत याचिका से जुड़ा है जिस पर सामूहिक दुष्कर्म, आपराधिक धमकी, POCSO Act और SC/ST Act की धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज है।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से प्रारंभिक आपत्ति उठाई गई। दलील दी गई कि BNSS की धारा 483(2) के तहत नाबालिग से दुष्कर्म के मामलों में जमानत सुनवाई के समय शिकायतकर्ता या उसके अधिकृत प्रतिनिधि की उपस्थिति आवश्यक है। चूंकि शिकायतकर्ता को सूचना दिए जाने के बावजूद उसकी ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ, इसलिए जमानत अर्जी पर सुनवाई नहीं की जा सकती।
हालांकि हारेकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने पॉक्सो नियम, 2020 और वर्ष 2021 के एक पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि स्थानीय पुलिस या विशेष किशोर पुलिस इकाई का दायित्व केवल इतना है कि वह पीड़ित और उसके अभिभावक को सुनवाई की जानकारी दे।
अदालत ने कहा कि जब सूचना दिए जाने के बावजूद शिकायतकर्ता उपस्थित नहीं होता तो यह माना जाएगा कि वह राज्य की ओर से उपस्थित लोक अभियोजक या अपर शासकीय वकील पर भरोसा कर रहा है, जो उसके पक्ष को अदालत के समक्ष रखेंगे।
इसलिए केवल शिकायतकर्ता की अनुपस्थिति के आधार पर जमानत अर्जी की सुनवाई नहीं रोकी जा सकती।
मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए अदालत ने कहा कि 14 वर्षीय पीड़िता ने अपनी FIR में आरोप लगाया कि दो लोग उसे खेत में ले गए, जहां एक आरोपी ने उसका मुंह बंद किया और दूसरे ने दुष्कर्म किया।
हालांकि, मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज बयान में पीड़िता ने कहा कि वह दूसरे व्यक्ति को पहचानती नहीं है।
अदालत ने यह भी नोट किया कि मेडिकल टेस्ट में पीड़िता के शरीर पर किसी प्रकार की चोट नहीं पाई गई। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार हाइमन सुरक्षित था तथा कपड़े फटे या दागदार नहीं थे।
साथ ही, जांच पूरी हो चुकी थी लेकिन मेडिकल नमूनों की पैथोलॉजिकल रिपोर्ट अभी केस डायरी में उपलब्ध नहीं है।
इन परिस्थितियों आरोपी की लगभग 20 वर्ष आयु, उसके खिलाफ किसी आपराधिक इतिहास के अभाव तथा फरवरी 2026 से जेल में होने को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने उसे जमानत दी।