गवाहों के मुकरने के बावजूद मृत्यु पूर्व बयान के आधार पर पति और सास-ससुर की हत्या की सजा बरकरार: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष के सभी तथ्यात्मक गवाहों के मुकर जाने मात्र से मृत्यु पूर्व बयान को पूरी तरह अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता। इसी टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने जलने से महिला की मौत के मामले में उसके पति और सास-ससुर की हत्या के लिए दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा बरकरार रखी।
जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने कहा कि कई बार अभियोजन पक्ष के गवाहों को भावनात्मक दबाव या आर्थिक और अन्य लाभ देकर अपने पक्ष में कर लिया जाता है। हालांकि, अदालत ने दो अन्य आरोपियों विपिन और मदन को बरी कर दिया, क्योंकि अभियोजन पक्ष उनकी पहचान साबित करने में विफल रहा।
हाईकोर्ट बदायूं के सेशंस कोर्ट द्वारा नवंबर 2018 में दिए गए फैसले को चुनौती देने वाली तीन आपराधिक अपीलों पर सुनवाई कर रहा था। सत्र अदालत ने पांचों आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के साथ धारा 149 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
मामले के अनुसार, मृतका की शादी आरोपी अनुज कुमार से करीब तीन साल पहले हुई। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि 4 जनवरी 2017 को बदायूं स्थित ससुराल में उसके ऊपर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी गई। बेटी के जलने की खबर मिलने पर उसके पिता ससुराल पहुंचे। इसके बाद महिला को जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां उसी दिन शाम करीब 4:48 बजे उसका मृत्यु पूर्व बयान दर्ज किया गया।
महिला की 5 जनवरी 2017 की तड़के मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण सदमे और मृत्यु से पहले लगी व्यापक जलने की चोटों को बताया गया।
मुकदमे की सुनवाई के दौरान मृतका की मां, बहन, मौसी और भाई ने अभियोजन पक्ष की कहानी का समर्थन नहीं किया और उन्हें पक्षद्रोही घोषित कर दिया गया। इन गवाहों ने कथित घटना से इनकार किया या कहा कि महिला को दुर्घटनावश जलने से चोटें आई थीं। इसके बावजूद सत्र अदालत ने पांचों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। इस फैसले को चुनौती देते हुए सभी पांचों आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की।
हाईकोर्ट में आरोपियों की ओर से दलील दी गई कि मृतका बयान देने की स्थिति में नहीं थी और उसका मृत्यु पूर्व बयान भरोसेमंद नहीं है। उन्होंने पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मिट्टी के तेल की गंध का उल्लेख नहीं होने पर भी सवाल उठाए। साथ ही आरोप लगाया कि अस्पताल के बेड-हेड टिकट के कुछ पन्ने गायब थे।
राज्य सरकार ने अपीलों का विरोध करते हुए मृत्यु पूर्व बयान और उसे दर्ज करने वाले डॉक्टर तथा तहसीलदार की गवाही पर भरोसा जताया।
रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों की जांच के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष के सभी तथ्यात्मक गवाहों के मुकर जाने के बावजूद मृत्यु पूर्व बयान को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। पीठ ने इस संभावना की ओर भी ध्यान दिलाया कि गवाहों को अपने पक्ष में कर लिया गया हो।
अदालत ने टिप्पणी की,
“मौजूदा मामले में अभियोजन पक्ष के गवाहों को अपने पक्ष में कर लिए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, खासकर इसलिए कि तहसीलदार ने डॉक्टर द्वारा घायल महिला को बयान देने के लिए फिट घोषित किए जाने के बाद उसका मृत्यु पूर्व बयान विधिवत दर्ज किया।”
हालांकि, हाईकोर्ट ने पति और उसके माता-पिता के मामले को अन्य दो आरोपियों से अलग माना। अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता और अभियोजन पक्ष के अन्य गवाह अनुज कुमार तथा सास-ससुर राजेश्वरी और ब्रजपाल को पहले से जानते थे। मृतका भी मृत्यु पूर्व बयान दर्ज होने से पहले इन तीनों को पहचानती थी।
पीठ ने कहा कि इन तीनों आरोपियों की पहचान स्थापित थी और मृतका ने अपने बयान में उन लोगों के नाम बताए, जिन्हें वह पहले से जानती थी और जिन्हें बयान देते समय अपनी आसन्न मृत्यु का एहसास था। इन परिस्थितियों में अदालत ने अनुज कुमार राजेश्वरी और ब्रजपाल की दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं पाया। उनकी अपीलें खारिज कर दी गईं और उनकी उम्रकैद की सजा बरकरार रही।
दूसरी ओर हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष विपिन और मदन की पहचान साबित नहीं कर सका। विपिन का नाम FIR में है और दोनों के नाम मृत्यु पूर्व बयान में भी दर्ज है। लेकिन घटना से पहले शिकायतकर्ता या अभियोजन पक्ष का कोई भी तथ्यात्मक गवाह उन्हें नहीं जानता था।
अदालत ने गौर किया कि मुकदमे की सुनवाई से पहले दोनों आरोपियों की पहचान के लिए कोई टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) नहीं कराई गई। इसके अलावा, पक्षद्रोही घोषित किए जाने के बाद भी किसी गवाह ने अदालत में दोनों आरोपियों की पहचान नहीं की।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि आरोप तय करने की प्रक्रिया और अंगूठे के निशान लेने जैसी औपचारिकताओं से यह साबित नहीं होता कि अपीलकर्ता वही व्यक्ति थे जिनके नाम मृत्यु पूर्व बयान में दर्ज किए गए।
इसलिए हाईकोर्ट ने विपिन और मदन की अपील स्वीकार करते हुए उनकी दोषसिद्धि रद्द की। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि वे किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं, तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए।