इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि केवल जांच एजेंसी की मौखिक आशंका के आधार पर किसी आरोपी की व्यक्तिगत तलाशी से बरामद सामान को उसके इस्तेमाल से वंचित नहीं किया जा सकता। जब्त वस्तुओं को थाने या मालखाने में लंबे समय तक रखने के बजाय कानून के अनुसार उनके वास्तविक स्वामी को सौंपने की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।

जस्टिस डॉ. गौतम चौधरी ने वाराणसी की ट्रायल कोर्ट का वह आदेश रद्द किया, जिसमें NDPS मामले में आरोपी की व्यक्तिगत तलाशी से बरामद सोने के जेवर और 850 रुपये नकद छोड़ने से इनकार किया गया था।

मामला वर्ष 2023 में NCB के लखनऊ क्षेत्र, वाराणसी में NDPS Act की धाराओं 8, 22, 25, 29 और 30 के तहत दर्ज मुकदमे से जुड़ा है। आरोपी की 4 अगस्त 2023 को गिरफ्तारी के बाद व्यक्तिगत तलाशी ली गई। इस दौरान कथित तौर पर 10 वस्तुएं बरामद हुईं, जिनमें सोने की पेंडेंट वाली चेन, तीन अंगूठियां, सोने का कंगन और 850 रुपये नकद शामिल थे।

आरोपी ने बाद में इन वस्तुओं को वापस दिलाने के लिए अदालत में आवेदन दिया। उसका कहना था कि बरामद सामान पर उसके अलावा किसी अन्य व्यक्ति ने दावा नहीं किया है और ये वस्तुएं मुकदमे की मुख्य संपत्ति से संबंधित नहीं हैं।

NCB ने इसका विरोध करते हुए दावा किया कि जब्त जेवर और नकदी मादक पदार्थों की बिक्री से हुई अवैध कमाई से खरीदे गए।

इसी दौरान आरोपी ने सोने के जेवर का मूल्यांकन संबंधी दस्तावेज अदालत में पेश किया। उसमें यह बताया गया कि जेवर उसकी पत्नी ने खरीदे थे।

हाईकोर्ट में आरोपी की ओर से कहा गया कि ट्रायल कोर्ट ने पत्नी के स्वामित्व से संबंधित दस्तावेजों पर उचित विचार नहीं किया। यह भी बताया गया कि बरामद वस्तुओं पर उसके अलावा किसी अन्य व्यक्ति ने अपना दावा नहीं किया।

हाईकोर्ट ने कहा कि सोने के जेवर और 850 रुपये आरोपी की व्यक्तिगत तलाशी के दौरान बरामद हुए। मौजूदा स्तर पर ऐसा कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य सामने नहीं है, जिससे यह साबित हो कि विशेष जेवर किसी अपराध का विषय थे। अदालत ने यह भी कहा कि इन वस्तुओं को पुलिस थाने या मालखाने में रखे रहने से मुकदमे की सुनवाई पर कोई सकारात्मक प्रभाव पड़ने का आधार नहीं है।

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के सुंदरभाई अंबालाल देसाई बनाम गुजरात राज्य के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जब्त संपत्ति को वर्षों तक पुलिस थानों या मालखानों में अनावश्यक रूप से नहीं रखा जाना चाहिए।

अदालत के अनुसार ऐसी वस्तुओं की उचित तस्वीरें खींचकर पंचनामा तैयार किया जाना चाहिए और फिर उचित बंधपत्र या सुरक्षा के आधार पर वास्तविक स्वामी को उन्हें सौंपने की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।

हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने संबंधित कानूनी सिद्धांतों और जेवर के स्वामित्व से जुड़े दस्तावेजों का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया।

पीठ ने स्पष्ट किया,

“मात्र जांच एजेंसी की मौखिक आशंका के आधार पर किसी व्यक्ति को उसकी व्यक्तिगत तलाशी से बरामद वस्तुओं के उपयोग से वंचित रखा जाना उचित नहीं प्रतीत होता।”

अदालत ने इसके आधार पर ट्रायल कोर्ट के 3 जुलाई 2025 के आदेश को उस हिस्से तक रद्द किया, जिसमें आरोपी की व्यक्तिगत तलाशी से बरामद वस्तुओं को छोड़ने से इनकार किया गया।

हालांकि, हाईकोर्ट ने आरोपी को संबंधित दस्तावेजों के साथ एक महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट में नया आवेदन दाखिल करने की स्वतंत्रता दी। आवेदन में पेंडेंट वाली सोने की चेन, तीन सोने की अंगूठियों, सोने के कंगन और 850 रुपये के स्वामित्व से जुड़े दस्तावेज पेश करने होंगे।

ट्रायल कोर्ट को आवेदन प्राप्त होने की तारीख से एक महीने के भीतर सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुंदरभाई अंबालाल देसाई मामले में तय सिद्धांतों के अनुसार उसका निस्तारण करने का निर्देश दिया गया।

इसी के साथ संविधान के तहत नहीं बल्कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत दायर आवेदन का अंतिम रूप से निस्तारण कर दिया गया।

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