पत्रकार सत्यम वर्मा की NSA हिरासत के खिलाफ याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा में अप्रैल 2026 के वर्कर्स प्रोटेस्ट में कथित भूमिका को लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत में लिए गए पत्रकार सत्यम वर्मा की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर गुरुवार को फैसला सुरक्षित रख लिया।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने 7 और 8 अक्टूबर को दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रखा।
सत्यम वर्मा ने 12 मई 2026 को गौतम बुद्ध नगर के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की धारा 3(2) सहपठित धारा 3(3) के तहत जारी हिरासत आदेश को चुनौती दी है।
इसके अलावा उन्होंने राज्य सरकार के 20 मई के अनुमोदन आदेश और 10 जून के पुष्टि आदेश को भी चुनौती दी।
याचिका में सभी आदेश रद्द कर वर्मा को तत्काल रिहा करने तथा कथित अवैध हिरासत के लिए मुआवजा देने की मांग की गई।
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याचिका में हिरासत आदेश को चुनौती देने का मुख्य आधार यह बताया गया कि आदेश जिस आधार पर पारित किया गया, वह तथ्यात्मक रूप से संभव ही नहीं है।
वर्मा का दावा है कि 13 अप्रैल 2026 को नोएडा में हुई हिंसा में उनकी कथित संलिप्तता का उल्लेख हिरासत आदेश में किया गया, जबकि सीसीटीवी फुटेज और कॉल डिटेल रिकॉर्ड के अनुसार वह उस समय करीब 500 किलोमीटर दूर लखनऊ में थे।
याचिका के अनुसार उसी दिन दोपहर 2:14 बजे उन्हें लखनऊ के हसनगंज पुलिस ने हिरासत में लिया था। वर्मा ने इसे अपने पक्ष में ऐसा ठोस अलिबाई बताया, जो कथित तौर पर यह साबित करता है कि वह नोएडा में हुई घटना में शामिल नहीं हो सकते थे।
याचिका में तर्क दिया गया कि ऐसे भौतिक रूप से असंभव और स्पष्ट रूप से गलत आधार पर पारित NSA हिरासत आदेश कायम नहीं रह सकता।
वर्मा ने यह भी आरोप लगाया है कि जांच अधिकारी ने हसनगंज थाने के CDR और CCTV फुटेज को जानबूझकर हिरासत आदेश पारित करने वाले अधिकारी के सामने पेश नहीं किया।
उनके अनुसार, महत्वपूर्ण सामग्री छिपाए जाने से हिरासत प्राधिकारी की तथाकथित 'सब्जेक्टिव सैटिस्फैक्शन' प्रभावित हुई।
याचिका में यह भी कहा गया है कि राज्य ने हिरासत के लिए जिन 11 FIR पर भरोसा किया उनमें से किसी में भी वर्मा को आरोपी के रूप में नामजद नहीं किया गया।
याचिका के अनुसार हिरासत आदेश कथित सह-आरोपी और गवाह मंगल के पुलिस हिरासत के दौरान दिए गए बयानों पर भी आधारित है।
वर्मा का तर्क है कि ऐसे बयान कानूनन स्वीकार्य नहीं हैं और उन्हें निवारक हिरासत के लिए जरूरी संतुष्टि का आधार नहीं बनाया जा सकता।
वर्मा ने राज्य द्वारा उनकी पेशेवर आय को कथित 'दंगा फंडिंग' के रूप में पेश किए जाने पर भी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि करीब 20 वर्षों से उनकी आय उनके पेशे से हुई, रकम औपचारिक बैंकिंग माध्यमों से प्राप्त हुई और आयकर रिटर्न में घोषित की गई।
याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि राज्य द्वारा भरोसा की गई सामग्री को उसके सर्वोच्च स्तर पर स्वीकार कर लिया जाए, तब भी मामला न्यूनतम मजदूरी को लेकर स्थानीय श्रमिक विवाद से अधिक नहीं बनता।
वर्मा का कहना है कि ऐसा विवाद 'लॉ एंड ऑर्डर' के दायरे में आता है और इसे 'पब्लिक ऑर्डर' के लिए खतरा नहीं माना जा सकता।
याचिका में आरोप लगाया गया कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का इस्तेमाल एक स्वतःस्फूर्त और वैध श्रमिक मांग को दबाने के लिए किया गया।
वर्मा ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a), 19(1)(c), 21 और 22(5) के तहत अपने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का भी आरोप लगाया।
याचिका के अनुसार, उनकी राजनीतिक विचारधारा, रिवोल्यूशनरी वर्कर्स पार्टी ऑफ इंडिया से जुड़ाव तथा अनुवादक और साहित्य प्रकाशक के रूप में पेशेवर गतिविधियों को आपराधिक रंग देने का प्रयास किया गया।
याचिका में यह भी कहा गया कि राज्य सरकार का 20 मई 2026 का अनुमोदन आदेश वर्मा को कभी उपलब्ध नहीं कराया गया। उनके अनुसार, इससे उन्हें संविधान के अनुच्छेद 22(5) के तहत प्रभावी प्रतिवेदन देने के अधिकार से वंचित किया गया।
वर्मा ने हिरासत के आधारों को भी चुनौती दी है। उनका कहना है कि हिरासत के आधार में उन्हें प्रतिवेदन देने के लिए केवल 12 दिन की अवधि बताई गई और यह भी कहा गया कि सरकार की मंजूरी मिलने के बाद प्रतिवेदन पर विचार नहीं किया जाएगा।
याचिका के मुताबिक वर्मा ने 21 मई 2026 को वैधानिक प्रतिवेदन दिया था, लेकिन उसे जानबूझकर दबा दिया गया और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की धारा 11(1) के तहत अनिवार्य रूप से विचार किए जाने के बावजूद एडवाइजरी बोर्ड के सामने नहीं रखा गया।
एडवाइजरी बोर्ड की 26 मई को हुई सुनवाई पर भी सवाल उठाए गए।
वर्मा का दावा है कि उन्हें सुनवाई की जानकारी मुश्किल से 18 घंटे पहले दी गई और सुनवाई रात के समय हुई। उनके अनुसार, इतनी कम अवधि में उन्हें अपना बचाव तैयार करने या आवश्यक सहायता लेने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला।
वर्मा ने अपनी याचिका में सह-हिरासत में ली गई अकीर्ति चौधरी के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के पहले के आदेश का भी हवाला दिया है।
याचिका के अनुसार कोर्ट ने उसी आंदोलन से जुड़े, उसी अधिकारी द्वारा उसी तारीख को जारी किए गए समान शब्दों वाले निवारक हिरासत आदेश रद्द कर दिया था।
वर्मा का दावा है कि इस आधार पर उनका मामला और भी मजबूत है और समानता के सिद्धांत पर उनकी हिरासत भी रद्द की जानी चाहिए।
याचिका में 17-18 अप्रैल की दरमियानी रात वर्मा की शुरुआती गिरफ्तारी को भी चुनौती दी गई है। आरोप है कि सादे कपड़ों में आए कर्मियों ने उन्हें बिना अरेस्ट मेमो के गिरफ्तार किया और उनके परिवार को भी इसकी सूचना नहीं दी।
वर्मा ने हाईकोर्ट से बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट जारी कर 12 मई के हिरासत आदेश तथा उसके बाद जारी अनुमोदन और पुष्टि आदेशों को रद्द करने, उन्हें तत्काल रिहा करने और कथित अवैध हिरासत के लिए मुआवजा देने की मांग की।
इस बीच, 15 सितंबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अप्रैल 2026 के नोएडा वर्कर्स प्रोटेस्ट से जुड़े 11 आपराधिक मामलों में से एक में सत्यम वर्मा की जमानत याचिका पर सुनवाई टाल दी थी। उस मामले में राज्य सरकार ने समानता के आधार पर जमानत का विरोध करने के लिए जवाब दाखिल करने का अवसर मांगा था।
कोर्ट ने पहले खुली अदालत में संकेत दिया था कि उसी मामले में 23 जून को एक सह-आरोपी को मिली जमानत के आधार पर वर्मा को भी जमानत दी जा सकती है।
हालांकि बाद में राज्य के वकील ने समानता के आधार पर जमानत का विरोध करने के लिए समय मांगा, जिसके बाद सुनवाई टाल दी गई।