परिवार के लोग घर में मौजूद थे, ऐसे में दुष्कर्म की घटना संभव नहीं लगती; पीड़िता के बयान में भी विरोधाभास, बरी करने का फैसला बरकरार: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2014 के दुष्कर्म मामले में राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए आरोपी को बरी करने का ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रखा।
अदालत ने कहा कि जिस समय कथित घटना हुई, उस समय पीड़िता के बच्चे और परिवार के अन्य सदस्य घर में मौजूद थे। ऐसे हालात में आरोपी द्वारा पीड़िता को घसीटकर कमरे में ले जाकर दुष्कर्म करना अत्यंत असंभव प्रतीत होता है।
जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने जुलाई 2019 में गोंडा की ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले को सही ठहराया। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 (दुष्कर्म) और धारा 452 के आरोपों से बरी किया, जबकि धारा 323 के तहत साधारण मारपीट का दोषी ठहराया था।
पूरा मामला
अभियोजन के अनुसार 12 अप्रैल 2014 की शाम करीब सात बजे आरोपी बबलू कथित रूप से पीड़िता के घर में घुसा, उसका हाथ पकड़कर उसे एक कोठरी में ले गया, जहां उसके कपड़े उतारकर उसके साथ दुष्कर्म किया।
शिकायत में यह भी कहा गया कि पीड़िता के शोर मचाने पर उसका पति और ससुर बचाने पहुंचे, तभी सह-आरोपी मकसूदन ने उनके साथ मारपीट की और मुख्य आरोपी ने भी हमला किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि पीड़िता विवाहित है और उसके पांच बच्चे हैं। घटना शाम के समय होने का दावा किया गया, जब बच्चे और अन्य परिजन घर में मौजूद थे। ऐसे में आरोपी द्वारा पीड़िता को घसीटकर कमरे में ले जाना और दुष्कर्म करना स्वाभाविक प्रतीत नहीं होता।
अदालत ने यह भी पाया कि पीड़िता के बयान से यह संकेत नहीं मिलता कि कथित रूप से घसीटे जाने के दौरान उसने ऐसा शोर मचाया हो, जिससे घर के अन्य सदस्य या पड़ोसी तत्काल घटनास्थल पर पहुंच जाते।
पीठ ने डॉक्टर की गवाही का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया कि पीड़िता के निजी अंगों पर कोई बाहरी या अंदरूनी चोट नहीं मिली। उसकी पीठ पर भी घिसटने या चोट के कोई निशान नहीं पाए गए।
अदालत ने यह भी माना कि दुष्कर्म के आरोप के संबंध में पीड़िता के बयान में महत्वपूर्ण विरोधाभास था। इसी कारण अदालत ने उसे इस पहलू पर "पूरी तरह विश्वसनीय गवाह" नहीं माना।
हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का समुचित मूल्यांकन करते हुए एक संभावित और तर्कसंगत निष्कर्ष निकाला था। केवल इसलिए कि कोई दूसरा दृष्टिकोण भी संभव हो सकता है, अपीलीय अदालत उस निष्कर्ष को नहीं बदल सकती।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई ऐसी गंभीर कानूनी त्रुटि या विकृति नहीं है, जिसके कारण उसमें हस्तक्षेप किया जाए। इसलिए राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए आरोपी की दुष्कर्म के आरोप से बरी किए जाने का फैसला बरकरार रखा।