60 साल की उम्र में रिटायरमेंट का विकल्प न चुनने पर मदरसा शिक्षिका की ग्रेच्युटी नहीं रोकी जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी मदरसा शिक्षिका को केवल इस आधार पर ग्रेच्युटी से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसने 60 वर्ष की उम्र में रिटायर होने का विकल्प नहीं चुना और 62 वर्ष की उम्र तक सेवा जारी रखी। कोर्ट ने कहा कि जब संबंधित अधिकारियों ने शिक्षिका को निर्धारित आयु के बाद भी सेवा जारी रखने की अनुमति दी तो उसी अवधि तक सेवा करने को ग्रेच्युटी रोकने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
जस्टिस इरशाद अली ने कहा,
“जिस परिस्थिति को ग्रेच्युटी से वंचित करने का आधार बनाया गया वही परिस्थिति वास्तव में याचिकाकर्ता को संस्थान में आगे सेवा करने में सक्षम बनाने वाली थी।”
याचिकाकर्ता की नियुक्ति 16 अगस्त 1992 को फैजाबाद स्थित मदरसा अहले सुन्नत मेराजुल उलूम में सहायक शिक्षिका के पद पर हुई। वह 31 मार्च 2019 को सेवानिवृत्त हुईं, लेकिन उनकी ग्रेच्युटी का भुगतान नहीं किया गया। उन्होंने जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी और अन्य संबंधित अधिकारियों के समक्ष कई बार अभ्यावेदन दिए।
इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया। उनकी याचिका का 15 फरवरी 2023 को निस्तारण करते हुए उन्हें प्रमुख सचिव, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के समक्ष विस्तृत अभ्यावेदन देने का निर्देश दिया गया।
अभ्यावेदन को 13 सितंबर 2023 के आदेश से खारिज किया गया। इसका मुख्य आधार यह था कि शिक्षिका ने 60 वर्ष की उम्र में सेवानिवृत्ति लेने का विकल्प नहीं चुना और 62 वर्ष की उम्र तक सेवा की।
इस आदेश को चुनौती देते हुए शिक्षिका ने हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के 1 अक्टूबर 2024 के फैसले का हवाला दिया। उस मामले में उन सरकारी आदेशों को रद्द किया गया, जिनके आधार पर निर्धारित उम्र के बाद सेवा जारी रखने वाले शिक्षकों को ग्रेच्युटी से वंचित किया जा रहा था। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के उत्तर प्रदेश राज्य बनाम श्रीमती प्रियंका मामले में दिए गए आदेश का भी हवाला दिया।
राज्य की ओर से दलील दी गई कि मदरसों में सेवा की शर्तें समय-समय पर जारी सरकारी आदेशों से निर्धारित होती हैं। यह भी कहा गया कि शिक्षिका ने निर्धारित समय के भीतर 60 वर्ष की उम्र में सेवानिवृत्ति का विकल्प नहीं दिया और उन्हें 62 वर्ष तक सेवा करने का लाभ भी मिला था। राज्य ने यह भी बताया कि अन्य सभी देय सेवा लाभों का भुगतान किया जा चुका है।
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर कि शिक्षिका ने 60 वर्ष की उम्र में रिटायरमेंट का विकल्प नहीं चुना, ग्रेच्युटी से उनका अधिकार समाप्त नहीं हो जाता, खासकर तब जब उन्हें 62 वर्ष तक सेवा करने की अनुमति दी गई।
कोर्ट ने कहा,
“अन्य रिटायरमेंट या सेवा संबंधी देयकों का भुगतान अपने आप में यह तय नहीं करता कि ग्रेच्युटी देय नहीं थी। ग्रेच्युटी एक अलग रिटायरमेंट लाभ है और उसे रोकने के लिए ठोस कानूनी आधार होना चाहिए।”
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जिस फैसले का उल्लेख याचिकाकर्ता ने किया, वह विवादित आदेश पारित होने के बाद आया था। इसलिए कोर्ट उस फैसले को उसके जारी होने की तारीख से कोई नया अधिकार पैदा करने वाला फैसला मानकर लागू नहीं कर रहा है। बल्कि उसका उपयोग यह जांचने के लिए किया जा रहा है कि याचिकाकर्ता को ग्रेच्युटी से वंचित करने का आधार कानूनी रूप से सही था या नहीं।
कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई आधार सामने नहीं रखा गया, जिससे याचिकाकर्ता को उन कर्मचारियों से अलग माना जा सके, जिनके ग्रेच्युटी संबंधी दावों को अदालत ने स्वीकार किया।
हाईकोर्ट ने याचिका मंजूर करते हुए 13 सितंबर 2023 का आदेश रद्द किया। सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया गया कि प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने के तीन महीने के भीतर याचिकाकर्ता की पात्र सेवा के आधार पर ग्रेच्युटी की राशि निर्धारित कर उसका भुगतान किया जाए।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि 60 वर्ष की उम्र में सेवानिवृत्ति का विकल्प नहीं चुनने को ग्रेच्युटी से इनकार का आधार नहीं बनाया जाएगा। इसके साथ ही 31 मार्च 2019 से वास्तविक भुगतान की तारीख तक ग्रेच्युटी की राशि पर 6 प्रतिशत सालाना ब्याज देने का भी निर्देश दिया गया।