ग्राम पंचायत की आबादी का निर्धारण पिछली प्रकाशित जनगणना के आधार पर होना चाहिए, न कि उस तारीख पर असल में रहने वाले लोगों की गिनती के आधार पर: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 11-F में "आबादी" शब्द का मतलब उसकी कानूनी परिभाषा के अनुसार समझा जाना चाहिए, यानी पिछली प्रकाशित जनगणना में दर्ज आंकड़ा, न कि उस समय उस इलाके में असल में रहने वाले लोगों की संख्या।
कोर्ट ने कहा कि अगर किसी ग्राम पंचायत के इलाके का कुछ हिस्सा नगरपालिका में शामिल होने के बाद उसकी जनगणना वाली आबादी 1,000 से कम हो जाती है तो वह मौजूदा समय में ज़्यादा लोगों की गिनती का हवाला देकर अपनी अलग पहचान बनाए रखने का दावा नहीं कर सकती।
1947 के अधिनियम की धारा 11-F राज्य सरकार को नोटिफिकेशन के ज़रिए किसी ऐसे इलाके को पंचायत क्षेत्र घोषित करने की इजाज़त देती है, जिसमें एक गाँव या गाँवों का समूह हो और जिसकी आबादी, जहाx तक संभव हो, एक हज़ार हो। अधिनियम की धारा 2(l) में "आबादी" को पिछली जनगणना में पता चली आबादी के तौर पर परिभाषित किया गया, जिसके संबंधित आँकड़े प्रकाशित किए जा चुके हों।
जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की बेंच ने कहा,
"1947 के अधिनियम की धारा 11-F में बताए गए "आबादी" शब्द का मतलब अधिनियम की धारा 2(l) में दी गई परिभाषा के आधार पर समझा जाना चाहिए, जिसमें इसे पिछली जनगणना के अनुसार आबादी के तौर पर परिभाषित किया गया, जिसके आँकड़े प्रकाशित किए जा चुके हैं।"
पहले की ग्राम पंचायत करुआ (विकास खंड कर्नलगंज, ज़िला गोंडा) 1947 के अधिनियम की धारा 12 के तहत बनी एक ग्राम पंचायत थी, और याचिकाकर्ता नंबर 1 को 2021-22 में हुए चुनावों में इसका प्रधान चुना गया। यूपी नगरपालिका अधिनियम, 1916 की धारा 3 के तहत 21 अक्टूबर 2022 को जारी एक नोटिफिकेशन के ज़रिए, ग्राम पंचायत करुआ के इलाके का कुछ हिस्सा नगर पालिका परिषद, कर्नलगंज की सीमा में शामिल कर लिया गया, जिससे उसका इलाका और आबादी दोनों कम हो गए। इसके बाद 19 अप्रैल 2023 को 1947 के एक्ट की धारा 3 और 11-F के तहत जारी नोटिफिकेशन से बाकी बचे इलाके को ग्राम पंचायत कुमहराउरा में मिला दिया गया।
प्रधान और 293 अन्य लोगों ने 2023 के नोटिफिकेशन को चुनौती दी। उनका तर्क था कि इलाके को अलग करने के बाद भी, बाकी बचे इलाके की आबादी 1,719 थी, जिसमें से 1,104 वोटर थे। इसलिए यह धारा 11-F के तहत 1,000 की आबादी वाली शर्त को पूरा करता था। यह भी तर्क दिया गया कि ज़िला अधिकारियों ने 2011 की जनगणना के आधार पर एक गलत रिपोर्ट भेजी थी, जिसमें बाकी बची आबादी 785 बताई गई। यह भी कहा गया कि प्रस्तावित विलय के खिलाफ दी गई आपत्तियों पर कभी कोई फैसला नहीं लिया गया, और मौके पर स्थिति की जांच के लिए मुख्य विकास अधिकारी द्वारा बनाई गई तीन सदस्यीय समिति ने नोटिफिकेशन जारी होने से पहले अपनी जांच पूरी नहीं की। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह पूरी प्रक्रिया गैर-कानूनी, मनमानी और गलत तथ्यों पर आधारित थी।
राज्य का पक्ष यह था कि डी-नोटिफिकेशन 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर किया गया था, जिसके अनुसार बाकी बचे इलाके की आबादी 785 थी।
याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने गोंडा के कलेक्टर को यह पता लगाने का मौका दिया कि क्या याचिकाकर्ता गांव सभा करुआ के निवासी थे और क्या याचिका के साथ लगाई गई परिवार की जानकारी सही थी। कर्नलगंज के सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट द्वारा दाखिल अनुपालन हलफनामे में बताया गया कि जिन 1,719 लोगों का दावा किया गया, उनमें से 1,193 लोगों ने आधार कार्ड और परिवार रजिस्टर पेश किए।
कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ताओं का यह दावा कि नोटिफिकेशन की तारीख को असल आबादी 1,000 से ज़्यादा थी, उसे प्रतिवादियों ने गलत नहीं ठहराया। हालांकि, कोर्ट ने माना कि इस दावे का कोई कानूनी महत्व नहीं था, क्योंकि "आबादी" की कानूनी परिभाषा के अनुसार यह आंकड़ा पिछली प्रकाशित जनगणना (जो 2011 की थी) पर आधारित था।
याचिकाकर्ताओं ने 1947 के एक्ट की धारा 8 का भी हवाला दिया। इस धारा के अनुसार, अगर ग्राम पंचायत के इलाके का कोई हिस्सा नगरपालिका में शामिल किया जाता है तो उसका अधिकार क्षेत्र उस हिस्से के बराबर कम हो जाता है। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि बचा हुआ इलाका अपने आप में एक ग्राम पंचायत के तौर पर बना रहना चाहिए।
इस तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा,
“अगर 1947 के एक्ट की धारा 8 की ऐसी व्याख्या मान ली जाए तो 100, 50 या 10 की आबादी वाली ग्राम पंचायत का घटा हुआ इलाका भी ग्राम पंचायत के तौर पर अपनी अलग पहचान बनाए रखने का दावा कर सकता है। ऐसी व्याख्या 1947 के एक्ट की धारा 11-F को बेकार कर देगी।”
कोर्ट ने कहा कि धारा 8 के तहत अधिकार-क्षेत्र कम करने का मतलब यह पक्का करना नहीं है कि बचा हुआ इलाका ग्राम पंचायत बना रहेगा, खासकर तब जब वह कानूनी ज़रूरतों को पूरा न करता हो; और धारा 8 को एक्ट की बाकी धाराओं के साथ मिलाकर पढ़ा जाना चाहिए।
इस्तेमाल की गई शक्ति की प्रकृति पर कोर्ट ने कहा कि 1947 के एक्ट की धारा 3 और 11-F के तहत जारी नोटिफिकेशन 'कंडीशनल लेजिस्लेशन' (शर्तों पर आधारित कानून बनाने) का काम है।
तुलसीपुर शुगर कंपनी लिमिटेड बनाम नोटिफाइड एरिया कमेटी, तुलसीपुर और पंजाब राज्य बनाम तेहल सिंह के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा,
“1947 के एक्ट की धारा 3 के तहत ग्राम सभा बनाने और धारा 11-F के तहत किसी ऐसे इलाके को (जिसमें एक या कई गाँव हों और जिसकी आबादी, जहाँ तक संभव हो, 1,000 हो) एक्ट के तहत पंचायत घोषित करने के लिए नोटिफिकेशन जारी करना राज्य सरकार का न तो एग्जीक्यूटिव (कार्यकारी) काम है और न ही एडमिनिस्ट्रेटिव (प्रशासनिक) काम; बल्कि यह लेजिस्लेटिव (विधायी) प्रकृति का काम है। नोटिफिकेशन जारी करने के इन कानूनी कामों को पूरा करने में सरकार पर कोई न्यायिक (adjudicatory) ज़िम्मेदारी नहीं होती है।”
कोर्ट ने कहा कि ऐसा नोटिफिकेशन जारी करते समय सरकार के सामने एकमात्र सवाल यह होता है कि क्या कानून में बताई गई शर्तें पूरी हो रही हैं। ऐसे नोटिफिकेशन को चुनौती देने के आधार भी उसी हिसाब से सीमित होते हैं।
“कंडीशनल लेजिस्लेशन के तौर पर जारी नोटिफिकेशन को तभी चुनौती दी जा सकती है, जब वह कानूनी आदेश से आगे बढ़ जाए, उसमें ज़रूरी शुरुआती शर्तें न हों या वह संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता हो।”
इसके अनुसार, कोर्ट ने रिट याचिका खारिज की।
Case Title: Gudia Goswami and 293 others v. State of U.P. Thru. Prin. Secy. Deptt. of Panchayati Raj, Lko. and 10 others 2026 LiveLaw (AB) 504