इलाहाबाद हाईकोर्ट ने थारू समुदाय को दी राहत, कहा- वन अधिकार अधिनियम मौजूदा अधिकारों को मान्यता देता है, पिछले अदालती आदेशों को रद्द करता है
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि अधिकारी वन अधिकार अधिनियम, 2006 के लागू होने से पहले जारी किए गए अदालती आदेशों पर आँख मूंदकर भरोसा करके जंगल में रहने वालों के मौजूदा कानूनी अधिकारों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।
जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच ने इस तरह लखीमपुर की ज़िला स्तरीय समिति द्वारा 2021 में पारित आदेश रद्द किया। इस आदेश में समिति ने 'थारू' समुदाय के 107 सदस्यों के वन अधिकारों - विशेष रूप से अपनी आजीविका के लिए छोटे वन उत्पादों को इकट्ठा करने और उनका उपयोग करने के अधिकार - के दावों को अंतिम रूप देने से इनकार किया था।
संक्षेप में कहें तो अपने आदेश में अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) नियम, 2007 के तहत गठित समिति ने याचिकाकर्ताओं के दावों को खारिज करने के लिए, वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत वर्ष 2000 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित एक अंतरिम आदेश पर भरोसा किया था।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि वन अधिकार अधिनियम, 2006 विशेष रूप से अनुसूचित जनजातियों और पारंपरिक वन निवासियों के लाभ के लिए बनाया गया। उन्होंने दलील दी कि अधिनियम की धारा 3 के तहत उनके अधिकारों में गाँव की सीमाओं के भीतर या बाहर पारंपरिक रूप से इकट्ठा किए जाने वाले छोटे वन उत्पादों का स्वामित्व, उन तक पहुंच और उनका उपयोग शामिल है।
इस संबंध में उन्होंने जनजातीय मामलों के मंत्रालय के 2013 के सर्कुलर का हवाला दिया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि 2006 का अधिनियम, जो बाद में बना कानून है, पिछली तारीख के सभी अदालती फैसलों या आदेशों को रद्द करता है।
बेंच ने उनके रुख में औचित्य पाया और कहा कि 2006 के अधिनियम का उद्देश्य जंगल में रहने वाली इन अनुसूचित जनजातियों को जंगल और वन भूमि पर उनके कब्ज़े को मान्यता देना और उन्हें सौंपना है, साथ ही उनकी आजीविका और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
अदालत ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अधिनियम की धारा 4 की शुरुआत 'नॉन-ऑब्स्टैन्टे' (किसी अन्य कानून के होते हुए भी प्रभावी) खंड से होती है। इसका अर्थ है कि केंद्र सरकार इन अधिकारों को मान्यता देती है और उन्हें सौंपती है, भले ही उस समय लागू किसी अन्य कानून में इसके विपरीत कुछ भी कहा गया हो। इस संबंध में कोर्ट ने यह साफ़ किया कि इस एक्ट के लागू होने से विधायिका ने इन जंगल में रहने वालों के लिए कोई नए अधिकार नहीं बनाए; बल्कि इसने इन लोगों के पहले से मौजूद अधिकारों और कब्ज़े को मान्यता दी थी, जो अलग-अलग कारणों से पारंपरिक रूप से जंगल में अपने रहने की इस जगह तक ही सीमित थे।
इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने विवादित आदेश में कमी पाई। बेंच ने कहा कि इस आदेश में 2006 के एक्ट के संबंधित प्रावधानों को ध्यान में नहीं रखा गया। इसमें सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट के उस अंतरिम आदेश पर विचार किया गया, जो 2000 में यानी एक्ट के लागू होने से पहले पारित किया गया।
इसी के मद्देनज़र, विवादित आदेश रद्द किया गया। साथ ही अधिकारियों को यह निर्देश दिया गया कि वे संबंधित व्यक्तियों को सुनवाई का अवसर दें और उसके बाद तर्कसंगत आदेश पारित करें।
इस बीच, आदिवासी समुदाय की तत्काल आजीविका की रक्षा के लिए कोर्ट ने निर्देश दिया कि जब तक ज़िला स्तरीय समिति द्वारा कोई आदेश पारित नहीं हो जाता, तब तक जंगल में रहने वालों को एक्ट में बताए गए उनके सभी मौजूदा अधिकार, कानून के अनुसार, प्राप्त रहेंगे।
उपरोक्त निर्देशों के साथ रिट याचिका का निपटारा किया गया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील नंदिनी वर्मा, देश दीपक सिंह और रजत श्रीवास्तव पेश हुए।
Case title: Udasa and 106 others vs Union of India, Thru.the Secy. Ministry of Tribal Affairs New Delhi and 5 others 2026 LiveLaw (AB) 234