बकाया न चुकाने पर सिविल जेल भेजने से पति की मासिक भरण-पोषण देने की ज़िम्मेदारी खत्म नहीं होती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-03-24 14:02 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि किसी व्यक्ति को उसकी पत्नी या बच्चों को भरण-पोषण (Maintenance) न देने के कारण सिविल जेल भेजने से उसकी आगे का मासिक भरण-पोषण का बकाया चुकाने की कानूनी ज़िम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती।

जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि की बेंच ने साफ किया कि CrPC की धारा 300 के तहत 'डबल जिओपार्डी' (दोहरी सज़ा) का सिद्धांत, 'घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005' के तहत भरण-पोषण के आदेशों को लागू करने के मामले में बिल्कुल भी लागू नहीं होता।

बेंच ने आगे कहा कि भरण-पोषण से जुड़ी कार्यवाही में न तो किसी को दोषी ठहराया जाता है और न ही बरी किया जाता है। इसलिए CrPC की धारा 300 के तहत किसी दलील का हवाला देकर भरण-पोषण की तय रकम को लागू करने से मना करना कानून के खिलाफ होगा।

बेंच ने यह आदेश हसीना खातून की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। हसीना खातून ने मुरादाबाद में सिविल जज (जूनियर डिवीज़न)/फास्ट ट्रैक कोर्ट (महिलाओं के खिलाफ अपराध) द्वारा जनवरी 2023 में दिए गए एक आदेश को चुनौती दी थी।

असल में जुलाई, 2019 में एक मजिस्ट्रेट ने याचिकाकर्ता के पति को आदेश दिया कि वह अपनी पत्नी को 4,000 रुपये और अपने दिव्यांग बेटे को 4,000 रुपये का अंतरिम भरण-पोषण (Interim Maintenance) दे।

हालांकि, पति 2,64,000 रुपये का बकाया चुकाने में नाकाम रहा, जिसके बाद याचिकाकर्ता-पत्नी ने बकाया वसूली के लिए एक अर्ज़ी (Execution Application) दायर की।

उसकी अर्ज़ी पर बकाया वसूली का वारंट जारी किया गया और पति को 30 अक्टूबर, 2022 को गिरफ्तार किया गया। चूंकि उसने ट्रायल कोर्ट द्वारा तय की गई भरण-पोषण की रकम जमा करने से मना किया, इसलिए न्यायिक मजिस्ट्रेट ने उसे 30 दिनों के लिए सिविल जेल भेज दिया।

जेल से रिहा होने के बाद भी वह याचिकाकर्ता को भरण-पोषण की रकम चुकाने में नाकाम रहा। नतीजतन, याचिकाकर्ता ने एक और अर्ज़ी दायर करके बकाया वसूली का नया वारंट जारी करने की मांग की।

हालांकि, इस बार 2,64,000 रुपये की वसूली के लिए दायर उसकी अर्ज़ी को इस आधार पर खारिज किया गया कि उसके पति ने पहले ही उस बकाया रकम के बदले 30 दिनों की जेल की सज़ा काट ली थी। सिविल जज (जूनियर डिवीज़न)/फास्ट ट्रैक कोर्ट (महिलाओं के खिलाफ अपराध) ने अपने फैसले में CrPC की धारा 300 का हवाला दिया। दूसरी ओर, पति ने उस आदेश का बचाव करते हुए जिसे चुनौती दी गई, यह तर्क दिया कि चूंकि उसने सज़ा के तौर पर तीस दिन की जेल काट ली है, इसलिए अब कोई बकाया नहीं बचा।

अंत में पति ने CrPC की धारा 482 के तहत इस अर्जी की स्वीकार्यता को भी इस आधार पर चुनौती दी कि जिस आदेश को चुनौती दी गई, उसके खिलाफ DV Act की धारा 29 के तहत अपील की जा सकती है।

अपने 42-पृष्ठों के आदेश में पत्नी की अर्जी पर सुनवाई कर रही बेंच ने शुरू में ही यह टिप्पणी की कि CrPC की धारा 300, DV Act के तहत होने वाली कार्यवाही पर लागू नहीं होती, क्योंकि इस कार्यवाही का नतीजा न तो दोषसिद्धि होता है और न ही दोषमुक्ति।

बेंच ने टिप्पणी की,

"DV Act के तहत तय की गई भरण-पोषण की राशि को देने से इनकार करना और इसके लिए CrPC की धारा 300 के तहत दलील देना कानून के विपरीत प्रतीत होता है। साथ ही यह संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा न्यायिक विवेक का इस्तेमाल न किए जाने का भी संकेत देता है।"

बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले 'रीना कुमारी बनाम दिनेश कुमार महतो 2025 LiveLaw (SC) 47' का हवाला देते हुए यह स्पष्ट किया कि भले ही भरण-पोषण के आदेश का पालन न करने पर दंडात्मक परिणाम भुगतने पड़ते हों। फिर भी इस तरह की कार्यवाही को आपराधिक कार्यवाही नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने आगे कहा कि किसी दोषी को केवल सिविल जेल भेजने भर से पीड़ित पत्नी को मासिक भरण-पोषण की राशि देने की उसकी ज़िम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती।

परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने आदेश रद्द किया जिसे चुनौती दी गई और संबंधित निचली अदालत को निर्देश दिया कि वह बकाया राशि की वसूली के लिए एक नया आदेश जारी करे; इस बकाया राशि में 6% की साधारण बैंक ब्याज दर भी शामिल होगी।

हाईकोर्ट ने आगे यह भी निर्देश दिया कि यदि पति द्वारा यह राशि जमा नहीं की जाती है—भले ही वह भरण-पोषण की राशि का भुगतान न करने के कारण पहले ही सिविल हिरासत में कुछ समय बिता चुका हो—तो न्यायिक मजिस्ट्रेट की निचली अदालत उसकी संपत्ति कुर्क कर ले।

बेंच ने अपने आदेश में आगे कहा,

“इससे मिलने वाली रकम को प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट, मुरादाबाद, या ज़िला जज, मुरादाबाद, या ज़िला मुरादाबाद के किसी अन्य संबंधित सिविल जज/मजिस्ट्रेट के कोर्ट के खाते में रखा जाएगा, जिसका इस्तेमाल बकाया रकम के भुगतान के लिए किया जाएगा। इस बकाया रकम पर देरी से भुगतान के लिए 6% की दर से साधारण बैंक ब्याज भी लगेगा। O.P. No.2 आवेदक पत्नी और उसके दिव्यांग बेटे को मौजूदा मासिक भरण-पोषण की रकम नियमित रूप से देता रहेगा। उसके बाद कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।”

Case title - Hasina Khatoon vs State of UP and another 2026 LiveLaw (AB) 138

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