बिना गिरफ्तारी के कारण बताए किसी को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा: यूपी सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट को दिया आश्वासन
इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष उत्तर प्रदेश सरकार ने आश्वासन दिया है कि राज्य में किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारण और आधार बताए बिना गिरफ्तार नहीं किया जाएगा। सरकार ने कहा कि पुलिस गिरफ्तारी की प्रक्रिया को BNSS, 2023 और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप सख्ती से लागू करेगी।
यह आश्वासन राज्य के एडिशनल एडवोकेट जनरल (AAG) विनोद कुमार शाही ने जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ के समक्ष दिया।
AAG ने अदालत को बताया कि उन्होंने राज्य के अपर मुख्य सचिव (गृह) और पुलिस महानिदेशक (DGP) को पहले ही पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले Mihir Rajesh Shah Vs. State of Maharashtra में जारी निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने को कहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने उक्त फैसले में स्पष्ट किया था कि यदि पुलिस किसी आरोपी को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने से कम-से-कम दो घंटे पहले लिखित रूप में गिरफ्तारी के आधार और कारण नहीं देती, तो ऐसी गिरफ्तारी और उसके बाद की रिमांड अवैध मानी जाएगी।
दरअसल, हाईकोर्ट संतोष गुप्ता की ओर से उनके भतीजे द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें गिरफ्तारी और रिमांड को चुनौती दी गई थी।
बार में सहमति बनी कि मामला हाल ही में दिए गए Manoj Kumar Vs. State of U.P. फैसले से पूरी तरह कवर होता है। इसके बाद अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए गिरफ्तारी को अवैध घोषित कर दिया।
अदालत ने कहा, “बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट जारी की जाती है और याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी को अवैध घोषित किया जाता है। 10 अप्रैल 2026 का रिमांड आदेश, जो अवैध गिरफ्तारी का परिणाम है, उसे भी निरस्त किया जाता है।”
कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संबंधित अधिकारी कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई कर सकते हैं।
सुनवाई के दौरान AAG शाही ने कहा कि राज्य सरकार गंभीर प्रयास करेगी कि भविष्य में किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारण बताए बिना गिरफ्तार न किया जाए।
गौरतलब है कि हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मनोज कुमार मामले में अवैध गिरफ्तारी और तीन महीने से अधिक हिरासत में रखने पर उत्तर प्रदेश सरकार को ₹10 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया था। अदालत ने कहा था कि गिरफ्तारी के लिखित आधार न देकर राज्य अधिकारियों ने व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत मिले मौलिक अधिकार का उल्लंघन किया।