किशोरावस्था की सजा पासपोर्ट जारी करने में बाधा नहीं : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 'भूल जाने के अधिकार' और 'नई शुरुआत' सिद्धांत को माना अहम

Update: 2026-05-29 12:30 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किशोरावस्था में दर्ज दोषसिद्धि किसी व्यक्ति को पासपोर्ट जारी करने से रोकने का आधार नहीं बन सकती।

अदालत ने कहा कि किशोर न्याय कानून का उद्देश्य ऐसे बच्चों को “नई शुरुआत” का अवसर देना है और उन्हें समाज में बिना किसी कलंक के दोबारा स्थापित करना है।

जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी, लखनऊ के मार्च 2021 का आदेश रद्द किया, जिसमें मोहम्मद यूनुस अंसारी का पासपोर्ट आवेदन खारिज किया गया था।

पासपोर्ट अधिकारी ने पुलिस रिपोर्ट के आधार पर आवेदन ठुकराया था, जिसमें कहा गया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक मामला लंबित है। हालांकि अदालत ने पाया कि ऐसा कोई मामला लंबित नहीं था।

मोहम्मद यूनुस अंसारी ने 29 जनवरी 2020 को पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था। अधिकारियों ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज मामलों के अंतिम परिणाम की जानकारी नहीं दी।

रिकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 2010 में जब याचिकाकर्ता की उम्र 16 वर्ष 10 महीने थी, तब उनके खिलाफ दुष्कर्म और अपहरण का मामला दर्ज हुआ था। किशोर न्याय बोर्ड, गोरखपुर ने वर्ष 2013 में उन्हें दोषी माना, लेकिन छह महीने की परिवीक्षा पर रिहा कर दिया था।

अदालत को बताया गया कि परिवीक्षा अवधि सफलतापूर्वक पूरी होने के बाद जिला परिवीक्षा अधिकारी ने उन्हें अच्छा आचरण प्रमाणपत्र भी जारी किया था।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि किशोर न्याय बोर्ड द्वारा दर्ज दोषसिद्धि को जीवनभर का कलंक नहीं माना जा सकता और इसे पासपोर्ट देने से इनकार का आधार नहीं बनाया जा सकता।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में किशोर न्याय अधिनियम, 2000 की धारा 19 का विस्तार से उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि यह प्रावधान स्पष्ट करता है कि किशोर के खिलाफ दर्ज दोषसिद्धि भविष्य में किसी प्रकार की अयोग्यता का कारण नहीं बनेगी।

अदालत ने कहा,

“कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किशोरावस्था में हुई गलती जीवनभर का दाग न बने और संबंधित व्यक्ति समाज में सामान्य जीवन जी सके।”

पीठ ने JJ Act, 2015 में शामिल “नई शुरुआत” के सिद्धांत का भी उल्लेख किया, जिसके अनुसार किशोर न्याय प्रणाली के तहत दर्ज पुराने रिकॉर्ड समाप्त कर दिए जाने चाहिए।

अदालत ने 'भूल जाने के अधिकार' का भी जिक्र करते हुए कहा कि यदि किशोरावस्था के आपराधिक रिकॉर्ड को हमेशा के लिए बनाए रखा जाए तो इससे व्यक्ति को अपमान, सामाजिक तिरस्कार और भविष्य में नुकसान झेलना पड़ सकता है।

पीठ ने कहा,

किशोरों के संदर्भ में 'भूल जाने का अधिकार' उनके भविष्य और पुनर्वास की सुरक्षा के लिए एक पूर्ण अधिकार है।”

अदालत ने यह भी कहा कि विदेश यात्रा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। इसलिए किसी व्यक्ति को पासपोर्ट से वंचित करने के लिए उचित, न्यायसंगत और आनुपातिक कारण होना जरूरी है।

हाईकोर्ट ने माना कि मिटाए जा चुके किशोर रिकॉर्ड के आधार पर पासपोर्ट देने से इनकार करना संविधान के अनुच्छेद 21 की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।

अंत में अदालत ने क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के आवेदन पर नए सिरे से विचार किया जाए और यदि कोई अन्य कानूनी बाधा न हो तो उन्हें पासपोर्ट जारी किया जाए।

इस प्रकार, अदालत ने याचिका स्वीकार की।

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