क्या DM के बिना गैंग चार्ट मंजूर कर सकती है पुलिस? कमिश्नरेट सिस्टम में 'असीमित विवेकाधिकार' पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उठाए सवाल, ACS को तलब किया

Update: 2026-01-13 06:29 GMT

उत्तर प्रदेश में यूपी गैंगस्टर्स एवं असामाजिक गतिविधि (निवारण) अधिनियम, 1986 के क्रियान्वयन को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए अपर मुख्य सचिव (गृह) को कारण बताओ नोटिस जारी किया है।

जस्टिस विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने गृह विभाग के शीर्ष अधिकारी को यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया कि पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली वाले जिलों में गैंग चार्ट को स्वीकृति देने से पहले जिला मजिस्ट्रेट (DM) को संयुक्त बैठक से बाहर क्यों रखा गया, जबकि गैर-कमिश्नरेट जिलों में यह अनिवार्य है।

कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा—

“यह न्यायालय इस तथ्य से भली-भांति अवगत है कि सबसे नेक और अच्छे इरादों वाली नीतियां भी तब विफल हो जाती हैं जब वे ऐसे कमजोर प्रशासकों के हाथों में सौंप दी जाती हैं जो संस्थागत रूप से अयोग्य होते हैं, लेकिन अत्यधिक महत्वाकांक्षी और संवैधानिक संस्थाओं को साधने में निपुण होते हैं।”

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला राजेंद्र त्यागी व अन्य द्वारा दायर धारा 482 CrPC की याचिका से उत्पन्न हुआ, जिसमें आरोप लगाया गया कि यूपी गैंगस्टर्स एक्ट के प्रावधानों का पुलिस द्वारा दुरुपयोग किया जा रहा है।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यूपी गैंगस्टर्स नियमावली, 2021 के नियम 5(3)(a) के तहत, गैर-कमिश्नरेट जिलों में DM और SP की संयुक्त बैठक के बाद ही गैंग चार्ट को मंजूरी दी जाती है। लेकिन गाजियाबाद कमिश्नरेट में यह अधिकार केवल कमिश्नर ऑफ पुलिस द्वारा प्रयोग किया जा रहा है और DM को प्रक्रिया से बाहर रखा जा रहा है।

पूर्व के आदेश

3 मार्च 2025 के आदेश में हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया कहा था कि यह व्यवस्था नियम 5(3)(a) और राज्य सरकार की पूर्व अधिसूचनाओं के विपरीत है। इसके बाद सरकार से बार-बार स्पष्टीकरण मांगा गया।

27 नवंबर 2025 को राज्य सरकार ने तर्क दिया कि कमिश्नरेट क्षेत्रों में संगठित अपराध, साइबर ठगी और वित्तीय अपराध अधिक होते हैं, इसलिए वहां विशेष और तेज कार्रवाई की जरूरत है और इसीलिए DM को प्रक्रिया से अलग रखा गया है। सरकार ने इसे “उदार उद्देश्य” और राष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथा बताया।

हालांकि, कोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया और कहा कि कड़े कानूनों का अत्यधिक प्रयोग छोटे अपराधियों पर किया जा रहा है, जबकि असली संगठित अपराधी अक्सर बच निकलते हैं। इसलिए कोर्ट ने सरकार से आंकड़ों और ठोस आधार पर हलफनामा मांगा था।

9 जनवरी का आदेश

9 जनवरी 2026 को हुई सुनवाई में कोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये को “लापरवाह” (lackadaisical) करार दिया। कोर्ट ने कहा कि सरकार यह मानकर चल रही है कि वह बिना सोच-विचार और प्रभावों का आकलन किए अधिसूचनाएं जारी कर सकती है, जो गलत है।

कोर्ट ने कहा—

“यह न्यायालय मूक दर्शक बनकर नहीं बैठ सकता और नागरिकों के हित तथा न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा की रक्षा के लिए अपने अधिकारों का प्रयोग करने से नहीं हिचकेगा।”

अंततः, हाईकोर्ट ने अपर मुख्य सचिव (गृह) को यह बताने के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया कि अदालत द्वारा मांगी गई जानकारियां क्यों नहीं दी गईं और क्या कोई कानूनी बाधा इसमें आड़े आ रही है।

मामले की अगली सुनवाई 20 जनवरी 2026 को होगी।

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