न्यायिक हत्या: इलाहाबाद हाइकोर्ट ने स्वामित्व विवाद में वादी को अवैध लाभ पहुंचाने पर ट्रायल जज के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई के निर्देश दिए
इलाहाबाद हाइकोर्ट ने संपत्ति स्वामित्व विवाद में ट्रायल कोर्ट जज के आचरण पर गहरा आघात व्यक्त करते हुए उसे “दिनदहाड़े न्यायिक हत्या” करार दिया। अदालत ने पाया कि ट्रायल जज ने एक मृतका के मृत्यु प्रमाणपत्र की छायाप्रति को नजरअंदाज कर वादी को अनुचित और अवैध लाभ पहुंचाया।
जस्टिस संदीप जैन ने कहा,
“सुशीला मेहरा के मृत्यु प्रमाणपत्र की उपेक्षा करने के लिए ट्रायल कोर्ट द्वारा दिया गया कारण चौंकाने वाला, विकृत और बाहरी कारणों से प्रेरित प्रतीत होता है। वादी को अवैध लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से इसे जानबूझकर नजरअंदाज किया गया। यह न्यायिक कदाचार का मामला है जो जज की निष्पक्षता और सत्यनिष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगाता है। यह इस कोर्ट की अंतरात्मा को झकझोर देने वाला प्रकरण है यह दिनदहाड़े न्यायिक हत्या का मामला है।”
हाइकोर्ट ने कार्यालय को निर्देश दिया कि प्रकरण की फाइल माननीय चीफ जस्टिस के समक्ष प्रशासनिक कार्रवाई हेतु प्रस्तुत की जाए ताकि तत्कालीन सिविल जज (सीनियर डिवीजन), गाजियाबाद के विरुद्ध उचित कदम उठाए जा सकें।
मामले में वादी इंदर मोहन सचदेव ने गाजियाबाद नगर निगम के विरुद्ध वाद दायर कर विवादित भूमि पर स्वामित्व का दावा किया। उसका कहना था कि उसे पूर्व में एकपक्षीय डिक्री मिली थी और वह प्रतिकूल कब्जे के आधार पर भी स्वामी बन चुका है। उसने यह भी कहा कि वह नियमित रूप से संपत्ति कर अदा करता रहा है।
प्रतिवादी नगर निगम ने तर्क दिया कि उसे एकपक्षीय वाद की जानकारी नहीं थी। साथ ही यह भी बताया गया कि वर्ष 2022 के एक अन्य मुकदमे में सुशीला मेहरा की मृत्यु का तथ्य अभिलेख पर लाया गया और उनका मृत्यु प्रमाणपत्र भी प्रस्तुत किया गया। प्रतिवादी का कहना था कि वर्ष 2019 का वाद, सुशीला मेहरा की 1996 में हुई मृत्यु के काफी बाद दायर किया गया अतः मृत व्यक्ति के विरुद्ध पारित डिक्री शून्य है।
ट्रायल कोर्ट ने मृत्यु प्रमाणपत्र की छायाप्रति यह कहते हुए अस्वीकार की कि वह साक्ष्य के रूप में ग्राह्य नहीं है। इस पर हाइकोर्ट ने कहा कि जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र सामान्यतः मूल रूप में न्यायालय में प्रस्तुत नहीं किए जाते, बल्कि सत्यापित प्रति ही दाखिल की जाती है। अदालत ने यह भी कहा कि प्रतिवादी तीसरा पक्ष होने के कारण झूठा मृत्यु प्रमाणपत्र प्रस्तुत कर कोई लाभ नहीं उठा सकता था इसलिए उसे नजरअंदाज करने का कोई औचित्य नहीं था।
हाइकोर्ट ने पाया कि मृतका के विधिक उत्तराधिकारियों द्वारा अन्य वादों में संबंधित दस्तावेज दाखिल किए गए और मृत्यु प्रमाणपत्र हैदराबाद नगर निगम द्वारा जारी किया गया, इसलिए उसकी प्रामाणिकता पर संदेह का कोई कारण नहीं था। चूंकि 2019 का वाद मृतका की मृत्यु के वर्षों बाद दायर हुआ, इसलिए उस पर आधारित डिक्री शून्य थी और उससे वादी को कोई अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि वादी के पिता को संपत्ति किराए पर दी गई और एक किरायेदार प्रतिकूल कब्जे के आधार पर स्वामित्व का दावा नहीं कर सकता। कानून स्पष्ट है कि किरायेदार को स्वामी के अधिकार को नकारने की अनुमति नहीं है।
इन निष्कर्षों के आधार पर हाइकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की डिक्री को निरस्त करते हुए प्रतिवादी की अपील स्वीकार कर ली और वादी का वाद खारिज कर दिया। साथ ही ट्रायल जज के विरुद्ध प्रशासनिक कार्रवाई की प्रक्रिया प्रारंभ करने के निर्देश दिए।