इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि IPC की धारा 34 के तहत common intention की जिम्मेदारी तय करने के लिए सह-आरोपी की भागीदारी का संबंधित अपराध से “functional relationship” होना जरूरी है। केवल इस आधार पर कि कई लोग एक ही घटना में शामिल थे, उनमें से प्रत्येक व्यक्ति को घटना के दौरान किए गए हर अपराध के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

जस्टिस सलिल कुमार राय और जस्टिस पदम नारायण मिश्रा की खंडपीठ ने 1985 के हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए आरोपी जाबिर की आपराधिक अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।

मामले में 18 दिसंबर 1985 को मम्मन हुसैन, उनके बेटे और बेटी पर हमला किया गया था। बाद में हुसैन की चोटों के कारण मौत हो गई। अभियोजन के अनुसार, आरोपी लाठी और तबल से लैस होकर वहां पहुंचे और मृतक तथा उसके बेटे पर हमला किया। ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को दोषी ठहराते हुए life imprisonment की सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 34 IPC के तहत constructive liability के लिए आरोपी की भागीदारी उस अपराध से जुड़ी होनी चाहिए जिसके लिए उसे जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।

हालांकि, मौजूदा मामले में कोर्ट ने पाया कि सभी आरोपी एक साथ आए, हथियारों से लैस थे और उन्होंने हमले में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया। जीवित बचे आरोपी जाबिर के पास तबल था और उसने भी हमले में सक्रिय भागीदारी की थी। इसलिए कोर्ट ने माना कि उसके खिलाफ common intention स्थापित होती है।

पीठ ने घायल चश्मदीद गवाहों की गवाही पर भी भरोसा किया और कहा कि मामूली विसंगतियां या घटनाक्रम के समय और क्रम को लेकर छोटी गलतियां विश्वसनीय गवाही को खारिज करने का आधार नहीं हो सकतीं।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि महत्वपूर्ण गवाह की गवाही दर्ज न किया जाना अपने आप में अभियोजन के मामले को खारिज करने का आधार नहीं है। इसका प्रभाव प्रत्येक मामले की परिस्थितियों में देखा जाना चाहिए।

अंततः हाईकोर्ट ने अभियोजन के साक्ष्य को विश्वसनीय मानते हुए जाबिर की Sections 302/34, 307/34 और 323/34 IPC के तहत conviction बरकरार रखी और अपील खारिज कर दी। उसे 20 सितंबर 2026 तक ट्रायल कोर्ट के समक्ष surrender करने का निर्देश दिया गया।

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