पति-पत्नी की तरह साथ रहने पर वैध विवाह का कड़ा सबूत मांगकर भरण-पोषण से इनकार नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-07-11 12:44 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि कोई पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे हों और उनका वैवाहिक संबंध अन्य परिस्थितियों से स्थापित होता हो, तो भरण-पोषण (Maintenance) के दावे को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि वैध विवाह का सख्त दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया है।

जस्टिस अचल सचदेव ने यह टिप्पणी महाराजगंज फैमिली कोर्ट के उस आदेश को आंशिक रूप से रद्द करते हुए की, जिसमें महिला की भरण-पोषण याचिका केवल इसलिए खारिज कर दी गई थी क्योंकि वह स्वयं को विधिक रूप से विवाहित पत्नी साबित करने वाले दस्तावेज पेश नहीं कर सकी थी।

महिला ने अपनी याचिका में कहा था कि वर्ष 2017 में दोनों ने कोर्ट मैरिज के लिए आवेदन किया था। इसके बाद वह पति के साथ रहने लगी और उनके संबंध से एक पुत्र का जन्म हुआ। महिला का आरोप था कि विवाह के बाद उससे अतिरिक्त दहेज, विशेषकर चार पहिया वाहन की मांग की गई, उसके साथ मारपीट की गई और अंततः उसे उसके नाबालिग बेटे के साथ घर से निकाल दिया गया। उसने अपने लिए ₹25,000 प्रति माह तथा बेटे के लिए ₹15,000 प्रति माह भरण-पोषण की मांग की थी।

दूसरी ओर, पुरुष ने यह स्वीकार किया कि दोनों ने कोर्ट मैरिज के लिए आवेदन किया था, वह महिला के साथ अपने सरकारी आवास में रहा और उनके संबंध से एक पुत्र का जन्म हुआ। हालांकि, उसने दहेज मांगने और प्रताड़ना के आरोपों से इनकार किया।

हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने पुरुष की इन स्वीकारोक्तियों की अनदेखी करते हुए केवल तकनीकी आधार पर महिला की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि जब दोनों के पति-पत्नी की तरह साथ रहने और उनके संबंध से संतान होने के तथ्य स्वीकार हैं, तब केवल वैध विवाह के कठोर प्रमाण के अभाव में भरण-पोषण से इनकार करना उचित नहीं है।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Badshah v. Urmila Badshah Godse (2014) फैसले का हवाला देते हुए कहा कि धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण के मामलों में कानून की सामाजिक उद्देश्यपूर्ण (Purposive) व्याख्या अपनाई जानी चाहिए, न कि केवल तकनीकी दृष्टिकोण।

हालांकि, हाईकोर्ट ने नाबालिग बच्चे को ₹5,000 प्रतिमाह भरण-पोषण देने के फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा और कहा कि धारा 125 CrPC के तहत पिता का दायित्व वैध और अवैध, दोनों प्रकार की संतान का भरण-पोषण करना है।

अदालत ने महिला के भरण-पोषण के दावे पर पुनर्विचार के लिए मामला फैमिली कोर्ट को वापस भेजते हुए दोनों पक्षों को राजनेश बनाम नेहा फैसले के अनुसार अपनी आय संबंधी शपथपत्र दाखिल करने और तीन महीने के भीतर मामले का निस्तारण करने का निर्देश दिया।

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