कर्मचारी की मौत से नियमितीकरण का अधिकार खत्म नहीं होता, कानूनी वारिसों को मिलता है लाभ: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-08-08 07:12 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि किसी कर्मचारी के जीवनकाल में उसके नियमितीकरण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, तो उसकी मृत्यु के साथ नियमितीकरण पर विचार करने का अधिकार समाप्त नहीं होता। ऐसा अधिकार उसके कानूनी वारिसों के माध्यम से जीवित रहता है और आवश्यक होने पर कर्मचारी को काल्पनिक रूप से उस तारीख से नियमित मानते हुए सेवा संबंधी लाभ उसके कानूनी वारिसों को दिए जा सकते हैं।

जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला ने यह फैसला मृत कर्मचारी के बेटे की याचिका पर सुनाया। अदालत ने याचिकाकर्ता के पक्ष में 50 हजार रुपये की लागत भी लगाई। याचिकाकर्ता अपने पिता की मृत्यु के समय नाबालिग था।

मृत कर्मचारी ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के ब्लॉक हरदोई में कार्य प्रभार स्थापना में जूनियर असिट्टेंट के पद पर कार्यरत था। 7 जुलाई 2005 को तैयार वरिष्ठता सूची में उसका नाम 58वें स्थान पर था। उत्तर प्रदेश नियमितीकरण नियम, 1998 के तहत दैनिक वेतन पर कार्यरत समूह-ग कर्मचारियों के नियमितीकरण की प्रक्रिया चल रही थी।

इसके बाद 21 जून 2012 के शासनादेश के जरिए समूह-ग के 172 पद स्वीकृत किए गए और नियमितीकरण के लिए चयन समिति गठित की गई। कर्मचारियों को 30 अगस्त 2012 को समिति के समक्ष उपस्थित होना था। हालांकि, याचिकाकर्ता के पिता की 11 अगस्त 2012 को मृत्यु हो गई। नियमितीकरण की प्रक्रिया जनवरी 2013 में पूरी हुई और उनके समान स्थिति वाले अन्य कर्मचारियों को नियमित कर दिया गया।

मृत कर्मचारी की पत्नी ने 2017 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अदालत ने संबंधित विभाग के निदेशक एवं मुख्य अभियंता को पहले मृत कर्मचारी के नियमितीकरण के दावे पर विचार करने और उसके बाद आश्रित की नियुक्ति से संबंधित दावे पर निर्णय लेने का निर्देश दिया था।

हालांकि, विभाग ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि कर्मचारी की मृत्यु नियमितीकरण प्रक्रिया पूरी होने से पहले हो गई और कार्य प्रभार कर्मचारियों के आश्रितों पर 1974 के नियम लागू नहीं होते।

बाद में हाईकोर्ट ने इस आदेश को रद्द करते हुए कहा था कि यदि मृत कर्मचारी से जूनियर कर्मचारियों को नियमित किया गया है तो उसे भी समान लाभ दिया जाए। इसके बावजूद संबंधित अधिकारी ने फिर से लगभग वही कारण देते हुए नियमितीकरण से इनकार किया।

इस पर जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला ने कड़ी नाराजगी जताई और कहा कि 17 मार्च 2023 का विवादित आदेश हाईकोर्ट के पूर्व आदेशों की अवहेलना करते हुए उसी कारण को दोहराता है, जिसे पहले ही खारिज किया जा चुका है।

अदालत ने कहा,

"यह आदेश संबंधित अधिकारियों के हठी रवैये का ऐसा उदाहरण है, जो इस अदालत की गरिमा की अवहेलना करने का प्रयास करता है और प्रथम दृष्टया अवमाननापूर्ण है।"

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि नियमितीकरण पर काल्पनिक रूप से विचार करने का अधिकार कर्मचारी की मृत्यु के बाद भी समाप्त नहीं होता, खासकर तब जब उसके जीवनकाल में नियमितीकरण का अधिकार स्थापित हो चुका था और प्रक्रिया लंबित थी।

अदालत ने कहा,

"जब नियमितीकरण का अधिकार अर्जित हो जाता है तो वह व्यक्ति के साथ चलता है और उसकी अनुपस्थिति में उसके कानूनी प्रतिनिधियों के माध्यम से जीवित रहता है। राज्य एक आदर्श नियोक्ता होने के नाते केवल कानून के शब्दों का नहीं, बल्कि निष्पक्षता, समानता और संवेदनशीलता की भावना का भी पालन करने के लिए बाध्य है।"

अदालत ने यह भी कहा कि मृत कर्मचारी की 18 वर्ष की लंबी सेवा को अधिकारियों की मनमानी और हठ के कारण व्यर्थ नहीं जाने दिया जा सकता।

हाईकोर्ट ने स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश बनाम कुलदीप ठाकुर मामले के फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया कि यदि किसी कर्मचारी का नियमितीकरण संबंधी अधिकार संबंधित शासनादेश के तहत स्थापित हो चुका है और उस पर विचार लंबित है तो कर्मचारी की असामयिक मृत्यु से वह अधिकार समाप्त नहीं होता। पहले नियमितीकरण के दावे पर निर्णय किया जाना आवश्यक है और उसके बाद ही आश्रित के दावे पर विचार किया जा सकता है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी के नियमितीकरण पर विचार करने का अधिकार केवल इस आधार पर समाप्त नहीं हो जाता कि उससे किसी जूनियर कर्मचारी को नियमित किया गया है या नहीं। अदालत ने विभाग के इस निष्कर्ष को भी अस्पष्ट बताया कि कोई कनिष्ठ कर्मचारी नियमित नहीं हुआ, क्योंकि आदेश में न तो वरिष्ठता सूची में अंतिम नियमित कर्मचारी का नाम बताया गया और न ही उसका क्रमांक।

हाईकोर्ट ने कहा कि वह सामान्यतः किसी कर्मचारी को सीधे नियमित घोषित करने का आदेश नहीं देता, लेकिन इस मामले में दोबारा विभाग को भेजना उचित नहीं होगा, क्योंकि नियमितीकरण से इनकार करने का एकमात्र आधार कर्मचारी की प्रक्रिया पूरी होने से पहले हुई मृत्यु थी और इस आधार को पहले ही अदालत खारिज कर चुकी थी।

अदालत ने अंततः मृत कर्मचारी को उस तारीख से नियमित माना जिस तारीख को वह नियमितीकरण के लिए पात्र हुआ और निर्देश दिया कि उससे जुड़े सभी परिणामी लाभ, मौद्रिक और अन्य, उसके कानूनी वारिसों को दिए जाएं।

अदालत ने कहा,

"कानूनी वारिस आज केवल वित्तीय बकाया के दावेदार नहीं हैं, बल्कि उस नैतिक अन्याय के प्रतिनिधि हैं, जिसकी भरपाई की जानी है। न्याय में देरी हो सकती है, लेकिन उसे उस क्षति को ठीक करना चाहिए जो केवल कानून में नहीं, बल्कि सिद्धांत में भी हुई।"

संबंधित अधिकारी को याचिकाकर्ता के दावे पर विचार कर आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया। यदि देरी या किसी अन्य वैध कारण से मामला उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर हो तो उसे दो महीने के भीतर संबंधित नियमों के तहत राज्य सरकार को भेजना होगा।

इस तरह हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए 50 हजार रुपये का जुर्माना याचिकाकर्ता के पक्ष में दिया।

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