लखनऊ चिड़ियाघर में वन्यजीवों के भोजन की आपूर्ति के टेंडर को चुनौती देने वाली याचिका खारिज, हाईकोर्ट ने कहा- अंतिम फैसला चिड़ियाघर प्रबंधन का
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह प्राणी उद्यान में वन्यजीवों के लिए खाद्य सामग्री की आपूर्ति के टेंडर को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की। कोर्ट ने कहा कि टेंडर में सबसे योग्य बोलीदाता का चयन करते समय संबंधित संस्थान की वास्तविक जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अंतिम निर्णय संबंधित मालिक या प्राधिकरण को आवश्यक लचीलापन और व्यावहारिकता के साथ लेने का अधिकार है।
जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अब्धेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने कहा कि जब किसी टेंडर को चुनौती दी जाती है तो अक्सर पूरा ध्यान इस बात पर केंद्रित हो जाता है कि सबसे योग्य पक्ष कौन है। लेकिन सबसे योग्य पक्ष का चयन करते समय उस संस्था की जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जिसके लिए टेंडर जारी किया गया। अंतिम चयन उसी प्राधिकरण पर छोड़ा जाना चाहिए, क्योंकि अंतिम निर्णय उसे ही अपनी जरूरतों के अनुसार लेना होता है।
याचिकाकर्ता ने लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह प्राणी उद्यान में वन्यजीवों के लिए खाद्य सामग्री की आपूर्ति के लिए जारी टेंडर में हिस्सा लिया। वर्ष 2026-27 के लिए 24 अप्रैल 2026 को जारी टेंडर में 21 प्रकार की खाद्य सामग्री शामिल थी और प्रत्येक सामग्री के लिए प्रति किलोग्राम दर मांगी गई। तीन सदस्यीय समिति ने 2 जुलाई 2026 को बोलियों का मूल्यांकन किया। इसमें याचिकाकर्ता की कुल दर 1,324.44 रुपये थी, जबकि प्रतिवादी नंबर चार ने 539 रुपये की दर दी थी और उसे एल-1 यानी सबसे कम बोलीदाता घोषित किया गया। इसके बाद 8 जुलाई 2026 को उसे कार्यादेश जारी कर दिया गया।
याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का रुख करते हुए वित्तीय बोलियों का दोबारा मूल्यांकन करने की मांग की। उसका तर्क था कि प्राधिकरण ने केवल उद्धृत दरों के आधार पर एल-1 का चयन किया, जबकि हर महीने आपूर्ति की जाने वाली 21 वस्तुओं की अनुमानित मात्रा को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में यह तर्क आकर्षक लग सकता है, लेकिन टेंडर की शर्तों की विस्तृत जांच करने पर स्पष्ट होता है कि अपनाई गई मूल्यांकन प्रक्रिया टेंडर की शर्तों के अनुरूप थी। टेंडर की धारा 10 में पूरी सामग्री सूची के लिए उद्धृत कुल दरों में से सबसे कम दर को स्वीकार करने का प्रावधान है। धारा 9 के अनुसार उद्धृत दरों में सभी कर शामिल हैं। इसके अतिरिक्त कोई भुगतान नहीं किया जाना है। वहीं, धारा 14 में चिड़ियाघर के भंडार तक सामग्री पहुंचाने का खर्च भी शामिल किया गया।
कोर्ट ने माना कि धारा 15 में प्रत्येक वस्तु की अनुमानित मासिक मात्रा जरूर दी गई, लेकिन धारा 16 ने इस अनुमान को सशर्त बनाया। इसके तहत मांग में काफी बदलाव हो सकता था, कुछ सामग्री की बिल्कुल भी जरूरत नहीं पड़ सकती थी और ऐसी स्थिति में आपूर्तिकर्ता को किसी तरह के मुआवजे का अधिकार भी नहीं है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब टेंडर में यह तय किया गया हो कि आवश्यक सामग्रियों की पूरी सूची के लिए सबसे कम कुल दर देने वाले बोलीदाता की पेशकश स्वीकार की जाएगी, तो एल-1 तय करते समय टेंडर प्राधिकरण को उन दरों की तुलना अनुमानित मासिक मात्रा से करना जरूरी नहीं है। कोर्ट के अनुसार मासिक मात्रा केवल अनुमान थी, जिसमें पर्याप्त बदलाव संभव है और उसे बोली के मूल्यांकन का आधार नहीं बनाया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि 21 वस्तुओं की दरें वर्ष 2026-27 की पूरी अवधि के लिए तय की गई हैं और इन्हें किसी भी परिस्थिति में बदला या संशोधित नहीं किया जा सकता।
टेंडर मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं को लेकर कोर्ट ने अपने हालिया फैसले रंजना पांडे बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि रिट कोर्ट द्वारा टेंडर प्रक्रिया की समीक्षा करते समय लखनऊ चिड़ियाघर की वास्तविक जरूरतों और आवश्यकताओं की अनदेखी नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि याचिकाकर्ता ने बोली जमा करने से पहले मूल्यांकन की प्रक्रिया को लेकर कोई सवाल नहीं उठाया था और न ही प्री-बिड चरण में कोई आपत्ति या स्पष्टीकरण मांगा था। कोर्ट ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता को टेंडर की शर्तें अनुचित लग रही थीं तो उसे बोली में हिस्सा लेने से पहले ही इस मुद्दे को उठाना चाहिए। एल-1 बोलीदाता के चयन के बाद इस स्तर पर उठाई गई आपत्ति काफी देर से की गई।
हाईकोर्ट ने कहा कि रिट कोर्ट टेंडर दस्तावेज तैयार करने वाले प्राधिकरण की व्याख्या के स्थान पर अपनी राय नहीं रख सकता। जब तक टेंडर की शर्तों की व्याख्या पूरी तरह मनमानी या विकृत न हो, उसमें न्यायिक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। इन टिप्पणियों के साथ कोर्ट ने याचिका खारिज की।