इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 की धारा 32 के तहत एक ही तरह के निर्माण उल्लंघन को केवल एक बार कंपाउंड यानी शुल्क लेकर नियमित किया जा सकता है। पहले उल्लंघन को कंपाउंड किए जाने के बाद प्रमोटर यदि स्वीकृत नक्शे से उसी तरह का विचलन दोबारा करता है, तो विकास प्राधिकरण उसे फिर से कंपाउंड करने की अनुमति नहीं दे सकता।

जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने गाजियाबाद के मोहन नगर, साहिबाबाद स्थित ग्रुप हाउसिंग सोसायटी के मामले में तीसरी कंपाउंडिंग रद्द की। कोर्ट ने टावर 16, 17, 18 और 19 की नौवीं व दसवीं मंजिल तथा टावर 27 और 28 को दो महीने के भीतर गिराने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कंपाउंडिंग से केवल आपराधिक दायित्व या जुर्माने से राहत मिल सकती है। इसका इस्तेमाल स्वीकृत लेआउट प्लान के विपरीत किए गए संरचनात्मक बदलावों को वैध बनाने के लिए नहीं किया जा सकता।

मामले के अनुसार गाजियाबाद विकास प्राधिकरण ने 29 मई 2006 को 95, कटोरी मिल, मोहन नगर, साहिबाबाद में 34 टावरों और 904 आवासीय इकाइयों वाली ग्रुप हाउसिंग योजना को मंजूरी दी थी। बाद में हिंडन एयरबेस के अधिकारियों ने कुछ खसरों पर प्रमोटर के मालिकाना हक को लेकर आपत्ति जताई। इसके बाद 3 जुलाई 2010 को लेआउट प्लान रद्द कर दिया गया। उस समय तक 720 आवासीय इकाइयों का निर्माण हो चुका था।

15 नवंबर 2011 को पहली कंपाउंडिंग के जरिए इन 720 इकाइयों को नियमित किया गया और 374 नई इकाइयों की अनुमति दी गई। इसके बाद प्रमोटर ने फिर स्वीकृत नक्शे से विचलन किया। 13 जनवरी 2015 को दूसरी कंपाउंडिंग के तहत टावर 33, 34 और 35 की ऊंचाई आठ से बढ़ाकर दस मंजिल करने की अनुमति दी गई।

इसके बाद 18 दिसंबर 2024 को तीसरी कंपाउंडिंग के जरिए टावर 16, 17, 18 और 19 की नौवीं व दसवीं मंजिलों के साथ टावर 27 और 28 को भी नियमित किया गया। इन बदलावों के तहत 112 अतिरिक्त आवासीय इकाइयों को मंजूरी मिली।

सोसायटी के 11 फ्लैट मालिकों ने तीसरी कंपाउंडिंग को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उनका कहना था कि प्रमोटर ने फ्लैट मालिकों की लिखित सहमति के बिना बार-बार लेआउट में बदलाव किया, जबकि उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट (निर्माण, स्वामित्व और रखरखाव का संवर्धन) अधिनियम, 2010 की धारा 5(3)(a) के तहत ऐसी सहमति जरूरी है। याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि विकास प्राधिकरण प्रमोटर के साथ मिलीभगत कर रहा था और फ्लोर एरिया रेशियो (FAR) की गणना में भारतीय वायुसेना की जमीन को भी शामिल किया गया।

इस याचिका पर सोसायटी की रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से 2015 में दायर एक अन्य याचिका के साथ सुनवाई हुई।

प्राधिकरण और प्रमोटर ने दलील दी कि कानून में एक से अधिक बार कंपाउंडिंग पर रोक नहीं है। उन्होंने गाजियाबाद विकास प्राधिकरण क्षेत्र भवन विनियम, 2002 के विनियम 13 और 15 का हवाला देते हुए कहा कि आवश्यकतानुसार निर्माण में कई बार बदलाव किए जा सकते हैं। उनका यह भी कहना था कि नियमित किए गए सभी निर्माण उपलब्ध FAR सीमा के भीतर थे। उनके मुताबिक, अंतिम स्वीकृत 1,096 इकाइयों के मुकाबले 1,603 इकाइयों तक निर्माण की अनुमति दी जा सकती थी।

उन्होंने यह आपत्ति भी उठाई कि जब सोसायटी की रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन मौजूद है, तो अलग-अलग फ्लैट मालिकों की याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।

हाईकोर्ट ने इस आपत्ति को खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं के व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन हुआ। धारा 5(3)(a) के तहत उनके अधिकार प्रभावित हुए हैं, इसलिए वे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने के हकदार हैं।

विनियम 13 की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने कहा कि किसी भी बाहरी निर्माण या बदलाव से पहले मुख्य कार्यकारी अधिकारी की औपचारिक अनुमति लेना आवश्यक है। इसके लिए संशोधित नक्शा भी जमा करना होगा। प्रमोटर पहले संरचनात्मक बदलाव करके बाद में मंजूरी नहीं मांग सकता। उसे निर्माण शुरू करने से पहले अनुमति हासिल करनी होगी।

अदालत और विकास प्राधिकरण के रिकॉर्ड में ऐसा कोई दस्तावेज नहीं मिला, जिससे साबित हो कि प्रमोटर ने आवश्यक अनुमति के लिए आवेदन किया या उसे मंजूरी मिली थी। कोर्ट ने कहा कि विनियम 15 के तहत उल्लंघन की सूचना मिलने पर 15 दिनों के भीतर उसे ठीक करने का प्रावधान केवल छोटे उल्लंघनों पर लागू होता है।

हाईकोर्ट ने विकास प्राधिकरण का मूल रिकॉर्ड तलब किया। जांच में पाया गया कि 2006 का लेआउट रद्द करने का आदेश और पहली कंपाउंडिंग के लिए प्रमोटर का आवेदन रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं था। प्रमोटर ने मूल लेआउट रद्द किए जाने के आदेश को किसी कानूनी कार्यवाही में चुनौती भी नहीं दी थी, इसलिए वह आदेश प्रभावी बना रहा।

कोर्ट ने इसे असामान्य स्थिति बताते हुए कहा कि विकास प्राधिकरण ने ऐसे लेआउट की कंपाउंडिंग को मंजूरी दी, जिसका मूल स्वीकृत नक्शा पहले ही रद्द हो चुका था और रद्द करने के आदेश को सक्षम प्राधिकारी ने न तो निरस्त किया और न ही वापस लिया।

कोर्ट ने यह भी गौर किया कि प्रमोटर ने कंपाउंडिंग उपनियमों के तहत यह लिखित आश्वासन दिया कि वह उल्लंघन आगे नहीं बढ़ाएगा। इसके बावजूद उसने उसी तरह के उल्लंघन दोबारा किए। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे दोहराए गए उल्लंघनों को फिर से कंपाउंड नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कंपाउंडिंग का सहारा लेकर प्रमोटर मौजूदा टावरों में बिना मंजूरी अतिरिक्त मंजिलें नहीं जोड़ सकता, मूल लेआउट में शामिल नहीं रहे नए टावर नहीं बना सकता और फ्लैट मालिकों के लिए निर्धारित खुले स्थान, हरित क्षेत्र या साझा सुविधाओं को कम नहीं कर सकता।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ग्रुप हाउसिंग योजना में अलग-अलग टावरों का निर्माण चरणबद्ध तरीके से किया जा सकता है। यदि स्वीकृत लेआउट में बाहरी बदलाव किए बिना प्रत्येक ब्लॉक में निर्धारित सीमा के भीतर विचलन होता है, तो उसकी अलग-अलग कंपाउंडिंग की अनुमति हो सकती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि एक ही तरह के उल्लंघन को बार-बार नियमित किया जा सकता है।

कंपाउंडिंग उपनियमों के विनियम 3.2.10 पर विचार करते हुए कोर्ट ने उस दलील को भी खारिज किया कि यह नियम केवल प्लॉटेड डेवलपमेंट पर लागू होता है, ग्रुप हाउसिंग पर नहीं। कोर्ट ने कहा कि बहुमंजिला इमारतों में बड़ी संख्या में परिवार रहते हैं, इसलिए ऐसे निर्माण पर अधिक सख्त नियमन जरूरी है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि टावर 16, 17, 18 और 19 में दो अतिरिक्त मंजिलों का निर्माण कंपाउंडिंग के जरिए नियमित नहीं किया जा सकता था।

हाईकोर्ट ने टाटा ऑयल मिल्स कंपनी लिमिटेड की ओर से 1990 में दायर रिट याचिका का रिकॉर्ड भी तलब किया। उससे पता चला कि आठ भूखंडों का अधिग्रहण डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट, 1962 के तहत हिंडन एयरफील्ड के लिए किया गया और उनका कब्जा 2 दिसंबर 1963 को ले लिया गया। कंपनी की ओर से अधिग्रहण को चुनौती देने वाली याचिका 1 मार्च 2012 को देरी और लापरवाही के आधार पर खारिज कर दी गई।

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि इन भूखंडों के संबंध में प्रमोटर के पक्ष में किए गए बिक्री विलेख वैध नहीं थे। इसलिए इन भूखंडों की 4,560 वर्गमीटर जमीन को FAR की गणना में शामिल नहीं किया जाना चाहिए था। कोर्ट ने कहा कि वैध मालिकाना हक या स्पष्ट स्वामित्व अधिकार के बिना विकास प्राधिकरण किसी हाउसिंग योजना के लेआउट या भवन योजना को मंजूरी नहीं दे सकता और न ही उसे कंपाउंड कर सकता है।

हाईकोर्ट ने 18 दिसंबर 2024 की तीसरी कंपाउंडिंग रद्द करते हुए विकास प्राधिकरण को निर्देश दिया कि टावर 16, 17, 18 और 19 की नौवीं व दसवीं मंजिल तथा टावर 27 और 28 को दो महीने के भीतर गिराया जाए। ध्वस्तीकरण का खर्च प्रमोटर से भू-राजस्व के बकाये की तरह वसूल किया जाएगा। कोर्ट ने जिला प्रशासन और पुलिस को भी कार्रवाई में सुरक्षा उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने पहली और दूसरी कंपाउंडिंग को भी अवैध माना। हालांकि, उन मंजूरियों के तहत बने फ्लैटों में तीसरे पक्ष के अधिकार पैदा हो चुके थे और संबंधित नक्शों को चुनौती नहीं दी गई। इसलिए हाईकोर्ट ने उन निर्माणों को प्रभावित नहीं किया।

हाईकोर्ट ने प्रमोटर पर 25 लाख रुपये का जुर्माना लगाया, जिसे रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन को दिया जाएगा। विकास प्राधिकरण को प्रत्येक याचिकाकर्ता को 50,000 रुपये देने का निर्देश भी दिया गया। इसके अलावा, राज्य सरकार को तीसरी कंपाउंडिंग मंजूर करने वाले विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष के खिलाफ अनुशासनात्मक जांच शुरू करने का आदेश दिया गया। हाईकोर्ट ने दोनों रिट याचिकाएं स्वीकार कीं।

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