रजिस्ट्रेशन एक्ट | जमीन के समझौते में धोखाधड़ी के आरोपों पर रिट कोर्ट पूरी सुनवाई नहीं कर सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी, दस्तावेजों में जालसाजी और हस्ताक्षरों के दुरुपयोग के आरोप कितने भी गंभीर क्यों न हों, इनके आधार पर संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट कोर्ट को प्रथम दृष्टया सुनवाई करने वाली अदालत की तरह काम करने, मौखिक साक्ष्य दर्ज करने, गवाहों की विश्वसनीयता परखने और विवादित तथ्यात्मक सवालों का फैसला करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब किसी वैधानिक प्राधिकारी ने उसके सामने मौजूद सामग्री के आधार पर निष्कर्ष दर्ज कर लिया हो और पक्षकारों के मूल अधिकारों से जुड़ा विवाद पहले से सिविल कोर्ट में लंबित हो, तो रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल संयम के साथ किया जाना चाहिए।
जस्टिस इरशाद अली ने कहा,
“अदालत इस बात से अवगत है कि याचिकाकर्ताओं ने धोखाधड़ी, जालसाजी और हस्ताक्षरों के दुरुपयोग के गंभीर आरोप लगाए। ये आरोप निस्संदेह गंभीर हैं। हालांकि, किसी आरोप की गंभीरता मात्र से रिट कोर्ट प्रथम दृष्टया सुनवाई करने वाली अदालत नहीं बन जाती, जहां मौखिक साक्ष्य दर्ज किए जाएं, गवाहों की विश्वसनीयता परखी जाए और विवादित तथ्यात्मक सवालों का फैसला किया जाए। जब वैधानिक प्राधिकारी ने उसके समक्ष रखी गई सामग्री के आधार पर निष्कर्ष दर्ज किया हो और पक्षकारों के मूल अधिकारों पर सिविल कोर्ट में भी विचार हो रहा हो, तो अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप संयम के साथ किया जाना चाहिए।”
याचिकाकर्ताओं के पिता स्वर्गीय छोटे लाल के पास फैजाबाद-इलाहाबाद मार्ग के निकट ग्राम पूरे हुसैन खान, तहसील और जिला फैजाबाद में जमीन थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि आर्थिक जरूरत के कारण उनके पिता ने प्रतिवादी संख्या पांच से 40,000 रुपये का कर्ज लिया था। आरोप के मुताबिक, कर्ज देने वाले ने स्टांप पेपर पर छोटे लाल के हस्ताक्षर तो करा लिए, लेकिन उन्हें यह नहीं बताया कि इन कागजात का उद्देश्य क्या है।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, कर्ज चुकाने के बाद भी ये कागजात वापस नहीं किए गए और बाद में इन्हें 30 अप्रैल 1989 के विक्रय समझौते में बदल दिया गया। यह समझौता प्रतिवादी संख्या चार यानी एक ट्रस्ट के पक्ष में था और इसमें कुल 5-11-07 क्षेत्रफल वाले 14 भूखंड शामिल थे।
सब-रजिस्ट्रार ने 24 जनवरी 1990 को दस्तावेज के पंजीकरण से इनकार किया। इसके बाद ट्रस्ट ने रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1908 की धारा 72 के तहत जिला रजिस्ट्रार के समक्ष अपील दायर की, जिसे केस नंबर 1/1990 के रूप में दर्ज किया गया।
छोटे लाल ने इस कार्यवाही पर आपत्ति जताते हुए कहा कि चूंकि दस्तावेज के निष्पादन से इनकार किए जाने के आधार पर पंजीकरण रोका गया, इसलिए धारा 72 के तहत अपील नहीं की जा सकती थी। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने कभी कोई विक्रय समझौता किया ही नहीं था।
20 सितंबर 1995 को छोटे लाल की मृत्यु हो गई। इसके बाद 12 जनवरी 1998 को उनके कानूनी उत्तराधिकारियों को मामले में पक्षकार बनाया गया। जिला रजिस्ट्रार ने 30 मार्च 2017 के आदेश में निष्कर्ष निकाला कि दस्तावेज का निष्पादन साबित हो गया और निर्देश दिया कि दस्तावेज प्रस्तुत किए जाने पर उसका पंजीकरण किया जाए।
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि अपील रजिस्ट्रेशन एक्ट की धारा 72 के बजाय धारा 73 के तहत दायर की जानी चाहिए थी। उन्होंने यह भी कहा कि पंजीकरण प्राधिकारी ने विवादित दस्तावेज के निष्पादन का फैसला सिविल कोर्ट की तरह किया। याचिकाकर्ताओं ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि साक्ष्य दर्ज किए जाने की प्रक्रिया के दौरान ही आदेश पारित किया गया।
इसके विपरीत, प्रतिवादी संख्या चार और पांच ने कहा कि दस्तावेज के निष्पादन का निष्कर्ष केवल दस्तावेज पर आधारित नहीं था। दस्तावेज के गवाह जगदंबा प्रसाद पांडे और राम जस ने इसके निष्पादन की पुष्टि की थी। इसके अलावा, 5 फरवरी 2004 की हस्तलेखन विशेषज्ञ की राय में विवादित हस्ताक्षर छोटे लाल के ही बताए गए।
प्रतिवादियों ने यह भी भरोसा किया कि छोटे लाल ने समझौते के बाद जमीन बेचने की अनुमति प्राप्त की थी। साथ ही, उनके एक बेटे ने 30 अगस्त 2016 को पंजीकृत घोषणा-पत्र के माध्यम से दस्तावेज का निष्पादन स्वीकार किया था।
हाईकोर्ट ने अपील की वैधता को लेकर उठाई गई आपत्ति को पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि रजिस्ट्रेशन एक्ट की धाराओं 71 से 75 को एक साथ पढ़ना जरूरी है। साथ ही, कार्यवाही की वास्तविक प्रकृति और प्राधिकारी द्वारा इस्तेमाल किए गए अधिकार क्षेत्र को भी ध्यान में रखना होगा।
अदालत ने कहा,
“यह मान भी लिया जाए कि जिस वैधानिक प्रावधान के तहत कार्यवाही शुरू की गई, उसका उल्लेख करने या उसका संदर्भ देने में कोई त्रुटि थी, तो केवल इस आधार पर अंतिम आदेश शून्य नहीं हो जाएगा। इसके लिए याचिकाकर्ताओं को यह साबित करना होगा कि पंजीकरण से इनकार किए जाने से जुड़े विवाद पर सुनवाई करने का प्राधिकारी के पास मूल अधिकार क्षेत्र नहीं था या कथित प्रक्रियागत त्रुटि के कारण याचिकाकर्ताओं को वास्तविक नुकसान हुआ।”
दस्तावेज के निष्पादन पर विचार करने के प्राधिकारी के अधिकार के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा कि पंजीकरण की कार्यवाही को स्वामित्व, मालिकाना हक या समझौते के अंतिम प्रवर्तन जैसे जटिल सवालों पर व्यापक न्यायिक सुनवाई में नहीं बदला जा सकता। हालांकि, मौजूदा मामले में दस्तावेज का निष्पादन पंजीकरण से जुड़े वैधानिक सवाल के लिए सीधे प्रासंगिक था। इसलिए प्राधिकारी संबंधित सामग्री की जांच किए बिना अपील का फैसला नहीं कर सकता।
अदालत ने कहा कि सामान्यतः उसे वैधानिक प्राधिकारी के तथ्यात्मक निष्कर्षों के खिलाफ अपीलीय अदालत की तरह दोबारा साक्ष्यों का मूल्यांकन नहीं करना चाहिए। केवल इस वजह से हस्तक्षेप उचित नहीं हो जाता कि साक्ष्यों के आधार पर कोई दूसरा निष्कर्ष भी निकाला जा सकता था।
हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता हस्तलेखन विशेषज्ञ की राय या दस्तावेज के गवाहों की गवाही को अप्रासंगिक अथवा अस्वीकार्य साबित नहीं कर सके। दस्तावेज पर तस्वीर न होने और गवाहों के कथित रूप से हितबद्ध होने की दलीलें भी केवल साक्ष्य के महत्व और विश्वसनीयता के मूल्यांकन से संबंधित थीं।
प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन की दलील को भी अदालत ने खारिज किया। उसने कहा कि पक्षकारों ने लंबे समय तक चली कार्यवाही में भाग लिया, आपत्तियां दाखिल कीं और साक्ष्य रिकॉर्ड पर रखे गए। याचिकाकर्ता यह स्पष्ट नहीं कर सके कि उन्हें कौन-सी महत्वपूर्ण सामग्री प्राधिकारी के सामने रखने से रोका गया।
अदालत ने कहा,
“यह स्थापित सिद्धांत है कि प्राकृतिक न्याय के नियम निष्पक्ष अवसर सुनिश्चित करने के लिए हैं, न कि अंतहीन प्रक्रियागत कार्यवाही पैदा करने के लिए। सुनवाई का अधिकार यह अधिकार नहीं देता कि संबंधित प्राधिकारी को पक्षकार की बात स्वीकार करने के लिए बाध्य किया जा सके।”
इन निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज की और 30 मार्च 2017 के जिला रजिस्ट्रार के आदेश को बरकरार रखा। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी दस्तावेज का पंजीकरण अपने आप में जमीन के मालिकाना हक का फैसला नहीं करता और न ही इससे समझौते के विशिष्ट पालन यानी स्पेसिफिक परफॉर्मेंस का आदेश मिल जाता है।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके फैसले को समझौते की वैधता, प्रवर्तनीयता, उसके विशिष्ट पालन या पक्षकारों के स्वामित्व के अंतिम निर्णय के रूप में नहीं देखा जाएगा। इन मुद्दों पर सिविल कोर्ट अपने गुण-दोष के आधार पर स्वतंत्र रूप से फैसला करेगी।
अदालत ने 22 मई 2017 को जारी यथास्थिति बनाए रखने के अंतरिम आदेश को भी समाप्त कर दिया। विशिष्ट पालन की मांग से संबंधित नियमित वाद संख्या 646/2017 को पक्षकारों की उपस्थिति और आदेश की प्रमाणित प्रति पेश किए जाने के बाद, यथासंभव आठ महीने के भीतर निपटाने की अपेक्षा जताई गई।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके फैसले से हस्तक्षेपकर्ता के स्वतंत्र दावे पर कोई असर नहीं पड़ेगा। हस्तक्षेपकर्ता ने 17 अगस्त 1992 के पंजीकृत विक्रय विलेख के आधार पर गाटा संख्या 367 मिनजुमला की 9 बिस्वा जमीन पर मालिकाना हक का दावा किया था।