फर्जी जाति प्रमाणपत्र के आधार पर मिली आरक्षित नौकरी शुरू से ही अवैध, बर्खास्तगी से पहले विभागीय जांच जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-07-22 10:24 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि किसी व्यक्ति ने फर्जी और जाली जाति प्रमाणपत्र के आधार पर आरक्षित श्रेणी की सरकारी नौकरी हासिल की है, तो उसकी नियुक्ति शुरू से ही (Void Ab Initio) अवैध मानी जाएगी।

ऐसी स्थिति में कर्मचारी को सेवा से हटाने से पहले विभागीय अनुशासनात्मक जांच (Departmental Inquiry) या आरोपपत्र (Charge-sheet) जारी करना आवश्यक नहीं है। केवल कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) देना पर्याप्त होगा।

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सरन की खंडपीठ ने कहा कि "धोखाधड़ी सभी वैधानिक कार्यों को निष्प्रभावी कर देती है। फर्जी जाति प्रमाणपत्र के आधार पर प्राप्त नियुक्ति संविधान के प्रावधानों के विपरीत होने के कारण शुरू से ही अवैध और अस्तित्वहीन (Non-est) होती है।"

क्या था मामला?

उत्तर प्रदेश जेल विभाग में एक व्यक्ति को वर्ष 1992 में अनुसूचित जनजाति (ST) श्रेणी के तहत बंदी रक्षक (Bandi Rakshak) नियुक्त किया गया था। नियुक्ति के लिए उसने खुद को 'लोध' जाति का बताते हुए जाति प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया।

वर्ष 2007 में दस्तावेजों के सत्यापन के दौरान जिला मजिस्ट्रेट, लखनऊ ने बताया कि ऐसा कोई जाति प्रमाणपत्र कभी जारी ही नहीं किया गया था। वहीं, उसके पैतृक गांव में जांच में पता चला कि वह 'लोध' नहीं बल्कि 'लोधी' जाति का है और प्रस्तुत प्रमाणपत्र पूरी तरह फर्जी एवं जाली था।

इसके बाद विभाग ने उसे कारण बताओ नोटिस जारी किया। हालांकि, वह व्यक्तिगत सुनवाई में भी उपस्थित नहीं हुआ। अंततः 28 नवंबर 2007 को उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

एकल न्यायाधीश ने पहले बर्खास्तगी रद्द कर कर्मचारी को राहत दी थी। लेकिन राज्य सरकार की अपील पर खंडपीठ ने उस फैसले को पलट दिया।

खंडपीठ ने कहा कि जब नियुक्ति ही धोखाधड़ी और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर प्राप्त की गई हो, तो वह शुरू से ही शून्य (Void Ab Initio) होती है। ऐसे मामले में अनुच्छेद 311 के तहत मिलने वाली सुरक्षा या पूर्ण विभागीय जांच का अधिकार लागू नहीं होता।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के R. Vishwanatha Pillai v. State of Kerala फैसले का हवाला देते हुए कहा कि फर्जी जाति प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी पाने वाला व्यक्ति वैध रूप से उस पद पर नियुक्त माना ही नहीं जा सकता।

देरी का लाभ नहीं मिलेगा

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि धोखाधड़ी के मामलों में देरी (Delay) कार्रवाई को अवैध नहीं बनाती। यदि वर्षों बाद भी फर्जीवाड़ा सामने आता है, तो सरकार कार्रवाई कर सकती है क्योंकि Fraud vitiates everything और ऐसे मामलों में समय-सीमा (Limitation) लागू नहीं होती।

इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील स्वीकार करते हुए एकल न्यायाधीश का फैसला रद्द कर दिया और कर्मचारी की बर्खास्तगी को बरकरार रखा।

हालांकि, अदालत ने कहा कि अपील लंबित रहने के दौरान कर्मचारी को जो वेतन और अन्य लाभ मिल चुके हैं, उनकी वसूली नहीं की जाएगी।

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