इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शुक्रवार को जनहित याचिका (PIL) खारिज की। इस याचिका में आरोप लगाया गया कि कांवड़ यात्रा के दौरान नॉन-वेज खाना बेचने वाले दुकानदारों को अपनी दुकानें बंद करने के लिए मजबूर या परेशान किया जा रहा था। कोर्ट ने कहा कि यह याचिका जनहित के बजाय 'प्रचार' पाने के मकसद से दायर की गई लगती है।

चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की बेंच ने पाया कि याचिका में उन दुकानदारों के नाम नहीं बताए गए, जिन्हें कथित तौर पर दुकान बंद करने का नोटिस दिया गया, और न ही कोई ठोस वजह बताई गई।

कोर्ट ने यह भी देखा कि याचिकाकर्ता एक वकील हैं। उसने यह PIL गलत इरादे (mala fide) से दायर की, क्योंकि उसी याचिकाकर्ता ने कांवड़ यात्रा के रास्ते पर शराब की दुकानें बंद करने की मांग करते हुए अलग से आवेदन भी दिए।

PIL में आरोप लगाया गया कि कांवड़ यात्रा के दौरान 30 जुलाई से 24 अगस्त, 2026 के बीच नॉन-वेज खाना बेचने वाले दुकानदारों को "दुकानें बंद करने के लिए मजबूर/परेशान" किया जा रहा था।

याचिकाकर्ता ने कथित तौर पर खाली नोटिस पेश किए, जिन पर अमरोहा जिले के अमरोहा नगर पुलिस स्टेशन के इंचार्ज इंस्पेक्टर के हस्ताक्षर थे। दावा किया गया कि ये नोटिस दुकानदारों को दिए गए।

हालांकि, कोर्ट ने गौर किया कि याचिका में 'कहीं भी' उन दुकानदारों के नाम नहीं बताए गए, जिन्हें कथित तौर पर ये नोटिस दिए गए।

बेंच ने कहा कि अगर वास्तव में किसी दुकानदार को नोटिस दिया गया और उस पर कार्रवाई की गई तो "नोटिस/कार्रवाई की वैधता पर सवाल उठाने का अधिकार खुद दुकानदारों को है"।

कोर्ट ने याचिकाकर्ता के व्यवहार पर भी ध्यान दिया और कहा:

"याचिकाकर्ता एक वकील हैं। वह दुकानदारों का पक्ष रखने की कोशिश कर रहे हैं, जो जाहिर तौर पर गलत इरादे (mala fide) से किया गया, क्योंकि उसी याचिकाकर्ता ने 'कांवड़ यात्रा' के रास्ते पर शराब की दुकानें बंद करने की मांग करते हुए आवेदन भी दिए हैं।"

बेंच ने आगे कहा कि ऐसा लगता है कि PIL के अधिकार क्षेत्र का गलत इस्तेमाल करने का मकसद है, जिसकी असली वजह याचिकाकर्ता ही बेहतर जानते हैं।

बेंच ने इस तरह की याचिकाएं दायर करने पर भी आपत्ति जताई, जिनमें न तो कोई ठोस वजह बताई गई, न ही याचिका के समर्थन में कोई सबूत पेश किया गया। साथ ही न ही ऐसी याचिकाएं दायर करने के बारे में कोई खबर छपवाई गई।

कोर्ट ने कहा:

"असली वजह बताए बिना और याचिका के समर्थन में कोई सबूत पेश किए बिना इस तरह की याचिकाएं दायर करना, और फिर इनके दायर होने की खबर छपवाना, असल में 'पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन' (जनहित याचिका) नहीं, बल्कि 'पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन' (प्रचार पाने के लिए दायर याचिका) है; याचिकाकर्ता के ऐसे व्यवहार को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।"

इसी आधार पर बेंच ने PIL याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इसमें "कोई दम नहीं" है।

Case Title: Nasir Farooq vs State of U.P. and 3 others 2026 LiveLaw (AB) 582

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