जयललिता की मौत के मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के तीन रिटायर्ड जजों का आयोग बनाने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की

Update: 2017-11-03 10:01 GMT

तमिलनाडू की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता की मौत  की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के तीन रिटायर्जड जजों की अगवाई में नया आयोग बनाने की मांग वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है।

शुक्रवार को सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने याचिकाकर्ता को कहा कि ये पांचवी कैटेगरी की जनहित याचिका है। इसमें मौत की जांच की मांग की गई है और राज्य सरकार ने भी हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज का आयोग बनाया है। इस पर हाईकोर्ट ने भी दखल देने से इंकार कर दिया। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट इस मामले में क्यों दखल दे ? ये मामला वैसे कार्यपालिका के अधिकारक्षेत्र में आता है।

वहीं याचिकाकर्ता का कहना था कि हाईकोर्ट ने भी इसके लिए सहमति नहीं जताई है। ये जांच अन्य आयोग से होनी चाहिए। लेकिन बेंच ने याचिका को खारिज कर दिया।

गौरतलब है कि जयललिता की 5 दिसंबर, 2016 को चेन्नई के अपोलो अस्पताल में मृत्यु हो गई थी। वकील शिवाबाला मुरुगन के माध्यम से दाखिल याचिका में मद्रास हाईकोर्ट के चार अक्तूबर के आदेश को चुनौती भी दी गई थी जिसमें कहा गया था कि हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अरुमुंगास्वामी के गठित जांच आयोग में किसी तरह के नियमों का उल्लंघन नहीं किया गया है। दरअसल हाईकोर्ट ने वकील पी ए जोसफ की याचिका ये कहते हुए बंद कर दी थी कि जांच आयोग की नियुक्ति  लिए सरकार की राय काफी है और इसके लिए विधानसभा में प्रस्ताव पास करना जरूरी नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में कहा गया था कि हाईकोर्ट ने कमिशन ऑफ इंक्वायरी एक्ट, 1952 की गलत तरीके से व्याख्या की है जिसमें कहा गया है कि ऐसी नियुक्तियों के लिए प्रस्ताव पास होना अनिवार्य है। याचिका में कहा गया कि जयललिता 22 सितंबर, 2016 को बुखार और डिहाइड्रेशन के लिए अपोलो अस्पताल में भर्ती हुई।इसके कुछ वक्त बाद ही अस्पताल ने बयान जारी कर कहा कि जयललिता को निगरानी में रखा गया है और उन्हें अब बुखार नहीं है। साथ ही उन्हें सामान्य खाना दिया जा रहा है।

इसके बाद लगातार AIDMK नेताओं व अस्पताल के बयान आते रहे कि जयललिता को कुछ दिन बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी जाएगी और वो सामान्य कामकाज पर लौट आएंगी। लेकिन इन सबके बावजूद जयललिता की 5 दिसंबर,2016 को मौत हो गई और राज्य सरकार ने जांच के लिए एक आयोग का गठन कर दिया।

याचिकाकर्ता ने कहा था कि अभी तक राज्य सरकार ने इस मामले में किसी भी जांच एजेंसी को शामिल नहीं किया है इसलिए याचिका में दी गई प्रार्थना के तहत जांच आयोग के गठन को आधार मिलता है। राज्य सरकार पूर्व मुख्यमंत्री की संदिग्ध हालात में मौत के मामले की जांच के लिए किसी जांच एजेंसी को शामिल किए जाने पर पूरी तरह मौन है। राज्य सरकार आम जनता को जवाब देने के लिए जवाबदेह है और उसका फर्ज है कि वो इस मौत पर रहस्य के बादलों को हटाए।

याचिका में ये भी कहा गया था कि पूरा सरकारी तंत्र इस पर पर्दा डालने में जुटा है। मौजूदा आयोग निष्पक्ष जांच नहीं कर सकता क्योंकि ये एक इन हाउस जांच है और इस दौरान सबूतों से छेडछाड और पक्षपात की पूरी संभावना है। इसलिए इसका यही समाधान है कि केंद्र सरकार आगे आए और सुप्रीम कोर्ट के तीन रिटायर्ड जजों का आयोग बनाए।

याचिका में कानूनी सवाल भी उठाए गए थे कि क्या संसद या विधानसभा में प्रस्ताव पास किए बिना किसी आयोग का गठन किया जा सकता है  जबकि कमिशन ऑफ इंक्वायरी एक्ट, 1952 इसे अनिवार्य बनाता है ? या जांच आयोग के गठन के लिए क्या प्रस्ताव पास ना होने को छूट दी जा सकती है ? याचिका में हाईकोर्ट के चार अक्तूबर के आदेश को रद्द करने और इस पर अंतरिम रोक लगाने की मांग भी की गई थी।

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