उत्तराखंड हाईकोर्ट ने नेशनल गेम्स कैंप के दौरान नाबालिग खिलाड़ी से रेप के आरोपी हॉकी कोच को ज़मानत दी
Shahadat
11 May 2026 10:30 AM IST

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक नेशनल हॉकी कोच को ज़मानत दी। इस कोच पर POCSO Act के तहत आरोप है कि उसने 2025 के नेशनल गेम्स के लिए चयन हेतु आयोजित हॉकी कैंप में शामिल एक नाबालिग खिलाड़ी के साथ रेप किया।
जस्टिस आलोक मेहरा एक आरोपी द्वारा दायर ज़मानत याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। इस आरोपी को BNS की धारा 64(2)(f) (रेप), 127(2) (गलत तरीके से रोकना) और POCSO Act की धारा 5(N) (बच्चे के रिश्तेदार द्वारा, चाहे खून के रिश्ते, गोद लेने, शादी, अभिभावकत्व, या फोस्टर केयर के ज़रिए हो, या बच्चे के माता-पिता के साथ घरेलू संबंध रखने वाले या बच्चे के साथ एक ही घर में रहने वाले व्यक्ति द्वारा बच्चे के साथ पेनिट्रेटिव यौन हमला करना) और धारा 6 (गंभीर पेनिट्रेटिव यौन हमले के लिए सज़ा) के तहत अपराधों के आरोप में गिरफ्तार किया गया।
शिकायत पीड़िता के पिता ने दर्ज कराई। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें असिस्टेंट हॉकी कोच का फोन आया, जिसने उन्हें बताया कि उनकी बेटी, जो नेशनल गेम्स के लिए चयन हेतु आयोजित हॉकी कैंप में शामिल थी, के साथ आरोपी ने रेप किया। आरोप लगाया गया कि जब शिकायतकर्ता और परिवार के सदस्य हॉस्टल पहुंचे तो पुलिस पहले से ही वहां मौजूद थी और आरोपी को मौके से ही गिरफ्तार कर लिया गया। FIR में आगे कहा गया कि पीड़िता के गुप्तांगों से बहुत ज़्यादा खून बह रहा था।
दूसरी ओर, आरोपी ने मेडिकल जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए यह तर्क दिया कि घटना के समय पीड़िता का मासिक धर्म चल रहा था और डॉक्टर ने अपनी राय में कहा कि इसी वजह से उसे बहुत ज़्यादा ब्लीडिंग हो रही थी। आगे यह भी कहा गया कि मेडिकल सर्टिफिकेट में किसी भी तरह की चोट, वजाइनल स्वैब में किसी जीवित शुक्राणु (Spermatozoa) की मौजूदगी और पीड़िता के गुप्तांगों पर यौन संबंध के किसी भी निशान का ज़िक्र नहीं है।
आरोपी ने आगे यह तर्क दिया कि उसे झूठे आरोपों में फंसाया गया। उसने कहा कि पीड़िता ने कथित तौर पर उस पर टीम में शामिल करने के लिए दबाव डाला था, लेकिन उसने पीड़िता से कहा कि चयन के लिए उसे अपनी प्रतिभा पर भरोसा करना चाहिए।
इसके अलावा, यह भी तर्क दिया गया कि आरोपी पिछले चार सालों से एक मान्यता प्राप्त नेशनल हॉकी कोच है और उसका कोई पिछला आपराधिक इतिहास नहीं है। इस बात पर भी ज़ोर दिया गया कि, हालांकि CCTV फ़ुटेज को सुरक्षित रखने के लिए एक अर्ज़ी दी गई। फिर भी हॉस्टल अधिकारियों ने कोर्ट को बताया कि DVR की मेमोरी भर चुकी थी और उस घटना की रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं थी।
आवेदक ने शिकायतकर्ता और पीड़ित के बयानों में विरोधाभासों की ओर भी इशारा किया, जिसमें शिकायतकर्ता का PW1 के तौर पर दिया गया यह बयान भी शामिल था कि उसने FIR दर्ज नहीं करवाई, बल्कि यह FIR असिस्टेंट हॉकी कोच ने दर्ज करवाई। आगे यह भी तर्क दिया गया कि भले ही FIR में लगाए गए आरोपों को ऊपरी तौर पर सच मान भी लिया जाए, तब भी पूरी घटना का महज़ पंद्रह मिनट के अंदर घटित होना बेहद असंभव प्रतीत होता है।
राज्य सरकार ने ज़मानत की अर्ज़ी का विरोध किया।
कोर्ट ने कहा,
"उपर्युक्त तथ्यों पर विचार करते हुए, और इस बात को भी ध्यान में रखते हुए कि आवेदक 06.01.2026 से ही न्यायिक हिरासत में है, साथ ही इसके अतिरिक्त शिकायतकर्ता और पीड़ित की जाँच-पड़ताल भी पूरी हो चुकी है और अब सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने या गवाहों को प्रभावित करने की कोई गुंजाइश नहीं बची है, यह कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि यह मामला ज़मानत के लिए उपयुक्त है और आवेदक ज़मानत पर रिहा होने का हकदार है। अतः, ज़मानत की अर्ज़ी मंज़ूर की जाती है।"
तदनुसार, आवेदक को निर्देश दिया गया कि वह संबंधित कोर्ट की संतुष्टि के अनुरूप एक निजी मुचलका (Personal Bond) और ज़मानतदार (Sureties) पेश करके ज़मानत पर रिहा हो जाए।

