प्रशासनिक चूक के कारण दावा खारिज नहीं किया जा सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट का मृतक कांस्टेबल की विधवा को ₹25 लाख का बीमा देने का निर्देश
Shahadat
20 April 2026 9:38 AM IST

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि कोई भी बैंक किसी मृतक पुलिस कांस्टेबल की विधवा को आकस्मिक मृत्यु बीमा योजना का लाभ देने से सिर्फ इस आधार पर इनकार नहीं कर सकता कि उसका नाम बीमित कर्मचारियों की सूची में शामिल नहीं था, जबकि यह चूक प्रशासनिक लापरवाही के कारण हुई हो।
यह मामला उत्तराखंड पुलिस के कांस्टेबल की मृत्यु से जुड़ा है। कांस्टेबल की मृत्यु ड्यूटी के दौरान सड़क दुर्घटना में हुई थी। उस समय उसका वेतन खाता (Salary Account) संबंधित बैंक में था। यह देखते हुए कि अधिकारियों के बीच तालमेल की कमी का खामियाजा याचिकाकर्ता को नहीं भुगतना पड़ना चाहिए और बैंक अपनी ही चूक का फायदा नहीं उठा सकता, जस्टिस पंकज पुरोहित ने बीमा योजना के तहत ₹25 लाख का भुगतान करने का निर्देश दिया।
याचिकाकर्ता उत्तराखंड पुलिस के उस कांस्टेबल की विधवा है, जो राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF) में प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर था और 07.08.2021 को ड्यूटी के दौरान एक सड़क दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो गई।
इस बात पर कोई विवाद नहीं था कि मृतक का वेतन खाता 2015 से संबंधित बैंक में था, जिसमें उसका वेतन नियमित रूप से जमा होता था। उस खाते के आधार पर उसे एक ऋण (Loan) भी स्वीकृत किया गया।
संबंधित बैंक ने 12.04.2021 से "कॉम्प्लिमेंट्री पुलिस आकस्मिक मृत्यु बीमा कवर" (Complimentary Police Accidental Death Insurance Cover) नामक एक योजना शुरू की थी। इस योजना के तहत बैंक में वेतन खाता रखने वाले पुलिस कर्मियों को बीमा कवर प्रदान किया जाना था, और इसका प्रीमियम बैंक को ही वहन करना था।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उसके पति इस योजना के तहत आने वाले कर्मचारियों की श्रेणी में पूरी तरह से आते थे, क्योंकि वे एक पुलिस कर्मी थे और उनका वेतन खाता संबंधित बैंक में ही था।
यह भी तर्क दिया गया कि यह योजना अपने आप (Automatic) लागू होने वाली प्रकृति की थी। इसके लिए किसी अलग आवेदन या नामांकन (Nomination) की आवश्यकता नहीं थी - विशेष रूप से इसलिए, क्योंकि इसका प्रीमियम बैंक को ही देना था। याचिकाकर्ता ने आगे कहा कि बैंक को मृतक की स्थिति (Status) के बारे में पूरी जानकारी है, क्योंकि उसका वेतन उसी बैंक में जमा होता था और उसी आधार पर उसे लोन भी दिया गया। इस आधार पर दावा खारिज करने को कि मृतक का नाम कवर किए गए कर्मचारियों की सूची में शामिल नहीं था, मनमाना बताते हुए चुनौती दी गई। यह दलील दी गई कि ऐसी चूक योजना के तहत मिलने वाले अधिकार को खत्म नहीं कर सकती।
प्रतिवादी-बैंक ने यह तर्क दिया कि बीमा कवर केवल उन्हीं कर्मचारियों को दिया गया, जिनके नाम पुलिस विभाग द्वारा उपलब्ध कराए गए विवरणों के आधार पर तैयार की गई 676 कर्मियों की सूची में शामिल थे।
यह दलील दी गई कि चूंकि मृतक का नाम उक्त सूची में शामिल नहीं था, इसलिए उसके संबंध में कोई प्रीमियम जमा नहीं किया गया। इसलिए कोई लाभ नहीं दिया जा सकता। बैंक ने आगे यह तर्क दिया कि सभी पुलिस कर्मियों का स्वतः समावेश नहीं होता था और सही विवरण उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी पुलिस विभाग की थी।
न्यायालय ने यह पाया कि यह निर्विवाद था कि मृतक एक पुलिस कर्मी था, कि उसका वेतन खाता प्रतिवादी-बैंक में था। साथ ही यह कि उसकी मृत्यु योजना के प्रभावी रहने की अवधि के दौरान हुई।
दावा खारिज करने का एकमात्र आधार कवर किए गए कर्मचारियों की सूची में उसके नाम का शामिल न होना था। न्यायालय ने यह माना कि ऐसी चूक बैंक और पुलिस विभाग के बीच समन्वय की कमी से उत्पन्न एक प्रशासनिक चूक थी, जिसके लिए याचिकाकर्ता को नुकसान नहीं उठाना पड़ सकता था।
न्यायालय ने आगे यह भी टिप्पणी की कि बैंक मृतक की स्थिति के बारे में जानकारी न होने का बहाना नहीं बना सकता, यह देखते हुए कि उसका वेतन कई वर्षों से अकाउंट में जमा किया जा रहा था और उस खाते के विरुद्ध एक ऋण भी स्वीकृत किया गया। प्रीमियम के भुगतान न होने के संबंध में दिए गए तर्क को भी खारिज कर दिया गया, क्योंकि योजना में ही यह प्रावधान था कि प्रीमियम का वहन बैंक द्वारा किया जाएगा।
यह मानते हुए कि बैंक अपनी ही चूक का लाभ नहीं उठा सकता, न्यायालय ने लाभ देने से इनकार करने को मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करने वाला पाया।
परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने दावा खारिज करने वाला विवादित आदेश रद्द किया और प्रतिवादी-बैंक को निर्देश दिया कि वह बीमा योजना के तहत याचिकाकर्ता को ₹25 लाख का भुगतान करे। साथ ही अधिकार प्राप्त होने की तिथि से लेकर वास्तविक भुगतान की तिथि तक 5% प्रति वर्ष की दर से ब्याज का भी भुगतान करे।
तदनुसार, रिट याचिका स्वीकार की गई।
Case Name: Damyanti Negi v State of Uttarakhand

