'रोमांटिक रिश्ता या शादी का प्रस्ताव POCSO Act के असर को कम नहीं कर सकता': नाबालिग के यौन उत्पीड़न मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने ज़मानत देने से इनकार किया
Shahadat
29 Aug 2026 8:50 PM IST

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि "रोमांटिक रिश्ते और उसके बाद शादी के प्रस्ताव की दलील POCSO Act के तहत नाबालिग बच्चे को मिली कानूनी सुरक्षा को कम नहीं कर सकती," और यह दोहराया कि कानून की नज़र में नाबालिग की सहमति "पूरी तरह से अप्रासंगिक" है।
मौजूदा मामले में इसे लागू करते हुए कोर्ट ने इस आरोप पर भी ध्यान दिया कि आरोपी ने नाबालिग का भरोसा जीतने के लिए अपनी धार्मिक पहचान छिपाई थी। उसकी उम्र, गर्भावस्था की मेडिकल स्थिति और POCSO Act के तहत सहमति पर कानूनी रोक को देखते हुए कोर्ट ने आरोपी को ज़मानत देने से इनकार किया।
जस्टिस राकेश थपलियाल ने आरोपी द्वारा दायर पहली ज़मानत अर्जी पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया।
जांच के बाद उस पर BNSS, 2023 की धारा 137(2), धारा 96 के साथ धारा 64 और 'बच्चों का यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम' (POCSO Act), 2012 की धारा 5(l) और 6 के तहत आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल किया गया।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता के लापता होने के संबंध में शुरू में 28 जून, 2025 को FIR दर्ज की गई। जांच के दौरान, आरोपी का नाम सामने आया और गुमशुदगी की रिपोर्ट को नियमित FIR में बदल दिया गया। बाद में पीड़िता को आरोपी के साथ ऋषिकेश रेलवे प्लेटफॉर्म से बरामद किया गया।
अपने बयान में पीड़िता ने कहा कि वह आरोपी को 2024 से जानती थी और वे इंस्टाग्राम के ज़रिए बातचीत और चैटिंग करते थे। उसने आरोप लगाया कि मार्च 2024 में आरोपी उसे बाहर ले जाने के बहाने जंगल ले गया, ज़बरदस्ती शारीरिक संबंध बनाए और घटना के बारे में किसी को न बताने की धमकी दी। अभियोजन पक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि इसके बाद आरोपी उसे होटलों सहित कई जगहों पर ले गया।
इसके अलावा, पीड़िता गर्भवती हो गई और 15 अक्टूबर, 2025 को उसने एक बच्चे को जन्म दिया। इसके बाद उसका ब्लड सैंपल लिया गया और DNA मिलान के लिए FSL भेजा गया। साथ ही अभियोजन पक्ष ने उसके इस बयान पर भी भरोसा किया कि उसे आरोपी की धार्मिक पहचान (उसके मुस्लिम समुदाय का सदस्य होने) के बारे में पता नहीं था। इसके उलट, आरोपी ने दलील दी कि वह बेगुनाह है और उसे झूठे मामले में फंसाया गया। उसने बताया कि FIR में उसका नाम नहीं था और उसे सिर्फ़ शक के आधार पर फंसाया गया और उसके ख़िलाफ़ चार्जशीट दाखिल की गई।
इसके अलावा, यह भी कहा गया कि FIR बहुत देर से दर्ज होने के बावजूद पीड़िता के बयान में मार्च 2024 की कथित घटना का ज़िक्र था। आरोपी के मुताबिक, इससे पता चलता है कि POCSO Act के तहत मामला बनाने के लिए जान-बूझकर इस घटना को शामिल किया गया। उम्र के सवाल पर वकील ने कहा कि कथित घटना की तारीख, यानी 27 जून 2025 को पीड़िता 19 साल की थी। और अगर मार्च 2024 की घटना को भी ध्यान में रखा जाए तो भी उसके स्कूल सर्टिफिकेट के अनुसार वह लगभग 17 साल 9 महीने की, जिससे उसकी उम्र को लेकर गंभीर संदेह पैदा होता है।
यह भी तर्क दिया गया कि FIR पीड़िता के पिता द्वारा दर्ज कराई गई झूठी और मनगढ़ंत कहानी है, जो उन्हें तब पता चली जब उन्हें पता चला कि वह छह महीने की गर्भवती है। आखिर में, यह कहा गया कि आरोपी, जो पेशे से पेंटर है, पीड़िता से बहुत प्यार करता था और रिश्ते को कानूनी मान्यता देने और उनके शारीरिक संबंधों से पैदा होने वाले बच्चे का भविष्य सुरक्षित करने के लिए उससे शादी करने को तैयार है।
राज्य ने ज़मानत अर्ज़ी का विरोध करते हुए कहा कि पीड़िता स्कूल जाने वाली नाबालिग थी, जिसकी सहमति का कानून में कोई महत्व नहीं है। यह भी कहा गया कि आरोपी ने जानबूझकर अपनी धार्मिक पहचान छिपाई और नाबालिग को फंसाया, जिसके कारण वह गर्भवती हो गई। राज्य ने कोर्ट को यह भी बताया कि पीड़िता और उसके माता-पिता शादी के किसी भी प्रस्ताव के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थे और आरोपी के खिलाफ़ सख़्त कार्रवाई चाहते थे।
राज्य ने मेडिकल रिपोर्ट और डॉक्टर के बयान का हवाला देते हुए कहा कि आरोपी ने नाबालिग पीड़िता का यौन शोषण किया। अपराध की गंभीरता और धार्मिक पहचान छिपाने के आरोप को देखते हुए, वह ज़मानत का हकदार नहीं है।
मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा:
“यह कोर्ट दोनों पक्षों के वकीलों की दलीलों पर ध्यान से विचार कर रहा है। मेडिकल सबूत और स्कूल के रिकॉर्ड से प्रथम दृष्टया यह साबित होता है कि कथित घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी। चूंकि आरोपी पर POCSO Act के तहत आरोप तय किए गए , इसलिए कानून की नज़र में नाबालिग की सहमति पूरी तरह से अप्रासंगिक है। प्रेम संबंध और बाद में शादी के प्रस्ताव की दलील POCSO Act के तहत नाबालिग बच्चे को मिली कानूनी सुरक्षा को कमज़ोर नहीं कर सकती।
इसके अलावा, अभियोजन पक्ष ने नाबालिग का भरोसा जीतने के लिए धार्मिक पहचान छिपाने का गंभीर आरोप लगाया। अब, पीड़िता की उम्र, उसके गर्भवती होने की मेडिकल सच्चाई और POCSO Act के तहत सहमति पर कानूनी रोक को देखते हुए यह कोर्ट आरोपी को ज़मानत पर रिहा करने के लिए इसे उपयुक्त मामला नहीं मानता। इसलिए मौजूदा आरोपी की ज़मानत अर्ज़ी खारिज की जाती है।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आदेश में की गई टिप्पणियां ट्रायल की कार्यवाही को प्रभावित नहीं करेंगी और ट्रायल कोर्ट मामले के गुण-दोष के आधार पर आगे बढ़ने के लिए स्वतंत्र है।
Case: T Versus State Of Uttarakhand


