ज़मीन वन भूमि नहीं पाई गई: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 'सैन्य धाम' युद्ध स्मारक के निर्माण के खिलाफ PIL खारिज की

Shahadat

2 April 2026 7:36 PM IST

  • ज़मीन वन भूमि नहीं पाई गई: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सैन्य धाम युद्ध स्मारक के निर्माण के खिलाफ PIL खारिज की

    उत्तराखंड हाई कोर्ट ने देहरादून में 'सैन्य धाम' नाम के युद्ध स्मारक के निर्माण को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) खारिज की। कोर्ट ने यह फैसला देते हुए कहा कि राजस्व और वन अधिकारियों द्वारा किए गए एक संयुक्त सर्वेक्षण में यह ज़मीन वन भूमि नहीं पाई गई। कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब सक्षम अधिकारियों ने ज़मीन का निरीक्षण कर यह प्रमाणित कर दिया कि यह वन भूमि का हिस्सा नहीं है तो याचिका में उठाई गई चुनौती का मूल आधार ही खत्म हो जाता है, जिससे यह आधार कानूनी रूप से टिकने लायक नहीं रह जाता।

    जस्टिस मनोज कुमार तिवारी और जस्टिस सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने इस परियोजना में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और रिट याचिका खारिज की।

    याचिकाकर्ता देहरादून में वकालत करते हैं। उन्होंने हाईकोर्ट में यह आरोप लगाते हुए याचिका दायर की थी कि राज्य सरकार गुनियाल गांव में युद्ध स्मारक का निर्माण कार्य शुरू कर रही है, जबकि उसने पहले ज़मीन की वास्तविक प्रकृति का पता नहीं लगाया।

    याचिकाकर्ता के अनुसार, जिस ज़मीन पर स्मारक बनाया जा रहा था, वह वन भूमि का हिस्सा थी। इसलिए वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति के बिना इस ज़मीन का उपयोग गैर-वन कार्यों के लिए नहीं किया जा सकता था। इसी आधार पर याचिका में कई तरह की राहतें मांगी गईं, जिनमें निर्माण कार्य रोकने, ज़मीन को वन विभाग को हस्तांतरित करने, और वन भूमि के कथित अवैध उपयोग और अतिक्रमण के संबंध में कार्रवाई शुरू करने के निर्देश शामिल थे। इसके अलावा, इस मामले की जांच के लिए CBI जांच या एक विशेष जांच दल (SIT) गठित करने की भी प्रार्थना की गई।

    याचिका का विरोध करते हुए एडवोकेट जनरल ने राजस्व और वन अधिकारियों द्वारा किए गए संयुक्त सर्वेक्षण की रिपोर्ट का हवाला दिया। यह रिपोर्ट रिकॉर्ड का हिस्सा थी, उस पर वन रेंज अधिकारी, वनपाल (Forester), राजस्व उप-निरीक्षक और संबंधित क्षेत्र के तहसीलदार सहित अन्य अधिकारियों के हस्ताक्षर थे।

    संयुक्त निरीक्षण रिपोर्ट में यह दर्ज किया गया कि विवादित ज़मीन वन भूमि का हिस्सा नहीं है। इसमें यह भी उल्लेख किया गया कि वन अधिकारियों को युद्ध स्मारक के निर्माण के उद्देश्य से इस ज़मीन के आवंटन पर कोई आपत्ति नहीं है।

    एडवोकेट जनरल ने आगे यह भी बताया कि स्मारक का निर्माण कार्य 2021 में शुरू हुआ और अब यह लगभग पूरा हो चुका है, जिसका उद्घाटन निकट भविष्य में होने की उम्मीद है। रिकॉर्ड पर रखी गई संयुक्त निरीक्षण रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि ज़मीन का निरीक्षण राजस्व और वन, दोनों ही अधिकारियों द्वारा विधिवत किया गया। यह स्पष्ट निष्कर्ष दर्ज किया गया था कि यह वन भूमि नहीं है।

    ऐसी परिस्थितियों में न्यायालय ने यह माना कि जिस मुख्य आधार पर यह रिट याचिका दायर की गई—यानी, यह कि वन भूमि का उपयोग गैर-वन कार्यों के लिए किया जा रहा है—वह रिकॉर्ड से सिद्ध नहीं होता है।

    तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने यह निर्णय दिया कि इस मामले में हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है।

    न्यायालय ने कहा,

    "ऊपर बताए गए तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए यह न्यायालय इस मामले में हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं पाता है। चूंकि वन अधिकारियों ने ज़मीन का निरीक्षण किया। यह प्रमाणित किया कि यह वन भूमि का हिस्सा नहीं है, इसलिए युद्ध स्मारक के निर्माण को चुनौती देने के लिए याचिकाकर्ता द्वारा उठाया गया आधार कानूनी रूप से मान्य नहीं है। अतः, इसमें हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है।"

    सर्वेक्षण के निष्कर्षों के आलोक में इस चुनौती को कानूनी रूप से अमान्य मानते हुए रिट याचिका खारिज कर दी गई।

    Case Name: Vikesh Singh Negi v State of Uttarakhand and Ors

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