CrPC की धारा 125(3) के तहत एक साल की समय-सीमा DV Act के तहत मेंटेनेंस की वसूली के लिए वेतन की कुर्की को नहीं रोकती: तेलंगाना हाईकोर्ट
Shahadat
5 Sept 2026 8:39 PM IST

तेलंगाना हाईकोर्ट ने कहा कि CrPC की धारा 125(3) के पहले प्रावधान (Proviso) के तहत एक साल की समय-सीमा तभी लागू होती है, जब कोई व्यक्ति उस प्रावधान के तहत बकाया मेंटेनेंस की वसूली के लिए वारंट की मांग करता है।
यह मेंटेनेंस के बकाया को खत्म नहीं करता और न ही 'महिलाओं को घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, 2005' (DV एक्ट) की धारा 20(6) के तहत सैलरी अटैचमेंट को रोकता है।
CrPC की धारा 125(3) का पहला प्रावधान रिकवरी वारंट जारी करने से रोकता है, जब तक कि मेंटेनेंस की रकम बकाया होने के एक साल के भीतर आवेदन न किया जाए। DV Act की धारा 20(6) अलग से मजिस्ट्रेट को यह अधिकार देती है कि वे प्रतिवादी (Respondent) के नियोक्ता (Employer) को निर्देश दें कि वे बकाया मौद्रिक राहत (Monetary Relief) को उनकी सैलरी से काट लें।
जस्टिस एन. तुकारामजी ने कहा कि यह प्रावधान केवल धारा 125(3) के तहत वारंट-आधारित वसूली प्रक्रिया को सीमित करता है, न कि मूल मेंटेनेंस दायित्व को खत्म करता है और न ही DV Act के तहत दी गई स्वतंत्र प्रवर्तन प्रक्रिया (Enforcement Mechanism) को रोकता है।
सिंगल जज बेंच ने कहा:
“इस प्रकार, धारा 125(3) का पहला प्रावधान उस प्रावधान के तहत जबरन वसूली की प्रक्रिया के इस्तेमाल को सीमित करता है, लेकिन यह अपने आप में मेंटेनेंस दायित्व की संतुष्टि, छूट, समाप्ति या मुक्ति के बराबर नहीं है। एक साल की अवधि समाप्त होने से संबंधित बकाया राशि के लिए धारा 125(3) के तहत वारंट जारी करने पर रोक लग सकती है, लेकिन यह धारा 128 के तहत अलग प्रवर्तन प्रक्रिया में उसी सीमा को चुपचाप लागू नहीं करता है। इसलिए कानूनी व्यवस्था प्रवर्तन के तरीके और लागू किए जाने वाले मूल दायित्व के बीच आवश्यक अंतर को बनाए रखती है।”
याचिकाकर्ता की पत्नी ने 2012 में DV Act के तहत कार्यवाही शुरू की थी। 25 अप्रैल, 2016 के आदेश द्वारा मजिस्ट्रेट ने उन्हें रहने की जगह देने या ₹5,000 प्रति माह किराया देने और उनके दो बच्चों में से प्रत्येक को ₹5,000 प्रति माह देने का निर्देश दिया। ₹5 लाख का मुआवजा भी दिया गया।
अपील में, मुआवजे को घटाकर ₹3 लाख कर दिया गया, जबकि बाकी निर्देश बरकरार रखे गए। इन निर्देशों का पालन न करने का आरोप लगाते हुए पत्नी ने बकाया राशि की वसूली के लिए याचिकाकर्ता की सैलरी अटैच करने (जब्त करने) की मांग की। मजिस्ट्रेट ने 4 जून, 2024 को उसकी अर्ज़ी मंज़ूर कर ली, जिसके बाद यह याचिका दायर की गई।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए एम. रतन सिंह ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता पुलिस विभाग से सस्पेंड था और उसे हर महीने लगभग ₹57,000 का गुज़ारा भत्ता (Subsistence Allowance) मिल रहा था। उनकी पत्नी, जो हेड कॉन्स्टेबल के तौर पर काम करती थीं, कथित तौर पर हर महीने लगभग ₹1.07 लाख कमा रही थीं।
पत्नी की ओर से पेश हुए असिस्टेंट पब्लिक प्रॉसिक्यूटर एम. विवेकानंद रेड्डी और ओ. अनिता ने कहा कि गुज़ारा भत्ता (मेंटेनेंस) का आदेश अंतिम हो चुका है, लेकिन उसका भुगतान नहीं किया गया। उन्होंने तर्क दिया कि अटैचमेंट का आदेश DV Act की धारा 20(6) के तहत दिया गया, जिसमें एक साल की समय-सीमा तय नहीं है।
कोर्ट ने माना कि आर्थिक दायित्व (Monetary Liability) DV Act की धारा 20 के तहत अंतिम आदेश से उत्पन्न हुआ, न कि CrPC की धारा 125 के तहत आदेश से।
कोर्ट ने बताया कि धारा 20(6) एक अलग लागू करने की प्रक्रिया (Enforcement Mechanism) बनाती है। जहां आर्थिक राहत का भुगतान नहीं किया जाता, वहां मजिस्ट्रेट प्रतिवादी (Respondent) के नियोक्ता (Employer) या देनदार (Debtor) को निर्देश दे सकते हैं कि वे पीड़ित व्यक्ति को सीधे भुगतान करें, या प्रतिवादी की देय मज़दूरी, सैलरी या कर्ज़ का कुछ हिस्सा कोर्ट में जमा करें।
कोर्ट ने आगे कहा कि किसी एक कानूनी वसूली प्रक्रिया से जुड़ी पाबंदी को किसी दूसरे कानून द्वारा दी गई स्वतंत्र लागू करने की शक्ति पर अपने-आप लागू नहीं किया जा सकता है।
चूंकि दायित्व DV Act की धारा 20 के तहत अंतिम आर्थिक-राहत आदेश से उत्पन्न हुआ और सैलरी अटैचमेंट का आदेश धारा 20(6) के तहत दिया गया, इसलिए CrPC की धारा 125(3) के तहत एक साल की समय-सीमा ने अटैचमेंट को अमान्य नहीं किया।
इसके अनुसार, आपराधिक याचिका खारिज कर दी गई।
Case Title: J. Tilak Raj & Ors. v. State of Telangana & Anr.


