जल्द सुनवाई का अधिकार NDPS Act की धारा 37 के तहत ज़मानत की शर्तों की जगह नहीं ले सकता: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

24 April 2026 5:07 PM IST

  • जल्द सुनवाई का अधिकार NDPS Act की धारा 37 के तहत ज़मानत की शर्तों की जगह नहीं ले सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि अनुच्छेद 21 के तहत जल्द सुनवाई का अधिकार, नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेस एक्ट, 1987 (NDPS Act) के तहत ज़मानत देने के लिए तय सख्त कानूनी ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता।

    कोर्ट ने कहा,

    "संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जल्द सुनवाई का अधिकार निस्संदेह एक कीमती संवैधानिक गारंटी है। हालांकि, NDPS Act जैसे खास कानून के संदर्भ में, जो कमर्शियल मात्रा से जुड़े मामलों से निपटता है, इस अधिकार को धारा 37 के आदेश के साथ-साथ पढ़ा जाना चाहिए, न कि उसकी जगह पर।"

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा दो आरोपियों को दी गई ज़मानत के आदेशों को रद्द किया। यह मामला हेरोइन की कमर्शियल मात्रा की बरामदगी से जुड़ा था। बेंच ने आरोपियों को निर्देश दिया कि वे एक हफ़्ते के अंदर ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करें।

    मामले की पृष्ठभूमि

    यह मामला 10 जनवरी, 2024 को पंजाब के तरन तारन ज़िले के खालरा पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR से जुड़ा है। पुलिस बैरिकेड पर वाहनों की चेकिंग के दौरान, अधिकारियों ने एक कार को रोका और उसमें से हेरोइन के तीन पैकेट बरामद किए, जिनका कुल वज़न 1.465 किलोग्राम था। Act के तहत इसे कमर्शियल मात्रा माना जाता है।

    NDPS Act की धारा 21(c) और 29 के तहत आरोप तय किए गए। हाईकोर्ट ने आरोपियों को मुख्य रूप से इस आधार पर नियमित ज़मानत दी थी कि वे दो साल से ज़्यादा समय से हिरासत में थे, अभियोजन पक्ष के चौबीस गवाहों में से केवल दो की ही गवाही हो पाई थी। हिरासत में बने रहने से संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनके जल्द सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन होगा।

    सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

    सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि प्रतिबंधित पदार्थों की कमर्शियल मात्रा से जुड़े मामलों में NDPS Act की धारा 37(1)(b)(ii) के तहत तय दोहरी शर्तें अनिवार्य हैं और ज़मानत देने से पहले इन शर्तों का पूरा होना ज़रूरी है। धारा 37 के अनुसार, ज़मानत देने के लिए अदालत को इन दो शर्तों के पूरा होने पर अपनी संतुष्टि दर्ज करनी होती है:

    (i) यह मानने के लिए उचित आधार हैं कि आरोपी उस अपराध का दोषी नहीं है।

    (ii) इस बात की संभावना नहीं है कि आरोपी ज़मानत पर रहते हुए कोई और अपराध करेगा।

    ऐसी संतुष्टि दर्ज न करने पर ज़मानत का आदेश कानूनी रूप से मान्य नहीं रह जाता। इस संबंध में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो बनाम काशिफ़, मेघालय राज्य बनाम लालरिंटलुआंगा सैलो और अन्य आदि मामलों में दिए गए फ़ैसलों का हवाला दिया गया।

    परविंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य मामले का भी हवाला दिया गया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की थी कि पंजाब राज्य में नशे की समस्या को देखते हुए ऐसे मामलों में ज़मानत देते समय अदालतों को बहुत ज़्यादा सावधानी बरतनी चाहिए।

    हाईकोर्ट के आदेश की आलोचना करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की:

    "विवादित आदेश, जैसा कि उसमें खुद ही कहा गया, NDPS Act की धारा 37(1)(b)(ii) के तहत अनिवार्य संतुष्टि को दर्ज नहीं करता है। ऐसी संतुष्टि दर्ज करने के बजाय हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि 'जल्द सुनवाई के अधिकार को ध्यान में रखते हुए NDPS Act की धारा 37 की सख़्ती को कम किया जा सकता है।' ऐसा दृष्टिकोण इस अदालत द्वारा स्थापित तय कानून के साफ़ तौर पर विपरीत है और केवल इसी आधार पर इसे रद्द किया जाना चाहिए।"

    Case : State of Punjab v Sukhwinder Singh @ Gora

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