पुलिस का यह कहना कि 'चार्जशीट दाखिल करने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद है', इसका मतलब यह नहीं कि डिफ़ॉल्ट ज़मानत दी जा सकती है: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
21 Sept 2026 8:15 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (21 सितंबर) को कहा कि जांच एजेंसी का जांच की अवधि बढ़ाने के लिए आवेदन में सिर्फ़ यह कहना कि चार्जशीट दाखिल करने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद है, इसे जांच पूरी होने के तौर पर नहीं देखा जा सकता।
दूसरे शब्दों में, कोर्ट ने कहा कि जब कोई जांच एजेंसी समय बढ़ाने की मांग करते हुए यह कहती है कि चार्जशीट दाखिल करने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद है, लेकिन उसे उपलब्ध सामग्री - जिसमें गवाहों के बयान, बैंक रिकॉर्ड, इलेक्ट्रॉनिक सबूत और जांच से जुड़ी अन्य जानकारी शामिल है - का विश्लेषण और मिलान करने के लिए अतिरिक्त समय चाहिए तो केवल उस बयान के आधार पर समय बढ़ाने के आवेदन को खारिज नहीं किया जा सकता।
कोर्ट के अनुसार, सिर्फ़ यह दावा करना कि चार्जशीट दाखिल करने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद है, अपने आप में यह साबित नहीं करता कि जांच पूरी हो गई है या आरोपी को डिफ़ॉल्ट ज़मानत का अधिकार मिल जाता है।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फ़ैसले को रद्द किया, जिसमें गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA) के तहत एक मामले में प्रतिवादी-आरोपियों को डिफ़ॉल्ट ज़मानत दी गई थी। हाईकोर्ट ने आरोपियों को डिफ़ॉल्ट ज़मानत इस आधार पर दी थी कि एजेंसी द्वारा जांच की अवधि को और 15 दिनों के लिए बढ़ाने के लिए दायर दूसरी अर्ज़ी - शुरुआती 90 दिनों की अवधि और 30 दिनों के पहले विस्तार के बाद - को स्पेशल कोर्ट ने गलत तरीके से मंज़ूरी दी थी।
हाईकोर्ट के अनुसार, एजेंसी द्वारा यह कहने के बावजूद कि चार्जशीट दाखिल करने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद है, एजेंसी को दूसरा विस्तार गलत तरीके से दिया गया। हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष के इस बयान को कि चार्जशीट दाखिल करने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद है, इस बात की मंज़ूरी माना कि जांच पूरी हो गई।
हाईकोर्ट के नज़रिए से असहमति जताते हुए जस्टिस चंद्रशेखर द्वारा लिखे गए फ़ैसले में कहा गया कि हाईकोर्ट ने विस्तार आवेदन में अभियोजन पक्ष के इस बयान पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा करके गलती की कि चार्जशीट दाखिल करने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद थी, जबकि उसने आवेदन के असली मकसद की जांच नहीं की। वास्तव में, अभियोजन पक्ष ने जांच के दौरान पहले से इकट्ठा की गई सामग्री - जिसमें गवाहों के बयान, बैंक रिकॉर्ड, इलेक्ट्रॉनिक सबूत और जांच से जुड़ी अन्य जानकारी शामिल है - का विश्लेषण और मिलान करने के लिए दूसरा विस्तार मांगा था।
कोर्ट ने कहा,
“अभियोजन पक्ष (Prosecution) का यह बयान कि चार्जशीट दाखिल करने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद है, इसे कोर्ट इस तरह नहीं समझ सकता कि मामले की जांच पूरी हो गई। अभियोजन पक्ष की ओर से दिए गए ऐसे बयान का इस्तेमाल उसके खिलाफ़ ATS की जांच पूरी करने या आगे की जांच करने की शक्ति को सीमित करने के लिए नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने दूसरे एक्सटेंशन आवेदन में दिए गए एक अकेले बयान का गलत अर्थ निकालकर यह मान लिया कि जांच पूरी हो गई थी, जो एक गंभीर गलती थी।”
कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि “किसी दस्तावेज़ को पूरा पढ़ना चाहिए, न कि टुकड़ों में।”
इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट मामले के दायरे से बाहर जाकर UAPA की धारा 45 के तहत मंज़ूरी देने के मुद्दे पर चर्चा करने लगा, ताकि अधिनियम के अध्याय III में बताए गए अपराधों के लिए दोषियों पर मुकदमा चलाया जा सके। धारा 45 साफ़ तौर पर कोर्ट को केंद्र सरकार या अधिकृत अधिकारी की पूर्व लिखित मंज़ूरी के बिना अध्याय III के तहत किसी भी अपराध का संज्ञान लेने से रोकती है।
कोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट के सामने सवाल यह नहीं था कि संज्ञान लेने या चार्जशीट दाखिल करने के लिए UAPA की धारा 45 के तहत मंज़ूरी ज़रूरी है या नहीं। बल्कि, मुख्य सवाल यह है कि क्या हाईकोर्ट यह मान सकता है कि जांच पूरी हो गई। इस तरह स्पेशल कोर्ट द्वारा दिए गए एक्सटेंशन को अमान्य कर सकता है।
कोर्ट ने कहा,
“मुकदमा चलाने की मंज़ूरी पर पूरी चर्चा ही गलत दिशा में है। हाईकोर्ट ने चार्जशीट दाखिल करने के लिए समय बढ़ाने के अभियोजन पक्ष के मामले के मुख्य बिंदु को नज़रअंदाज़ कर दिया। यह चर्चा अनावश्यक है कि क्या उचित सरकार से मुकदमा चलाने की मंज़ूरी लेने के आधार पर अभियोजन पक्ष को चार्जशीट दाखिल करने के लिए समय बढ़ाया जा सकता है, मानो जांच पूरी हो गई हो और चार्जशीट कोर्ट में दाखिल करने के लिए तैयार हो। चार्जशीट दाखिल करने के लिए अभियोजन पक्ष को समय का दूसरा एक्सटेंशन देने वाले 18 जनवरी 2023 के आदेश में दखल देने का हाईकोर्ट का फ़ैसला साफ़ तौर पर गलत है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।”
ऊपर बताई गई बातों के आधार पर अपील मंज़ूर की गई और प्रतिवादी-आरोपियों को दी गई डिफ़ॉल्ट ज़मानत रद्द कर दी गई।
Cause Title: THE STATE OF MAHARASHTRA & ANR. VERSUS MOMIN MOIUDDIN GULAM HASAN @ MOIN MISTRI & ANR.

