'CrPC की धारा 156(3) और 200 के लिए मापदंड अलग-अलग': दूसरी बार धारा 156(3) के तहत याचिका की अनुमति देने वाला आदेश रद्द
Shahadat
5 May 2026 4:43 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 156(3) और 200 को लागू करने वाले मापदंड अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हैं। इसके साथ ही कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें मजिस्ट्रेट के उस निर्देश को सही ठहराया गया था कि CrPC की धारा 156(3) के तहत दूसरी अर्जी पर FIR दर्ज की जाए।
CrPC की धारा 156(3) के तहत यह दूसरी अर्जी शिकायतकर्ता ने हाई कोर्ट द्वारा दी गई उस छूट (liberty) के आधार पर दायर की थी, जिसमें उसे पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट के खिलाफ CrPC की धारा 200 के तहत एक निजी शिकायत दायर करने की अनुमति दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब धारा 200 के तहत निजी शिकायत दायर करने की छूट दी गई तो धारा 156(3) के तहत अर्जी दायर नहीं की जा सकती, मानो दोनों एक ही हों।
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिसवार सिंह की खंडपीठ ने टिप्पणी की कि शिकायतकर्ता द्वारा धारा 156(3) का दूसरी बार सहारा लेना—जबकि पहले उसकी अर्जी खारिज हो चुकी थी और एक प्रारंभिक जांच के बाद कार्यवाही बंद की गई—कानूनन गलत है।
यह मामला लंबी प्रक्रियागत इतिहास से जुड़ा है, जिसमें शिकायतकर्ता ने बार-बार CrPC की धारा 156(3) को लागू करने की कोशिशें की थीं। शिकायतकर्ता ने सबसे पहले 2022 में न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने धारा 156(3) के तहत एक अर्जी दायर की, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने मद्रास हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसने पुलिस को प्रारंभिक जांच करने का निर्देश दिया। इसके बाद पुलिस ने दिसंबर 2022 में क्लोजर रिपोर्ट (मामला बंद करने की रिपोर्ट) दायर की।
क्लोजर रिपोर्ट से असंतुष्ट होकर शिकायतकर्ता ने 2023 में फिर से हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने उसकी चुनौती को तो खारिज किया, लेकिन उसे CrPC की धारा 200 के तहत निजी शिकायत दायर करने की छूट दी। इस कानूनी उपाय का लाभ उठाने के बजाय शिकायतकर्ता ने मई, 2024 में नई अर्जी दायर की। वह भी फिर से CrPC की धारा 156(3) के तहत।
इस अर्जी पर कार्रवाई करते हुए मजिस्ट्रेट ने FIR दर्ज करने का निर्देश दे दिया। आरोपी ने हाईकोर्ट में FIR को चुनौती दी, लेकिन FIR रद्द करने की याचिका खारिज की गई, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में एक SLP (विशेष अनुमति याचिका) दायर की गई।
सुप्रीम कोर्ट के सामने आरोपी ने यह तर्क दिया कि मजिस्ट्रेट के FIR दर्ज करने के निर्देश को सही ठहराकर हाईकोर्ट ने असल में 'निजी शिकायत' के उपाय को CrPC की धारा 156(3) के तहत आने वाले उपाय में बदल दिया है; जो कि गलत है, खासकर तब जब उस प्रावधान के तहत दायर पहली याचिका पहले ही खारिज हो चुकी थी।
विवादित आदेश रद्द करते हुए कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि हाईकोर्ट ने दूसरी बार में FIR दर्ज करने के मजिस्ट्रेट के आदेश को सही ठहराकर गलती की, क्योंकि उसने इस तथ्य को नज़रअंदाज़ कर दिया कि FIR दर्ज करने की मांग वाली एक पिछली याचिका पहले ही खारिज हो चुकी थी।
कोर्ट ने यह भी कहा कि मुकदमे के पिछले दौर में हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता को स्पष्ट रूप से यह छूट दी थी कि वह CrPC की धारा 200 के तहत 'निजी शिकायत' दायर करके मजिस्ट्रेट से संपर्क कर सकता है।
हालांकि, इस निर्देश की अनदेखी करते हुए मजिस्ट्रेट ने CrPC की धारा 156(3) के तहत दायर दूसरी याचिका स्वीकार की और उस पर कार्रवाई की; जिसे बाद में हाईकोर्ट ने भी गलत तरीके से सही ठहरा दिया।
कोर्ट ने यह फैसला दिया कि यह मजिस्ट्रेट द्वारा किया गया एक गलत प्रयास था, जिसके ज़रिए उसने असल में हाईकोर्ट के पिछले आदेश की समीक्षा करने की कोशिश की थी; जबकि हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता के लिए उपाय को केवल धारा 200 तक ही सीमित रखा था, न कि धारा 156(3) तक।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
"...सच तो यह है कि CrPC की धारा 156(3) का सहारा लेने का यह दूसरा प्रयास हाईकोर्ट द्वारा पारित पिछले आदेश की समीक्षा करने की कोशिश के अलावा और कुछ नहीं है। यह भी बताना ज़रूरी है कि हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता-प्रतिवादी को जो छूट दी थी, वह केवल CrPC की धारा 200 का इस्तेमाल करने के उद्देश्य से दी गई। हो सकता है कि यह कोई अनजाने में हुई चूक हो, जिसके कारण शिकायतकर्ता-प्रतिवादी ने CrPC की धारा 200 के तहत 'निजी शिकायत' दायर करने के बजाय एक बार फिर CrPC की धारा 156(3) का सहारा ले लिया। संक्षेप में यह कहना ही काफी होगा कि इन दोनों धाराओं का इस्तेमाल करने के लिए तय किए गए नियम (पैरामीटर्स) एक-दूसरे से काफी अलग हैं।"
अदालत ने आगे कहा:
“हम हाईकोर्ट द्वारा पारित विवादित आदेश... और मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द करते हैं... जिसमें FIR दर्ज करने का निर्देश दिया गया। साथ ही संबंधित मजिस्ट्रेट को यह विशेष निर्देश देते हैं कि वे प्रतिवादी-शिकायतकर्ता द्वारा CrPC की धारा 156 (3) के तहत दायर आवेदन को CrPC की धारा 200 के तहत एक निजी शिकायत के रूप में मानें और उसके बाद कानून के अनुसार आगे बढ़ें।”
उपर्युक्त के आधार पर याचिका का निपटारा किया गया।
Cause Title: MOHAN KARTHIK & ORS. VERSUS STATE OF TAMIL NADU, & ANR.

