बैंक उन NBFC से लिए गए लोन के लिए SARFAESI Act का इस्तेमाल कर सकते हैं, जो एक्ट के दायरे में नहीं आते: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
2 Sept 2026 9:03 PM IST

एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (2 सितंबर) को कहा कि बैंक NBFC से मिले लोन की वसूली के लिए SARFAESI Act, 2002 का इस्तेमाल कर सकते हैं, भले ही लोन लेते समय वे NBFC एक्ट के दायरे में न आते हों।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने कहा,
"...जब कोई संस्था (बैंक) ऐसी हो जिस पर SARFAESI Act पहले से लागू होता हो, और वह ऐसी संस्था से कोई नॉन-परफॉर्मिंग सिक्योर्ड लोन अकाउंट (NPA) हासिल करती है, जो SARFAESI Act के दायरे में नहीं आती, तो उस लोन अकाउंट को तुरंत SARFAESI Act के प्रावधानों के तहत 'सिक्योर्ड डेट' (सुरक्षित कर्ज) का दर्जा मिल जाएगा।"
बेंच ने बॉम्बे हाईकोर्ट का वह फैसला रद्द किया, जिसमें कोटक महिंद्रा बैंक को उस NBFC से मिले लोन की वसूली के लिए SARFAESI Act का इस्तेमाल करने से रोका गया, जो लोन देते समय एक्ट की धारा 2(1)(m) के तहत नोटिफाइड फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन नहीं है।
यह विवाद उन लोन अकाउंट्स को लेकर शुरू हुआ, जो मूल रूप से सिटी फाइनेंशियल कंज्यूमर फाइनेंस लिमिटेड (CFCFL) ने दिए। CFCFL एक NBFC थी, जो उस समय SARFAESI Act की धारा 2(1)(m) के तहत नोटिफाइड "फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन" नहीं थी।
बाद में 27 अगस्त 2018 को CFCFL को एक्ट के तहत फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन के तौर पर नोटिफाई किया गया।
2012 और 2013 के बीच अपीलकर्ता-कोटक महिंद्रा बैंक लिमिटेड (जो SARFAESI Act की धारा 2(1)(c) के तहत "बैंक" के तौर पर योग्य है) ने CFCFL से लोन अकाउंट्स के तीन सेट हासिल किए। ये लोन मॉर्गेज (गिरवी रखी संपत्ति) से सुरक्षित थे।
लोन अकाउंट्स अपने पास लेने के बाद अपीलकर्ता-बैंक ने बकाया रकम की वसूली के लिए SARFAESI Act का इस्तेमाल किया।
उधार लेने वालों ने बैंक के इस कदम को चुनौती दी। उनका तर्क था कि लोन उस समय लिए गए, जब CFCFL, SARFAESI एक्ट के तहत फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन की कानूनी परिभाषा के दायरे में नहीं आती। इसलिए उनके अनुसार, लोन सिर्फ़ इसलिए SARFAESI कार्यवाही के दायरे में नहीं आ सकते क्योंकि उन्हें किसी बैंक को ट्रांसफर (असाइन) कर दिया गया।
बॉम्बे हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच ने DRT और DRAT के उस फ़ैसले को सही ठहराया, जिसमें कहा गया कि अपील करने वाला बैंक CFCFL से लिए गए कर्ज़ की वसूली के लिए SARFAESI Act का इस्तेमाल नहीं कर सकता। इस फ़ैसले से नाराज़ होकर बैंक सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
बैंक की अपील मंज़ूरी देते हुए कोर्ट ने उधार लेने वालों की इस दलील को खारिज किया कि जो कर्ज़ शुरू में SARFAESI Act के दायरे में नहीं आता, वह बाद में 'सिक्योर्ड डेट' (सुरक्षित कर्ज़) का दर्जा नहीं पा सकता, जिससे बैंक के पास SARFAESI Act का इस्तेमाल करने का कोई रास्ता नहीं बचता।
इसके बजाय, कोर्ट ने कहा:
“अगर हमारे सामने उधार लेने वालों की दलील मान ली जाए तो इसका मतलब यह होगा कि जो लोग उन NBFCs से आर्थिक मदद लेते हैं, जो SARFAESI Act की धारा 2(1)(m) के दायरे में नहीं आते, उन्हें ऐसे लोन चुकाने में डिफ़ॉल्ट करने की ज़्यादा आज़ादी होगी, क्योंकि उनकी वसूली सिर्फ़ आम, ज़्यादा समय लेने वाली सिविल प्रक्रियाओं से ही हो सकती है। इसकी तुलना में, जो लोग SARFAESI Act की धारा 2(1)(m) के दायरे में आने वाले NBFCs से आर्थिक मदद लेते हैं, उनसे वसूली तेज़ी से और आसानी से हो सकती है। चाहे कोई वित्तीय संस्थान SARFAESI Act के दायरे में आता हो या नहीं, उधार लेने वालों द्वारा ऐसे संस्थान को लोन न चुकाने से हमेशा एक ऐसी चेन रिएक्शन शुरू होती है, जिसका पूरी अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ता है।”
कोर्ट ने कहा कि जब कोई नॉन-परफॉर्मिंग सिक्योर्ड लोन (NPA) किसी ऐसे बैंक द्वारा हासिल किया जाता है, जिस पर SARFAESI Act लागू होता है तो वह लोन अकाउंट तुरंत एक्ट के तहत 'सिक्योर्ड डेट' की कानूनी विशेषताएं हासिल कर लेता है।
कोर्ट ने कहा,
“असल में इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि लोन/कर्ज़ और संस्थान दोनों SARFAESI Act के दायरे में आते हैं (जैसा कि पिछले दो फ़ैसलों में हुआ), या सिर्फ़ लोन/कर्ज़ ही इसके दायरे में आता है, क्योंकि उसे किसी ऐसे 'बैंक' ने अपने हाथ में ले लिया, जिस पर SARFAESI Act पहले से ही लागू है। दोनों ही मामलों में लोन/कर्ज़ की वसूली के लिए SARFAESI Act के प्रावधान लागू होंगे।”
कोर्ट ने एम.डी. फ्रोज़न फूड्स एक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम हीरो फिनकॉर्प लिमिटेड (2017) और इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड बनाम डेक्कन क्रॉनिकल होल्डिंग्स लिमिटेड (2018) में अपने पहले के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि एक बार जब इस एक्ट के दायरे में आने वाले किसी बैंक ने कोई सिक्योर्ड नॉन-परफॉर्मिंग लोन (NPL) हासिल कर लिया है तो मूल लेंडर की पहचान SARFAESI के तहत कार्रवाई को रोक नहीं सकती।
नतीजतन, अपील को मंज़ूरी दी गई और डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल के सामने अपीलकर्ता-बैंक की सिक्युरिटाइज़ेशन अर्ज़ी को बहाल करने का निर्देश दिया गया।
Cause Title: Kotak Mahindra Bank Limited versus Trupti Sanjay Mehta and others (with connected matters)


