चेक पेश करने में देरी के लिए बैंक ज़िम्मेदार: सुप्रीम कोर्ट ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत जुर्माना सही ठहराया

Shahadat

16 April 2026 10:48 AM IST

  • चेक पेश करने में देरी के लिए बैंक ज़िम्मेदार: सुप्रीम कोर्ट ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत जुर्माना सही ठहराया

    सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (15 अप्रैल) को फैसला सुनाया कि अगर कोई बैंक बिना किसी उचित कारण के चेक की तय वैधता अवधि के भीतर उसे पेश करने में नाकाम रहता है तो इसे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत 'सेवा में कमी' माना जाएगा।

    जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की खंडपीठ ने केनरा बैंक की उस ज़िम्मेदारी को सही ठहराया, जिसमें बैंक ने अपने ग्राहक को सेवा देने में कमी की थी। ग्राहक ने बैंक में चेक जमा किया था, लेकिन बैंक चेक की वैधता अवधि खत्म होने से पहले उसे पेश करने में नाकाम रहा, जिसके चलते चेक "बासी चेक" (stale cheque) की टिप्पणी के साथ अस्वीकृत हो गया।

    कोर्ट ने कहा,

    "चेक जमा करने के लिए स्वीकार करने वाला बैंक ग्राहक के एजेंट के तौर पर काम करता है। उस पर यह ज़िम्मेदारी होती है कि वह तय वैधता अवधि के भीतर चेक पेश करने में पूरी सावधानी बरते। अगर वह ऐसा करने में नाकाम रहता है और चेक बासी हो जाता है तो बिना किसी उचित कारण के, इसे बैंकिंग कर्तव्यों के निर्वहन में लापरवाही माना जाएगा, जो उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत 'सेवा में कमी' के दायरे में आएगा।"

    यह विवाद तब शुरू हुआ, जब शिकायतकर्ता ने 29 मई, 2018 को केनरा बैंक में अपने खाते में दो बड़ी रकम के चेक (विजया बैंक पर जारी) जमा किए, जिनकी कुल कीमत ₹1,06,10,768 थी।

    दोनों चेक 3 मार्च, 2018 की तारीख वाले थे और तीन महीने के लिए वैध थे, जिनकी वैधता 2 जून, 2018 को खत्म हो रही थी।

    चेक जमा होने के तुरंत बाद शुरू में उन्हें प्रोसेस किया गया और खाते में जमा कर दिया गया। इसके बाद उन्हें वापस कर दिया गया और खाते से रकम काट ली गई, जिस पर "ऑनलाइन चेक वापसी" जैसी टिप्पणियां लिखी थीं। वैधता अवधि के भीतर तुरंत दोबारा पेश करने के बजाय बैंक ने इस प्रक्रिया में देरी की, और जब वैधता अवधि खत्म होने के बाद उन्हें दोबारा पेश किया गया, तो दोनों चेक "चेक की तारीख निकल गई/बासी" (instrument out dated/stale) की टिप्पणी के साथ बिना भुगतान के वापस कर दिए गए।

    बैंक ने देरी को सही ठहराने के लिए यह दलील दी कि 30-31 मई को बैंकों की हड़ताल थी। हालांकि, बैंक ने इस बात को नज़रअंदाज़ कर दिया कि उसके पास 1 जून और 2 जून को भी काम-काज के दिन थे, जब वह वैधता अवधि खत्म होने से पहले चेक दोबारा पेश कर सकता था, लेकिन वह ऐसा करने में नाकाम रहा। NCDRC ने बैंक को सेवा में कमी के लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया और चेक की रकम का 10% मुआवज़े के तौर पर देने का आदेश दिया गया। उक्त आदेश से नाराज़ होकर बैंक ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

    सेवा में कमी की ज़िम्मेदारी बरकरार रखते हुए जस्टिस भुइयां द्वारा लिखे गए फ़ैसले में यह टिप्पणी की गई:

    “हम कमीशन के इस विचार से सहमत हैं कि अपीलकर्ता की ओर से प्रतिवादी के दो चेकों को उनकी वैधता अवधि के भीतर पेश करने में लापरवाही बरती गई, जिसके कारण अपीलकर्ता की ओर से प्रतिवादी के प्रति सेवा में कमी हुई।”

    बैंक ने दलील दी कि देरी हड़ताल और कामकाज से जुड़ी दिक्कतों की वजह से हुई थी। हालांकि, कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया और कहा कि एक बार जब सामान्य कामकाज फिर से शुरू हो गया तो बैंक का यह फ़र्ज़ था कि वह तुरंत कार्रवाई करे।

    चेकों को बची हुई वैधता अवधि के भीतर दोबारा पेश न करने के लिए कोई भी भरोसेमंद सफ़ाई न दे पाना ही इस मामले में फ़ैसले का मुख्य आधार बना।

    अदालत ने टिप्पणी की,

    "यदि चेक को स्वीकार करने या उसका भुगतान करने के लिए पेश करने में कोई देरी होती है तो ऐसी देरी को धारा 75A के तहत माफ़ किया जा सकता है, बशर्ते यह देरी धारक के नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों के कारण हुई हो और इसके लिए धारक की कोई चूक, दुराचार या लापरवाही ज़िम्मेदार न हो। लेकिन जिस क्षण देरी का कारण समाप्त हो जाता है, उसके बाद उचित समय के भीतर चेक पेश कर दिया जाना चाहिए। चेक स्वीकार करने या उसका भुगतान करने के लिए पेश करने के उद्देश्य से 'उचित समय' क्या है, इसका प्रावधान धारा 84(2) और धारा 105 में किया गया। इन धाराओं के अनुसार, यह निर्धारित करने के लिए कि उचित समय क्या है, चेक की प्रकृति, व्यापार और बैंकरों की प्रथाओं, और उस विशेष मामले के तथ्यों पर विचार किया जाना चाहिए।"

    हालांकि, अदालत ने विवादित आदेश में इस हद तक संशोधन किया कि मुआवज़े की राशि, जो चेक के मूल्य का 10% थी, उसे घटाकर 6% कर दिया गया।

    अदालत ने आगे टिप्पणी की,

    "...वर्तमान मामले के विशिष्ट तथ्यों को ध्यान में रखते हुए और 'उचित मुआवज़े' के मानक को लागू करते हुए आयोग द्वारा निर्धारित मुआवज़े की राशि कुछ अधिक प्रतीत होती है। चेक की अंकित राशि का 10 प्रतिशत 'सांकेतिक मुआवज़े' के रूप में देना, शिकायतकर्ता को हुई वास्तविक हानि की प्रकृति को सही ढंग से नहीं दर्शाता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि सेवा में कमी पाए जाने के बावजूद, स्वयं हानि की मात्रा अनिश्चित है।"

    तदनुसार, अपील का निपटारा कर दिया गया।

    Cause Title: CANARA BANK VERSUS KAVITA CHOWDHARY

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