सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

  • सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

    सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (02 नवंबर, 2026 से 06 नवंबर, 2026 तक) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

    व्यावसायिक फसलों की खेती को वन क्षेत्र में मौजूदगी को सही ठहराने के लिए 'वन अधिकार' नहीं माना जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वन क्षेत्र में किसी व्यावसायिक फसल की खेती को 'वन अधिकार' के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती, ताकि वहां कब्जे या लगातार मौजूदगी को सही ठहराया जा सके। कोर्ट ने तमिलनाडु के मेगामलाई क्षेत्र में 'वन अधिकार अधिनियम' (FRA) के तहत किए गए दावों की जांच के लिए एक समिति का गठन किया है, जिसके प्रमुख पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) होंगे।

    कोर्ट ने कहा, "इसलिए वन क्षेत्र में किसी व्यावसायिक फसल की खेती को 'वन अधिकार' के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती, ताकि वहां कब्जे या लगातार मौजूदगी को सही ठहराया जा सके।"

    Case Title : A. John Kennedy & Ors. v. State of Tamil Nadu & Ors

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    सरकार के गहरे और व्यापक नियंत्रण के कारण 'नेशनल बुक ट्रस्ट' को 'राज्य' माना जाएगा: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 'नेशनल बुक ट्रस्ट' (NBT) संविधान के अनुच्छेद 12 के अर्थ में 'प्राधिकरण' (Authority) है, इसलिए मौलिक अधिकारों को लागू करने के उद्देश्य से इसे 'राज्य' (State) माना जाएगा।

    कोर्ट ने पाया कि सरकार का इस ट्रस्ट पर गहरा और व्यापक नियंत्रण है। इसमें ट्रस्ट का गठन, संचालन करने वाली संस्था की संरचना, कामकाज और वित्तीय प्रबंधन शामिल हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक सोसाइटी के रूप में ट्रस्ट का पंजीकरण होना या उसका अपनी आय खुद अर्जित करना, उसे अनुच्छेद 12 के दायरे से बाहर नहीं करता है।

    Case Title : THE CHAIRMAN NATIONAL BOOK TRUST INDIA & ANR. VERSUS AR ABDUL GAFFAR & ORS.

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    सुप्रीम कोर्ट का पंजाब और हरियाणा को निर्देश: 20 वर्षों में हिमाचल प्रदेश को 11,973 मिलियन यूनिट बिजली का बकाया दें

    शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा राज्यों को निर्देश दिया कि वे 20 वर्षों की अवधि में हिमाचल प्रदेश को लगभग 11,973 मिलियन यूनिट (MU) बिजली उपलब्ध कराएं। इसके साथ ही, भाखड़ा-नांगल और ब्यास जलविद्युत परियोजनाओं से उत्पन्न बिजली के बंटवारे को लेकर दशकों से चला आ रहा विवाद समाप्त हो गया।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने दोनों राज्यों को निर्देश दिया कि वे 'लीन सीजन' (अक्टूबर से मार्च) के दौरान हर साल लगभग 598 मिलियन यूनिट बिजली देकर यह बकाया चुकाएं।

    Case Title : State of Himachal Pradesh v. Union of India and others

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    24 घंटे के भीतर पेश करने के बावजूद मजिस्ट्रेट आरोपी की रिमांड से कर सकते हैं इनकार, हिरासत की अवधि उचित होना जरूरी: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि किसी आरोपी को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर देना ही पर्याप्त नहीं है। मजिस्ट्रेट को यह भी जांचना होगा कि आरोपी को हिरासत में रखने की अवधि मामले की परिस्थितियों के अनुसार उचित थी या नहीं। यदि मजिस्ट्रेट को लगता है कि आरोपी को आवश्यकता से अधिक समय तक हिरासत में रखा गया है, तो वह उसकी रिमांड देने से इनकार कर सकता है।

    जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत गिरफ्तार और हिरासत में लिए गए व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है। यह अवधि उस समय से शुरू होती है, जब व्यक्ति की स्वतंत्रता पर वास्तव में रोक लगा दी जाती है, न कि पुलिस द्वारा औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज किए जाने के समय से।

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    मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की समय-सीमा 'गिरफ्तारी' से नहीं, 'हिरासत' में लिए जाने से शुरू होती है: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को 'गिरफ्तारी' (Arrest) और 'हिरासत' (Detention) के बीच किए जाने वाला बनावटी अंतर खारिज किया। कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की समय-सीमा, व्यक्ति को 'हिरासत' में लिए जाने के समय से शुरू होगी, न कि केवल उसकी 'औपचारिक गिरफ्तारी' के समय से।

    जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने कहा, "यह मानना कि 24 घंटे का समय केवल औपचारिक गिरफ्तारी से शुरू होता है, संविधान के अनुच्छेद 22(2) और BNSS की धारा 56 के संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ है।"

    Case Title : Sujit Das v Union of India

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    सह-अभियुक्त मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब सभी आरोपियों पर 'साझा इरादे' (Common Intention) को आगे बढ़ाते हुए भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 34 के साथ धारा 302 (हत्या) के तहत आरोप लगाए जाते हैं, और बाकी आरोपी बरी हो जाते हैं, तो किसी एक आरोपी को अकेले धारा 302 के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता। ऐसा तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक कि उस आरोपी के खिलाफ धारा 302 के तहत कोई अलग और स्वतंत्र आरोप न लगाया गया हो। कोर्ट ने यह टिप्पणी एक महिला सौ कमलबाई वामन पाटिल को बरी करते हुए की।

    बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने उसे अपनी बहू, सुनीताबाई की आग लगाकर हत्या करने का दोषी ठहराया था।

    Case Title : Sau. Kamalbai Waman Patil v State of Maharashtra

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    स्वतंत्रता सेनानियों की पेंशन के लिए सख्त सबूतों की जिद न करें अधिकारी, दावों पर व्यावहारिक नजरिया अपनाएं : सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने स्वतंत्रता सेनानियों की पेंशन से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि ऐसे मामलों में अधिकारियों को व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। स्वतंत्रता सेनानी के योगदान को साबित करने के लिए बेहद पुराने दस्तावेजों और सख्त प्रमाणों की मांग नहीं की जा सकती। केवल देरी के आधार पर पेंशन का दावा खारिज करना भी उचित नहीं है।

    जस्टिस पमिदिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने कहा कि स्वतंत्रता सेनानी सम्मान निधि कोई सरकारी खैरात या अनुदान नहीं, बल्कि राष्ट्र की ओर से स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का प्रतीक है। ऐसे दावों का फैसला आपराधिक मुकदमे में लागू होने वाले सबूतों के कड़े मानकों पर नहीं, बल्कि उपलब्ध तथ्यों की संभावनाओं के आधार पर किया जाना चाहिए।

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    सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड PSC में नियुक्त रिटायर सरकारी कर्मचारियों के वेतन से पेंशन कटौती का नियम बरकरार रखा

    सुप्रीम कोर्ट ने नियम की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी, जिसके तहत उत्तराखंड लोक सेवा आयोग (UKPSC) के अध्यक्ष या सदस्य के रूप में नियुक्त रिटायर सरकारी कर्मचारियों के वेतन से उनकी पेंशन की राशि काट ली जाती है। कोर्ट ने कहा कि उनके कार्यकाल के दौरान पेंशन को केवल कुछ समय के लिए रोक दिया जाता है और कार्यकाल खत्म होने के बाद इसे फिर से बहाल कर दिया जाता है।

    जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के 2010 के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें 'उत्तराखंड लोक सेवा आयोग (सेवा की शर्तें) नियमावली, 2004' के नियम 7(2) को असंवैधानिक करार दिया गया था। हाईकोर्ट का मानना था कि यह नियम संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 39(d) का उल्लंघन करता है।

    Case Title : STATE OF UTTARAKHAND THR. CHIEF SECRETARY AND OTHERS VERSUS M.C. BHANDARI AND ANOTHER (with connected case)

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    GST लागू होने के बाद राज्यों के अतिरिक्त बिक्री कर लगाने के अधिकार पर 27 साल पुराना मामला एकेडमिक हुआ: सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की बेंच

    सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ ने बुधवार (4 नवंबर) को कहा कि मौजूदा बिक्री कर (Sales Tax) के आधार पर अतिरिक्त बिक्री कर या सरचार्ज लगाने की राज्यों की विधायी शक्ति से जुड़ा करीब 27 साल पुराना संदर्भ (Reference) अब अकादमिक हो गया है, क्योंकि देश में वस्तु एवं सेवा कर (GST) व्यवस्था लागू हो चुकी है।

    चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि जिस संवैधानिक और वैधानिक व्यवस्था के तहत राज्यों द्वारा ये अतिरिक्त कर लगाए जाते थे, उसे GST व्यवस्था ने प्रतिस्थापित कर दिया है। इसलिए इस संदर्भ पर अब सात जजों की पीठ द्वारा फैसला सुनाए जाने की आवश्यकता नहीं रह गई है।

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    भारतीय कानून के खिलाफ विदेशी तलाक का फैसला और नागरिकता बदलना, पति को 'द्विविवाह' के मुकदमे से नहीं बचा सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (3 नवंबर) को व्यक्ति के खिलाफ 'द्विविवाह' (दूसरी शादी करने) के मामले को जारी रखने का फैसला सुनाया। इस व्यक्ति ने ब्रिटेन की नागरिकता लेने के बाद वहां की अदालत से 'शादी के पूरी तरह टूट जाने' (Irretrievable Breakdown of Marriage) के आधार पर तलाक का फैसला हासिल किया था और इसके दम पर दूसरी शादी कर ली थी। इससे पहले उसने भारत में भी अपनी पहली शादी खत्म करने की कोशिश की थी, जो नाकाम रही थी।

    Case Title : N. SRIDHAR REDDY v. THE STATE OF A.P.

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    बंधुआ मजदूरों को रिहाई प्रमाण-पत्र मिलने के 7 दिनों के भीतर पुनर्वास सहायता मिलनी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि मुक्त कराए गए बंधुआ मजदूरों को पुनर्वास योजना के तहत तत्काल वित्तीय सहायता मिलनी चाहिए। यह सहायता आमतौर पर रिहाई प्रमाण-पत्र जारी होने के सात दिनों के भीतर दी जानी चाहिए। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि पुनर्वास में देरी का मतलब असल में पुनर्वास से वंचित करना ही है।

    कोर्ट ने कहा, "समय पर पुनर्वास का बहुत महत्व है। बंधुआ मजदूरी से मुक्त होने के बाद अक्सर व्यक्ति के पास आजीविका का कोई स्वतंत्र साधन नहीं होता और वह आगे भी शोषण का शिकार हो सकता है। तत्काल जरूरतों को पूरा करने के लिए दी जाने वाली वित्तीय सहायता का उद्देश्य तब खत्म हो जाता है, जब इसे देने में महीनों या सालों की देरी हो जाती है।"

    Case Title : Surendra Manjhi & Anr. v. Union of India & Ors.

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    भारत-यूके समझौते के तहत भारतीय अदालत में स्थानांतरित कैदी सजा में छूट की मांग कर सकता है: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यूनाइटेड किंगडम से भारत स्थानांतरित किया गया कैदी, जो अपनी सजा काट रहा है, वह भारतीय नियमों के तहत सजा में छूट (रेमिशन) की मांग कर सकता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि 'सजा पाए व्यक्तियों के हस्तांतरण पर भारत-यूके समझौते' के अनुच्छेद 10(2) में 'अन्य कानून' (Other Laws) शब्द का उल्लेख है, जिसके अंतर्गत सजा में छूट देने का अधिकार भी आता है।

    जस्टिस एम.एम. सुंदेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का वह आदेश रद्द किया, जिसमें अपीलकर्ता गुरमेज सिंह को समय से पहले रिहा करने से इनकार कर दिया गया था। गुरमेज सिंह को 2012 में यूनाइटेड किंगडम में हत्या के मामले में दोषी ठहराया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी, जिसमें कम से कम 35 साल जेल में बिताना अनिवार्य था।

    Case Title : GURMEJ SINGH VERSUS UNION OF INDIA & ORS.

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