स्वतंत्रता सेनानियों की पेंशन के लिए सख्त सबूतों की जिद न करें अधिकारी, दावों पर व्यावहारिक नजरिया अपनाएं : सुप्रीम कोर्ट
Amir Ahmad
5 Nov 2026 12:10 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने स्वतंत्रता सेनानियों की पेंशन से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि ऐसे मामलों में अधिकारियों को व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। स्वतंत्रता सेनानी के योगदान को साबित करने के लिए बेहद पुराने दस्तावेजों और सख्त प्रमाणों की मांग नहीं की जा सकती। केवल देरी के आधार पर पेंशन का दावा खारिज करना भी उचित नहीं है।
जस्टिस पमिदिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने कहा कि स्वतंत्रता सेनानी सम्मान निधि कोई सरकारी खैरात या अनुदान नहीं, बल्कि राष्ट्र की ओर से स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का प्रतीक है। ऐसे दावों का फैसला आपराधिक मुकदमे में लागू होने वाले सबूतों के कड़े मानकों पर नहीं, बल्कि उपलब्ध तथ्यों की संभावनाओं के आधार पर किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की खंडपीठ का फैसला रद्द करते हुए दिवंगत स्वतंत्रता सेनानी रामाकांत त्रिपाठी की विधवा को पेंशन देने का आदेश बहाल किया। उन्हें 6 अप्रैल 1991 से पेंशन के साथ 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी दिया जाएगा।
मामला रामाकांत त्रिपाठी से जुड़ा था, जिन्होंने वर्ष 1945-46 में मैहर प्रजा मंडल आंदोलन में हिस्सा लिया था। इस आंदोलन के दौरान उन्हें 25 दिनों तक मैहर जेल में रखा गया। उनकी पत्नी ने पति की मृत्यु के बाद स्वतंत्रता सेनानी सम्मान निधि प्राप्त करने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी।
मध्य प्रदेश स्वतंत्रता संग्राम सैनिक सम्मान निधि नियम, 1972 के तहत रामाकांत त्रिपाठी का पेंशन आवेदन राज्य सरकार ने 6 अप्रैल 1991 को बिना कोई कारण बताए खारिज किया। वर्ष 2016 में उनके निधन के बाद उनकी पत्नी ने जिला कलेक्टर के समक्ष पेंशन का दावा पेश किया। कलेक्टर ने भी दावा खारिज किया, जिसे राज्य सरकार ने बरकरार रखा। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट के सिंगल जज ने महिला के पक्ष में फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को सम्मान के तौर पर पेंशन जारी करने का निर्देश दिया था। हालांकि, हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस आदेश को पलट दिया। खंडपीठ का मानना था कि करीब 25 साल की देरी के कारण दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके बाद महिला ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मामले के महत्वपूर्ण साक्ष्यों पर ध्यान नहीं दिया। जिला कलेक्टर के पास उपलब्ध स्वतंत्रता सेनानियों की सूची में रामाकांत त्रिपाठी का नाम दर्ज था। इस सरकारी रिकॉर्ड में स्पष्ट था कि उन्होंने मैहर राज्य प्रजा मंडल आंदोलन 1945-46 में सक्रिय रूप से भाग लिया था और वर्ष 1946 में उन्हें जेल में रखा गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्वतंत्रता सेनानी पेंशन के दावे में आपराधिक मुकदमे जैसा साक्ष्य का मानक लागू नहीं होता। आधी सदी से भी पुराने घटनाक्रम के दस्तावेज आवेदक से जुटाने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। चूंकि जेल के रजिस्टर, पुलिस की फाइलें और उस समय के सरकारी राजपत्र राज्य के पास होते हैं, इसलिए इन रिकॉर्ड को तलाशने की जिम्मेदारी भी राज्य की।
कोर्ट ने कहा,
"पेंशन के लिए दावा करने वाले व्यक्ति को इस तरह नहीं देखा जाना चाहिए, जैसे वह सरकार से कोई एहसान मांग रहा हो। वह उस व्यक्ति के रूप में प्राधिकरण के सामने आता है, जिसका राष्ट्र पर अधिकार बनता है। इसलिए अधिकारियों का दृष्टिकोण व्यावहारिक होना चाहिए।"
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि किसी दावे को प्राप्त करने, उसकी जांच करने और उस पर फैसला लेने का तरीका भी योजना के तहत दिए जाने वाले सम्मान का हिस्सा है। देरी करने वाला, उदासीन या जरूरत से ज्यादा तकनीकी प्रक्रिया अपनाने वाला रवैया उस सम्मान को कम करता है, भले ही अंततः पेंशन दी जाए।
कोर्ट ने कहा कि महिला के दावे को देरी और लापरवाही के आधार पर खारिज करना उचित नहीं था। उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड उनके पति की स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी और जेल जाने की पुष्टि करते हैं। ऐसे में वह नियमों के तहत सम्मान निधि पाने की हकदार हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ का आदेश रद्द किया और सिंगल जज का वह फैसला बहाल किया, जिसमें राज्य सरकार को रामाकांत त्रिपाठी की विधवा को 6 अप्रैल 1991 से पेंशन देने और उस पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था।

