24 घंटे के भीतर पेश करने के बावजूद मजिस्ट्रेट आरोपी की रिमांड से कर सकते हैं इनकार, हिरासत की अवधि उचित होना जरूरी: सुप्रीम कोर्ट
Amir Ahmad
6 Nov 2026 11:50 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि किसी आरोपी को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर देना ही पर्याप्त नहीं है। मजिस्ट्रेट को यह भी जांचना होगा कि आरोपी को हिरासत में रखने की अवधि मामले की परिस्थितियों के अनुसार उचित थी या नहीं। यदि मजिस्ट्रेट को लगता है कि आरोपी को आवश्यकता से अधिक समय तक हिरासत में रखा गया है, तो वह उसकी रिमांड देने से इनकार कर सकता है।
जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत गिरफ्तार और हिरासत में लिए गए व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है। यह अवधि उस समय से शुरू होती है, जब व्यक्ति की स्वतंत्रता पर वास्तव में रोक लगा दी जाती है, न कि पुलिस द्वारा औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज किए जाने के समय से।
पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(2) में 'गिरफ्तार' और 'हिरासत में लिया गया' शब्दों का एक साथ इस्तेमाल किया गया। इसलिए दोनों अवधारणाओं को साथ पढ़ना जरूरी है। गिरफ्तारी और हिरासत के बीच कृत्रिम अंतर पैदा करके पुलिस संवैधानिक सुरक्षा से बच नहीं सकती।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिरासत में रखने वाले अधिकारियों को केवल 24 घंटे की अधिकतम सीमा का ध्यान नहीं रखना चाहिए, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि हिरासत की अवधि मामले की परिस्थितियों के अनुसार उचित हो।
पीठ ने कहा,
"मजिस्ट्रेट आरोपी को पेश किए जाने के समय यह भी जांचेंगे कि 24 घंटे की निर्धारित अवधि के भीतर होने के बावजूद हिरासत उचित अवधि से अधिक तो नहीं रही है। यदि वे संतुष्ट होते हैं कि हिरासत उचित अवधि से अधिक रही है, तो वे रिमांड देने से इनकार कर सकते हैं।"
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 58 का उल्लेख करते हुए कहा कि यह प्रावधान पुलिस को बिना वारंट किसी व्यक्ति को हिरासत में रखने की अवधि पर नियंत्रण करता है।
पीठ ने कहा कि हिरासत में रखने वाले अधिकारियों को न केवल संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत निर्धारित 24 घंटे की सीमा का पालन करना चाहिए, बल्कि इस अवधि के भीतर भी हिरासत को मामले की परिस्थितियों के अनुसार उचित समय तक सीमित रखना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि आरोपी को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करते समय हिरासत की वास्तविक तारीख और समय दर्ज करना जरूरी है। मजिस्ट्रेट को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 58 का पालन किया गया या नहीं।
पीठ ने स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट केवल पुलिस द्वारा दर्ज गिरफ्तारी के समय पर भरोसा नहीं कर सकते। उन्हें स्वतंत्र रूप से यह जांचना होगा कि आरोपी को कितनी देर हिरासत में रखा गया और क्या यह अवधि मामले की परिस्थितियों के अनुसार उचित थी।
सुप्रीम कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 57 का उल्लेख किया, जो वर्तमान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 58 के अनुरूप है।
पीठ ने कहा कि इस प्रावधान में दो अलग-अलग सीमाएं निर्धारित हैं। पहली, संविधान के तहत 24 घंटे की अधिकतम अवधि। दूसरी, इन 24 घंटों के भीतर भी हिरासत की अवधि मामले की परिस्थितियों के अनुसार उचित होनी चाहिए।
कोर्ट ने कहा,
"धारा 57 दंड प्रक्रिया संहिता (धारा 58 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) दो सीमाएं निर्धारित करती है। पहली, 24 घंटे की संवैधानिक सीमा और दूसरी, इन 24 घंटों के भीतर हिरासत की अवधि मामले के तथ्यों के अनुसार उचित होनी चाहिए। इस अतिरिक्त लेकिन महत्वपूर्ण सुरक्षा का ध्यान हिरासत में रखने वाले अधिकारियों के साथ-साथ रिमांड पर विचार करने वाले मजिस्ट्रेटों को भी रखना चाहिए।"
पीठ ने जोर दिया कि यदि आरोपी को तकनीकी रूप से 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर दिया गया है, तब भी मजिस्ट्रेट रिमांड देने से इनकार कर सकते हैं, यदि उन्हें लगता है कि हिरासत की अवधि अनुचित रूप से लंबी रही है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रिमांड देने की प्रक्रिया केवल औपचारिकता नहीं हो सकती। मजिस्ट्रेट को हिरासत की अवधि, उसकी आवश्यकता और मामले की परिस्थितियों का स्वतंत्र रूप से परीक्षण करना होगा।

