सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
Shahadat
30 May 2026 11:30 PM IST

सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (25 मई, 2026 से 29 मई, 2026 तक) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
सुप्रीम कोर्ट ने ज़मानत, बरी होने या सज़ा निलंबित होने पर कैदियों की उसी दिन/अगले दिन रिहाई सुनिश्चित करने के निर्देश जारी किए
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देशों का एक सेट जारी किया, जिसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि विचाराधीन कैदी और दोषी, अदालतों द्वारा उन्हें ज़मानत दिए जाने, उनकी सज़ा निलंबित किए जाने या उन्हें बरी किए जाने के बाद बिना किसी देरी के जेल से रिहा हो जाएं।
यह मानते हुए कि अनुकूल न्यायिक आदेश मिलने के बावजूद कैदी अक्सर कई दिनों तक जेल में ही बंद रहते हैं, कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट्स को ऐसे आदेशों को सुनाने, उनकी जानकारी देने और उन्हें लागू करने की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने का निर्देश दिया।
Case Title – Pila Pahan@Peela Pahan and Ors. v. State of Jharkhand and Anr.
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
एशियन गेम्स ट्रायल्स में हिस्सा लेंगी विनेश फोगाट: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को पहलवान विनेश फोगाट को 30 मई से शुरू होने वाले एशियन गेम्स चयन ट्रायल्स में भाग लेने की अनुमति दे दी। अदालत ने Wrestling Federation of India (WFI) की उस याचिका पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने स्पष्ट किया कि फिलहाल विनेश फोगाट को ट्रायल्स में हिस्सा लेने दिया जाएगा, हालांकि WFI की याचिका पर नोटिस जारी कर मामले की विस्तृत सुनवाई बाद में की जाएगी।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
आरक्षित फैसलों में देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, हाईकोर्टों के लिए जारी की बाध्यकारी गाइडलाइन
सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षित फैसलों को सुनाने में हो रही देरी पर कड़ा रुख अपनाते हुए देश के सभी हाईकोर्टों के लिए नई बाध्यकारी गाइडलाइन जारी की। अदालत ने स्पष्ट किया कि फैसला सुरक्षित रखने के बाद अधिकतम तीन महीने के भीतर निर्णय सुनाना होगा।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि जमानत मामलों में आदेश उसी दिन सुनाया और अपलोड किया जाना चाहिए। यदि आदेश सुरक्षित रखा जाता है तो उसे अगले दिन सुनाना और वेबसाइट पर अपलोड करना अनिवार्य होगा।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
बचाव पक्ष की कमी पूरी करने के लिए नहीं इस्तेमाल हो सकती CrPC की धारा 311 की शक्ति : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने दुष्कर्म पीड़िता को दोबारा जिरह के लिए बुलाने की अनुमति देने वाले त्रिपुरा हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 311 का इस्तेमाल बचाव पक्ष की कमियां पूरी करने के लिए नहीं किया जा सकता।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने त्रिपुरा सरकार की अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के 14 मार्च 2024 के आदेश को निरस्त किया। हाईकोर्ट ने कॉल डिटेल रिकॉर्ड के आधार पर पीड़िता से दोबारा जिरह की अनुमति दी थी।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
पूर्व राजघरानों की निजी संपत्ति पर लागू नहीं होगा ज्येष्ठाधिकार का नियम : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि पूर्व रियासतों के शासकों की निजी संपत्तियों के उत्तराधिकार पर ज्येष्ठाधिकार यानी केवल सबसे बड़े पुरुष उत्तराधिकारी को संपत्ति मिलने का नियम लागू नहीं होगा। ऐसी संपत्तियों का बंटवारा संबंधित परिवार के व्यक्तिगत उत्तराधिकार कानून के अनुसार किया जाएगा।
जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की खंडपीठ ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसमें कपूरथला राजघराने की निजी संपत्तियों पर ब्रिगेडियर सुखजीत सिंह को एकमात्र उत्तराधिकारी माना गया था।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
NI Act | कारोबार चलाने में सक्रिय भूमिका साबित न होने तक सोसायटी के पदाधिकारी पर चेक बाउंस होने की ज़िम्मेदारी नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि किसी सोसायटी में मैनेजर के पद पर बैठे किसी व्यक्ति का सिर्फ़ पदनाम ही, नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 (NI Act) की धारा 141 के तहत उसकी ज़िम्मेदारी तय करने के लिए काफ़ी नहीं होगा।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने कंपनी के एग्जीक्यूटिव सदस्य के ख़िलाफ़ चेक बाउंस का मामला रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। इस सदस्य के ख़िलाफ़ धारा 141 के तहत ज़िम्मेदारी तय करने के लिए लेन-देन में उसकी भागीदारी या सोसायटी के मामलों के लिए उसकी ज़िम्मेदारी दिखाने वाला कोई भी दस्तावेज़ी सबूत पेश नहीं किया गया था।
Cause Title: M/S MANSI FINANCE (CHENNAI) LTD. VERSUS M. LALITHA AND OTHERS
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
पुलिस को आगे की जांच करने के लिए मजिस्ट्रेट से अनुमति लेना ज़रूरी: सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया
सुप्रीम कोर्ट ने फिर दोहराया कि मजिस्ट्रेट से स्पष्ट अनुमति के बिना, क्लोजर रिपोर्ट (जांच बंद करने की रिपोर्ट) दाखिल करने के बाद पुलिस आगे की जांच नहीं कर सकती।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा, "भले ही कानून में स्पष्ट अनुमति की ज़रूरत न हो, लेकिन कानून जिस तरह से विकसित हुआ है, उससे यह बिल्कुल साफ हो गया है कि संबंधित मजिस्ट्रेट से अनुमति लेना अब एक ज़रूरी शर्त बन गया है।"
Cause Title: PALINISWAMY VEERARAJA & ORS. VERSUS THE STATE OF KARNATAKA & ANR.
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
ECI को अपनी शक्तियों के तहत वोटर लिस्ट का SIR करने का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने भारत के चुनाव आयोग (ECI) द्वारा की गई मतदाता सूचियों के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) की वैधता को सही ठहराया और टिप्पणी की कि मतदाता SIR, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की संवैधानिक अनिवार्यता को आगे बढ़ाता है।
कोर्ट ने फैसला दिया कि चुनाव आयोग के पास संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत SIR करने की शक्ति है, जिसे 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950' और उसके तहत बनाए गए नियमों के साथ पढ़ा जाना चाहिए।
Case Title: ASSOCIATION FOR DEMOCRATIC REFORMS AND ORS. Versus ELECTION COMMISSION OF INDIA, W.P.(C) No. 640/2025 (and connected cases)
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
बांके बिहारी मंदिर में पारंपरिक पूजा व्यवस्था बहाल करने और भीड़ प्रबंधन सुधारने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को वृंदावन स्थित बांके बिहारी मंदिर के प्रबंधन को पारंपरिक धार्मिक रीति-रिवाजों को बहाल करने और श्रद्धालुओं के लिए बेहतर भीड़ प्रबंधन व्यवस्था लागू करने के निर्देश दिए। कोर्ट ने गोस्वामियों के दो समूहों—शयन भोग और राज भोग—से दो-दो प्रतिनिधियों को समिति में शामिल करने की अनुमति दी, ताकि वे मंदिर के दैनिक संचालन और धार्मिक परंपराओं को लेकर सुझाव दे सकें।
आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
S. 307 IPC | चोट की गंभीरता ही हत्या के प्रयास के लिए दोषी ठहराने के लिए काफी नहीं, जब तक कि जान लेने के इरादे का सबूत न हो: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक जान लेने का आपराधिक इरादा (mens rea) साबित नहीं हो जाता, तब तक हत्या के प्रयास के लिए किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, भले ही घायल व्यक्ति को कितनी भी गंभीर चोट क्यों न लगी हो।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "...चोट की गंभीरता अपने आप में IPC की धारा 307 के तहत अपराध को तय करने का आधार नहीं हो सकती, जब तक कि अभियोजन पक्ष उस धारा के तहत ज़रूरी आपराधिक इरादा (mens rea) को साबित न कर दे।"
Cause Title: ROSHAN LAL VERSUS THE STATE OF HARYANA & ANR

