S.125 CrPC | कानूनी कमियों के कारण महिलाओं का शोषण जारी रहने से प्रावधान का उद्देश्य विफल: राजस्थान हाईकोर्ट

Shahadat

4 May 2026 9:39 AM IST

  • S.125 CrPC | कानूनी कमियों के कारण महिलाओं का शोषण जारी रहने से प्रावधान का उद्देश्य विफल: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण के लिए महिला द्वारा दायर अर्जी खारिज करते हुए इस स्थिति को "दुर्भाग्यपूर्ण" बताया और याचिकाकर्ता के प्रति सहानुभूति व्यक्त की। बता दें, उक्त महिला का विवाह इसलिए अमान्य है, क्योंकि उसके और उसके पति, दोनों के पहले के विवाह अभी भी कायम हैं।

    जस्टिस अनूप कुमार ढांड की पीठ ने उन कानूनी कमियों को उजागर किया, जिनके कारण इस प्रावधान का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाता है। साथ ही पीठ ने याचिकाकर्ता को उपलब्ध अन्य संभावित उपायों का भी सुझाव दिया, जैसे कि घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 22 के तहत मुआवजे की मांग करना।

    आगे कहा गया,

    "यह न्यायालय इस बात को दुर्भाग्यपूर्ण मानता है कि कई महिलाएं—विशेषकर समाज के गरीब तबके से आने वाली महिलाएं—इस प्रकार के शोषण का नियमित रूप से शिकार होती हैं। साथ ही कानूनी कमियों का लाभ उठाकर दोषी पक्ष बिना किसी दंड के बच निकलते हैं। CrPC की धारा 125 में निहित सामाजिक न्याय के तत्व के बावजूद, इस प्रावधान का उद्देश्य विफल हो जाता है, क्योंकि यह उस शोषण को रोकने में असफल रहता है जिसे समाप्त करने का इसका मूल लक्ष्य है।"

    न्यायालय, फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें याचिकाकर्ता द्वारा CrPC की धारा 125 के तहत अपने पति से भरण-पोषण की मांग वाली अर्जी खारिज की गई थी। विवाह के समय याचिकाकर्ता और प्रतिवादी दोनों के ही पहले के जीवनसाथी जीवित हैं। अतः, उनके विवाह का पंजीकरण न होने के कारण वे अलग-अलग रह रहे हैं।

    पति ने इस याचिका का विरोध करते हुए यह तर्क दिया कि चूंकि यह विवाह अमान्य (Void) है, इसलिए याचिकाकर्ता प्रतिवादी की "वैधानिक रूप से विवाहित पत्नी" नहीं है। इस प्रावधान के तहत वह भरण-पोषण की मांग नहीं कर सकती।

    दोनों पक्षकारों के तर्कों को सुनने के बाद न्यायालय ने यह राय व्यक्त की कि यह प्रावधान सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने का माध्यम है, जिसका उद्देश्य महिलाओं और बच्चों को बेघर होने तथा घोर अभावों में जीवन बिताने की आशंका से सुरक्षित रखना है। अतः, इस प्रावधान के तहत मामलों का निपटारा करते समय सामाजिक न्याय के इस उद्देश्य को ही सर्वोपरि रखा जाना चाहिए।

    इसके साथ ही न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि इस प्रावधान को लागू करने के लिए संबंधित महिला का "वैधानिक रूप से विवाहित पत्नी" होना अनिवार्य है।

    कोर्ट ने कहा,

    “CrPC धारा 125 के तहत 'पत्नी' में वह महिला भी शामिल होगी, जिसे उसके पति ने तलाक़ दे दिया हो, या जिसने अपने पति से तलाक़ ले लिया हो और जिसने दोबारा शादी न की हो... भले ही किसी महिला के पास 'पत्नी' का कानूनी दर्जा न हो, फिर भी उसे 'पत्नी' की इस विस्तृत परिभाषा के दायरे में लाया जाता है, ताकि कानूनी प्रावधान के उद्देश्य के साथ एकरूपता बनी रहे। हालांकि, दूसरी पत्नी—जिसकी शादी पहली शादी के कायम रहने के कारण अमान्य (Void) है—वह कानूनी रूप से विवाहित पत्नी नहीं मानी जाएगी। इसलिए वह इस प्रावधान के तहत भरण-पोषण (Maintenance) पाने की हकदार नहीं होगी।”

    इस बात को ध्यान में रखते हुए कि दूसरी शादी के समय याचिकाकर्ता और प्रतिवादी—दोनों के पहले वाले जीवनसाथी जीवित है—अदालत ने यह फैसला दिया कि याचिकाकर्ता को प्रतिवादी की “कानूनी रूप से विवाहित पत्नी” का दर्जा प्राप्त नहीं हुआ।

    यह मानते हुए कि CrPC की धारा 125 के तहत “पत्नी” की परिभाषा में ऐसी स्थिति की परिकल्पना नहीं की गई, जहां दोनों पक्षों के पहले वाले जीवनसाथी जीवित हों, यह निर्णय लिया गया कि याचिकाकर्ता उस व्यक्ति से भरण-पोषण पाने की हकदार नहीं है।

    याचिकाकर्ता के प्रति सहानुभूति जताते हुए और उस कानूनी कमी को स्वीकार करते हुए—जिसने सामाजिक न्याय के इस प्रावधान का उद्देश्य विफल किया—अदालत ने याचिकाकर्ता के लिए उपलब्ध अन्य कानूनी उपायों का उल्लेख किया, जैसे कि DV Act की धारा 22 के तहत उपलब्ध उपाय।

    तदनुसार, याचिका का निपटारा किया गया।

    Title: Smt. Guddi Bai v Raghuveer

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