लिपिकीय त्रुटि के कारण चेक बाउंस के मामले वापस ले लिए गए: राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा- रिट याचिका स्वीकार्य नहीं, BNSS के तहत उपाय मौजूद

  • लिपिकीय त्रुटि के कारण चेक बाउंस के मामले वापस ले लिए गए: राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा- रिट याचिका स्वीकार्य नहीं, BNSS के तहत उपाय मौजूद

    राजस्थान हाईकोर्ट ने लोक अदालत के उन आदेशों के खिलाफ दायर याचिकाओं को खारिज किया, जिनमें याचिकाकर्ता वित्तीय संस्थान द्वारा दायर 'मामले वापस लेने के आवेदनों' को स्वीकार कर लिया गया। ये मामले उन सुरक्षित लेनदारों (Secured Creditors) के खिलाफ थे, जिनसे कोई वसूली नहीं हुई। कोर्ट ने माना कि जब BNSS के तहत कानूनी उपाय उपलब्ध है तो रिट अधिकार क्षेत्र (Writ Jurisdiction) का उपयोग करने का कोई उचित कारण नहीं है।

    जस्टिस आनंद शर्मा की बेंच ने कहा कि लोक अदालत के आदेश का कानूनी परिणाम यह हुआ कि शिकायतों में आरोपी व्यक्ति बरी (Acquitted) हो गए। एक बार जब आरोपी बरी हो गए तो याचिकाकर्ता BNSS के तहत उपलब्ध कानूनी उपायों को छोड़कर सीधे रिट याचिका दायर करके कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटा सकता।

    बता दें, याचिकाकर्ता वित्तीय संस्थान ने कई लोगों को सुरक्षित ऋण (Secured Loan) दिए थे, जिसके बदले में चेक लिए गए। जब ये चेक बाउंस हो गए तो शिकायतें दर्ज की गईं, जिन पर ट्रायल कोर्ट ने संज्ञान लिया।

    इस बीच, लोक अदालत का आयोजन किया गया। चूंकि कई मामलों में समझौता हो गया और पैसे की वसूली हो गई, इसलिए मामले वापस लेने के लिए आवेदन दायर किए गए। हालांकि, याचिकाकर्ता के अनुसार, एक लिपिकीय त्रुटि (Clerical Error) के कारण उन मामलों को भी इस सूची में शामिल कर लिया गया, जिनमें कोई वसूली नहीं हुई और लोक अदालत ने मामले वापस लेने के आवेदनों को स्वीकार किया।

    इसलिए यह याचिका दायर की गई, जिसमें उन मामलों से जुड़े लोक अदालत का आदेश रद्द करने की मांग की गई, जिनमें कोई वसूली नहीं हुई।

    दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने BNSS की धारा 280 का अवलोकन किया। इस धारा के तहत शिकायतकर्ता को अंतिम आदेश पारित होने से पहले किसी भी समय अपनी शिकायत वापस लेने के लिए आवेदन करने का अधिकार है। ऐसे मामलों में, जहां शिकायत वापस ले ली जाती है, आरोपी को बरी (Acquitted) माना जाता है।

    इस संदर्भ में न्यायालय ने टिप्पणी की,

    “राष्ट्रीय लोक अदालत द्वारा 09.05.2026 को पारित आदेश का कानूनी परिणाम यह है कि संबंधित शिकायतों में आरोपी व्यक्तियों को दोषमुक्त (Acquitted) माना जाएगा। एक बार दोषमुक्ति का प्रभाव लागू हो जाने पर, याचिकाकर्ता भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 या 227 के तहत रिट याचिका दायर करके सीधे इस न्यायालय का दरवाजा नहीं खटखटा सकता। चूंकि याचिकाकर्ता के पास दोषमुक्ति के आदेश के खिलाफ भी BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के प्रावधानों के तहत उपाय उपलब्ध हैं, इसलिए याचिकाकर्ता की ओर से ऐसा कोई उचित कारण नहीं बताया गया कि वह BNSS के तहत उपलब्ध इस उपाय को छोड़कर सीधे इस न्यायालय में क्यों आया है।”

    न्यायालय ने कहा कि भले ही मामले को गलती से वापस लेने के पीछे के कारण वास्तविक हों, फिर भी न्यायालय इस मामले के गुण-दोष (Merits) पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकता। इस पर विचार सक्षम न्यायालय द्वारा ही किया जाना चाहिए, जहां दोषमुक्ति के आदेश के खिलाफ कानूनी उपाय उपलब्ध है।

    तदनुसार, याचिकाओं को खारिज कर दिया गया।

    Case Title : Ugro Capital Ltd. v Khaderam Yadav, and other connected petitions

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