आरोपी की अनुपस्थिति में चालान दाख़िल करने की समय-सीमा बढ़ाना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने आदेश रद्द किया
Praveen Mishra
10 Feb 2026 9:36 PM IST

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि NDPS अधिनियम के तहत चार्जशीट (चालान) दाख़िल करने की समय-सीमा बढ़ाने का आदेश, यदि आरोपी को पेश किए बिना या उसे सुनवाई का अवसर दिए बिना पारित किया जाए, तो यह गंभीर अवैधता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा करने से आरोपी का डिफ़ॉल्ट ज़मानत का अविच्छेद्य (indefeasible) अधिकार छिन जाता है और यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन है।
जस्टिस रुपिंदरजीत चहल ने विशेष अदालत, गुरदासपुर के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें चालान दाख़िल करने की अवधि बढ़ाई गई थी और आरोपियों की डिफ़ॉल्ट ज़मानत की अर्जी खारिज कर दी गई थी। न्यायालय ने कहा कि जब समय-विस्तार सीधे तौर पर आरोपी के डिफ़ॉल्ट ज़मानत के अधिकार को प्रभावित करता है, तो आरोपी की उपस्थिति—भौतिक या वर्चुअल—अनिवार्य सुरक्षा है।
पुरा मामला
याचिकाकर्ताओं को 07.05.2025 को NDPS अधिनियम की धाराओं 22, 25 और 29 के तहत (थाना स्पेशल ऑपरेशन सेल, अमृतसर) गिरफ्तार किया गया था। 08.05.2025 को उन्हें मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया और वे तब से न्यायिक हिरासत में थे।
प्रॉसिक्यूशन 180 दिनों की वैधानिक अवधि में चालान दाख़िल करने में विफल रहा। इस पर आरोपियों ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 187(2) के तहत डिफ़ॉल्ट ज़मानत मांगी। हालांकि, विशेष अदालत ने यह कहते हुए अर्जी खारिज कर दी कि प्रॉसिक्यूशन को पहले ही एक माह का समय-विस्तार मिल चुका है।
पक्षकारों की दलीलें
आरोपियों की ओर से समय संधावलिया ने दलील दी कि 30.10.2025 को समय-विस्तार की अर्जी दी गई और 31.10.2025 को उसे मंज़ूर कर लिया गया, लेकिन आरोपियों को न तो नोटिस दिया गया और न ही उन्हें अदालत में पेश किया गया। चूँकि यह विस्तार सीधे उनके वैधानिक अधिकार को काटता है, इसलिए आदेश अवैध है।
राज्य ने विरोध करते हुए कहा कि अपराध गंभीर है और समय-विस्तार 180 दिनों की अवधि समाप्त होने से पहले माँगा व दिया गया, इसलिए कोई अवैधता नहीं हुई।
हाईकोर्ट की टिप्पणियाँ
हाईकोर्ट ने संविधान पीठ के फ़ैसले Sanjay Dutt v. State through CBI पर भरोसा करते हुए दोहराया कि वैधानिक अवधि समाप्त होते ही डिफ़ॉल्ट ज़मानत का अधिकार उत्पन्न हो जाता है, जब तक कि कानूनन वैध समय-विस्तार न दिया गया हो।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय Jigar v. State of Gujarat का भी हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया कि समय-विस्तार पर विचार करते समय आरोपी की उपस्थिति (भौतिक/वर्चुअल) अनिवार्य है, क्योंकि ऐसा विस्तार आरोपी के अविच्छेद्य अधिकार को प्रभावित करता है।
पीठ ने नोट किया कि समय-विस्तार के आदेश में आरोपियों की उपस्थिति या उनकी आपत्तियों का कोई उल्लेख नहीं है। इसे अदालत ने मात्र प्रक्रियात्मक चूक नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का गंभीर उल्लंघन माना।
आदेश
इन कारणों से, हाईकोर्ट ने 04.11.2025 का विवादित आदेश याचिकाकर्ताओं के संबंध में रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि उन्हें डिफ़ॉल्ट ज़मानत पर रिहा किया जाए, बशर्ते वे संबंधित अदालत की संतुष्टि अनुसार जमानत/ज़मानतदार प्रस्तुत करें।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियाँ मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं मानी जाएँगी।

