समझौते की कई कोशिशें नाकाम होने के बाद पत्नी का साथ रहने का प्रस्ताव पति की तलाक की अर्ज़ी को खारिज नहीं कर सकता: केरल हाईकोर्ट
Shahadat
28 July 2026 8:35 PM IST

केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में एक फैसले में कहा कि अगर पति-पत्नी के बीच सुलह की कई कोशिशें नाकाम हो गई हैं तो सिर्फ़ इसलिए पति को तलाक देने से मना नहीं किया जा सकता कि पत्नी साथ रहने को तैयार है। [2026 LiveLaw (Ker) 406]
जस्टिस जे. निशा भानु और जस्टिस शोभा अन्नामा ईपेन की डिवीज़न बेंच ने पत्नी की अपील खारिज की, जिसमें उसने फैमिली कोर्ट द्वारा पति को दिए गए शादी खत्म करने के आदेश (डिक्री) को चुनौती दी थी।
कोर्ट ने पाया कि पति-पत्नी के बीच सुलह के लिए बातचीत (मीडिएशन) के ज़रिए कई कोशिशें की गईं, लेकिन वे नाकाम रहीं। दोनों पक्षों ने कोर्ट के निर्देश पर KeLSA के फैमिली काउंसलिंग सेंटर में काउंसलिंग में भी हिस्सा लिया।
सेंटर की रिपोर्ट देखने के बाद यह पाया गया कि तलाक का आदेश मिलने के बाद भी दोनों पक्ष एक ही घर में रह रहे थे, लेकिन पति-पत्नी के तौर पर नहीं। पति अपील करने वाली पत्नी को उसी घर में रहने देने के लिए तो तैयार था, लेकिन उसे पत्नी का कानूनी या भावनात्मक दर्जा नहीं देना चाहता।
कोर्ट ने यह भी पाया कि अपील करने वाली पत्नी के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन के अनुसार, शादी का रिश्ता बनाए रखने पर उसका ज़ोर शायद अकेलेपन और परिवार के सहयोग की कमी की वजह से था।
रिकॉर्ड पर मौजूद दलीलों और सबूतों पर दोबारा विचार करने के बाद बेंच ने फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराया और कहा:
“सिर्फ़ यह कहने से कि अपील करने वाली पत्नी प्रतिवादी (पति) के साथ रहने को तैयार है, प्रतिवादी को शादी खत्म करने का आदेश पाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।”
अलग-अलग धर्मों से ताल्लुक रखने वाले दोनों पक्षों को प्यार हुआ और उन्होंने शादी की। उनकी शादी स्पेशल मैरिज एक्ट के प्रावधानों के तहत हुई। शादी से पहले वे एक-दूसरे के धर्म और आस्था का सम्मान करने पर सहमत हुए।
शादी के कई साल बाद पति ने फैमिली कोर्ट में शादी खत्म करने की अर्ज़ी दायर की और आरोप लगाया कि पत्नी ने अपने कर्तव्यों का पालन करने से इनकार किया।
उसके अनुसार, पत्नी/अपीलकर्ता धर्मनिरपेक्ष जीवन जीने के अपने मूल वादे से भटकने लगी थी और उसके प्रति बेमतलब का गुस्सा दिखाती थी। उसने यह भी कहा कि वह उसके धर्म में ज़्यादा दिलचस्पी लेने लगी थी और उसकी भावनात्मक ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ करने लगी थी। यह भी कहा गया कि पत्नी ने बच्चे को जन्म तो दिया, लेकिन उसे अपने बेटे की देखभाल करने में कोई दिलचस्पी नहीं थी।
पति ने आगे कहा कि उसे पत्नी के परिवार वालों की तरफ से परेशान किया जाता था और वह अपने रिश्तेदारों से दूर हो गया। उसने यह भी कहा कि पत्नी ने उस पर अपनी ही माँ के साथ शारीरिक संबंध बनाने का आरोप लगाया।
उसने बताया कि उसने अपनी पत्नी के लिए 25 सॉवरेन सोने के गहने खरीदे थे, लेकिन अपनी शादीशुदा ज़िंदगी में कभी भी उससे दहेज या किसी तरह के आर्थिक योगदान की मांग नहीं की।
पत्नी ने वैवाहिक अधिकारों की बहाली की मांग की और पति की अर्ज़ी में लगाए गए सभी आरोपों से इनकार किया। उसके अनुसार, उसके पास 10 सॉवरेन सोने के गहने थे, जिन्हें पति ने हड़प लिया था, और पति ने उसे कोई सोना नहीं दिया।
पत्नी का कहना था कि उनकी शादी के बारे में उसके परिवार को जानकारी नहीं दी गई और उसने पति के जीवन भर देखभाल करने के वादे पर शादी के लिए सहमति दी थी। उसने कहा कि उसे ही परेशान किया गया, लेकिन फिर भी वह वैवाहिक संबंध बनाए रखने में दिलचस्पी रखती थी।
दोनों पक्षों को सुनने और सबूतों की जांच करने के बाद फैमिली कोर्ट ने शादी खत्म करने का आदेश दिया और वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए पत्नी की अर्ज़ी खारिज की। इससे नाराज़ होकर वह हाईकोर्ट गई।
कोर्ट का मानना था कि सिर्फ़ इसलिए कि पत्नी पति के साथ रहने को तैयार है, शादी खत्म करने से इनकार नहीं किया जा सकता, जब पति अपनी बात पर अड़ा हो कि दोबारा साथ रहना मुमकिन नहीं है।
इसलिए कोर्ट ने पत्नी की अपील खारिज की।
Case Title: A v. B.


