भिखारी पति से पत्नी को गुज़ारा भत्ता नहीं दिलवाया जा सकता: केरल हाईकोर्ट

Praveen Mishra

20 Sept 2025 1:32 PM IST

  • भिखारी पति से पत्नी को गुज़ारा भत्ता नहीं दिलवाया जा सकता: केरल हाईकोर्ट

    केरल हाईकोर्ट ने कहा है कि जो व्यक्ति भिक्षा पर निर्भर है, उसे दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत पत्नी को भरण-पोषण (maintenance) देने का आदेश नहीं दिया जा सकता, भले ही पत्नी उससे गुज़ारा भत्ता की मांग करे।

    जस्टिस पी.वी कुनहीकृष्णन ने पुनरीक्षण याचिका का निपटारा करते हुए फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें याचिकाकर्त्री द्वारा अपने पति से ₹10,000 मासिक गुज़ारा भत्ता मांगने की अर्जी खारिज कर दी गई थी। पति नेत्रहीन है और भिक्षा तथा पड़ोसियों से मिलने वाली कभी-कभार की मदद पर जीवन यापन करता है।

    अदालत ने कहा कि CrPC की धारा 125 के तहत पति की पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी तभी लागू होती है, जब पति अपनी पत्नी का पालन-पोषण करने में सक्षम हो। जब यह तथ्य स्वीकार किया गया है कि पति भिखारी है और उसकी कोई नियमित आय नहीं है, तो इस तरह का आदेश नहीं दिया जा सकता।

    अदालत ने टिप्पणी की:

    “जब पत्नी यह स्वीकार करती है कि उसका पति भिखारी है, तो कोई भी अदालत उसे पत्नी को भरण-पोषण देने का आदेश नहीं दे सकती।”

    राज्य की जिम्मेदारी

    अदालत ने यह भी कहा कि जिस व्यक्ति की जीविका भिक्षा पर आधारित है, उसकी असहाय पत्नी की सुरक्षा राज्य द्वारा उचित उपायों से की जानी चाहिए।

    अदालत ने कहा:

    “हमारे राज्य में भिक्षावृत्ति को मान्यता प्राप्त नहीं है। यह राज्य, समाज और अदालत का कर्तव्य है कि कोई भी व्यक्ति जीविका के लिए भिक्षा न मांगे। राज्य का यह दायित्व है कि कम से कम ऐसे व्यक्ति को भोजन और वस्त्र उपलब्ध कराए। ऐसे व्यक्ति की असहाय पत्नी की भी रक्षा राज्य द्वारा उपयुक्त उपायों से की जानी चाहिए।”

    व्यक्तिगत कानूनों की सीमा और राज्य की भूमिका

    अदालत ने भरण-पोषण के संदर्भ में व्यक्तिगत कानूनों की सीमाओं पर भी विचार किया और कहा कि मुस्लिम समुदाय में बहुपत्नी प्रथा से प्रभावित असहाय पत्नियों की रक्षा करना भी राज्य का कर्तव्य है।

    अदालत ने यह भी कहा:

    “लोकतांत्रिक देश में चुनी हुई सरकार का यह दायित्व है कि उसके नागरिकों को भिक्षा मांगने की नौबत न आए। सरकार हर मामले से अवगत नहीं हो सकती, इसलिए अदालत सरकार को दोष नहीं दे सकती। लेकिन जब कोई मामला अदालत के संज्ञान में आता है, चाहे किसी अन्य संदर्भ में ही क्यों न हो, तब अदालत का कर्तव्य है कि राज्य सरकार के संबंधित विभाग को यह सूचना दे ताकि सरकार कानून के अनुसार ऐसे व्यक्ति की रक्षा कर सके।”

    फैसले का परिणाम

    अदालत ने पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी, फैमिली कोर्ट के निर्णय की पुष्टि की और समाज कल्याण विभाग के सचिव को आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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