पति की सहमति के बिना भी मुस्लिम पत्नी ले सकती है 'खुला': केरल हाईकोर्ट

  • पति की सहमति के बिना भी मुस्लिम पत्नी ले सकती है खुला: केरल हाईकोर्ट

    केरल हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मुस्लिम पत्नी द्वारा विवाह-विच्छेद के लिए 'खुला (Khula)' का सहारा लेने पर पति की सहमति या स्वीकृति आवश्यक नहीं है। कोर्ट ने कहा कि खुला मुस्लिम पत्नी को प्राप्त विवाह-विच्छेद का स्वतंत्र अधिकार है और इसकी वैधता पति की सहमति पर निर्भर नहीं करती।

    जस्टिस जे. निशा बानू और जस्टिस शोबा अन्नम्मा ईपेन की डिवीजन बेंच ने कहा कि 'खुला' पत्नी को उसी प्रकार प्राप्त तलाक का अधिकार है, जिस प्रकार 'तलाक' पति को प्राप्त है।

    कोर्ट ने कहा, “खुला की वैधता पति की स्वीकृति या सहमति पर निर्भर नहीं करती, बल्कि यह पत्नी को विवाह-विच्छेद के लिए उपलब्ध अधिकार है।”

    क्या था मामला?

    पति और पत्नी का विवाह 2023 में मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार हुआ था। इसके बाद पत्नी ने फैमिली कोर्ट में खुला की घोषणा के लिए याचिका दायर की।

    इसके जवाब में पति ने भी याचिका दाखिल कर खुला को अमान्य घोषित करने, हीरे के आभूषण वापस दिलाने और मानसिक पीड़ा के लिए मुआवजा देने की मांग की।

    पति ने फैमिली कोर्ट में यह भी मांग की कि खुला की वैधता के मुद्दे को प्रारंभिक मुद्दे के रूप में तय किया जाए। साथ ही उसने दस्तावेज पेश करने, गवाहों की जांच करने और कार्यवाही को कुछ समय के लिए स्थगित रखने के लिए आवेदन दिए।

    हालांकि, फैमिली कोर्ट ने पति की सभी अर्जियां खारिज कर दीं। इसके बाद पति ने हाईकोर्ट का रुख किया।

    पति की दलील क्या थी?

    पति की ओर से तर्क दिया गया कि फैमिली कोर्ट को उसे साक्ष्य पेश करने का अवसर देना चाहिए था। उसका कहना था कि खुला की घोषणा के मामले में मेहर वापस करने और सुलह की कोशिश जैसे तथ्यों की जांच के लिए साक्ष्य आवश्यक हैं।

    पति ने यह भी दलील दी कि केरल हाईकोर्ट के पूर्व फैसले Asbi K.N. v. Hashim M.U. में खुला के मामलों में विस्तृत जांच की आवश्यकता नहीं बताना सुप्रीम कोर्ट के Shamim Ara और Shayara Bano के फैसलों के विपरीत है।

    सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से अलग है 'खुला' का मुद्दा

    हाईकोर्ट ने पति की इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

    कोर्ट ने कहा कि Shamim Ara और Shayara Bano के फैसले 'तीन तलाक' से संबंधित थे, जबकि वर्तमान मामला 'खुला' से जुड़ा है।

    कोर्ट ने कहा कि खुला के संबंध में कानूनी स्थिति पहले ही Asbi K.N. के मामले में स्पष्ट की जा चुकी है, जिसमें फैमिली कोर्ट को अतिरिक्त-न्यायिक तलाक यानी खुला की वैधता पर विस्तृत न्यायिक जांच से बचने का निर्देश दिया गया था।

    वैध 'खुला' के लिए तीन शर्तें

    कोर्ट ने X & Ors. v. Y & Ors. के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि वैध खुला के लिए मुख्य रूप से तीन शर्तें पूरी होनी चाहिए:

    1. पत्नी द्वारा विवाह समाप्त करने या त्यागने की घोषणा।

    2. मेहर या विवाह के दौरान प्राप्त किसी अन्य भौतिक लाभ को वापस करने की पेशकश।

    3. खुला की घोषणा से पहले प्रभावी सुलह/समझौते का प्रयास।

    कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट को इन तीन आवश्यक शर्तों की पूर्ति तक ही अपनी जांच सीमित रखनी है।

    विस्तृत जांच आवश्यक नहीं

    बेंच ने कहा कि अतिरिक्त-न्यायिक तलाक के समर्थन या उसके अनुमोदन के लिए शुरू की गई कार्यवाही में विस्तृत जांच न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय।

    कोर्ट ने X, Asbi, Sudheer और Muhammed Ashar K. में दिए गए फैसलों का अनुसरण करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेशों को बरकरार रखा और पति की याचिका खारिज कर दी।

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    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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