स्थानीय पुलिस किसी 'शेड्यूल्ड ऑफेंस' की जांच न करे तो ED निजी शिकायत दर्ज नहीं कर सकता: कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा- ED 'सुपर कॉप' नहीं
Shahadat
8 Nov 2026 6:49 PM IST

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) कोई 'सुपर कॉप' नहीं है, जो अपनी जानकारी में आने वाली हर चीज़ की जांच करने लगे। अगर किसी कारण से 'प्रेडिकेट ऑफेंस' (मूल अपराध) ही खारिज हो जाता है तो 'प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट' (PMLA) के तहत कार्यवाही आगे नहीं चल सकती।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर ED द्वारा स्थानीय पुलिस या अधिकारियों के साथ साझा की गई जानकारी पर कोई कार्रवाई नहीं की जाती है तो भी ED के पास PMLA के तहत मजिस्ट्रेट कोर्ट में ऐसी निजी शिकायत दर्ज करने का अधिकार नहीं है, जिसमें किसी 'शेड्यूल्ड ऑफेंस' में शामिल होने के संदेह वाले लोगों के खिलाफ जांच की मांग की गई हो।
जस्टिस एम.आई. अरुण ने कांग्रेस नेता के.वाई. नंजे गौड़ा और अन्य के खिलाफ चल रही मनी लॉन्ड्रिंग की कार्यवाही रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। साथ ही उन्होंने ED को निर्देश दिया कि वह ज़ब्त की गई वस्तुओं को याचिकाकर्ता को वापस कर दे।
बेंच ने कहा,
"ED कोई 'सुपर कॉप' नहीं है, जो अपनी जानकारी में आने वाली हर चीज़ की जांच करने लगे। PMLA की धारा 66(2) के अनुसार, अगर ED को लगता है कि उसके पास कुछ ऐसी सामग्री है, जो किसी 'शेड्यूल्ड ऑफेंस' (निर्धारित अपराध) को दर्शाती है, तो उसे वह सामग्री संबंधित एजेंसी को भेज देनी चाहिए।"
कोर्ट ने आगे कहा:
"यह कानून ED या PMLA के तहत आने वाले अधिकारियों को किसी 'शेड्यूल्ड ऑफेंस' के संबंध में निजी शिकायत दर्ज करने का स्पष्ट अधिकार नहीं देता है। और न ही वे इसके आधार पर, PMLA के प्रावधानों के तहत आरोपी के खिलाफ जांच शुरू कर सकते हैं।"
इसके अलावा, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि PMLA के तहत ED की शक्तियां 'मूल' (Original) नहीं, बल्कि 'व्युत्पन्न' (Derivative - यानी किसी अन्य कानून से प्राप्त) हैं। ED केवल मनी लॉन्ड्रिंग के संदेह के आधार पर खुद से (Suo-Motu) जांच शुरू नहीं कर सकता; अगर 'प्रेडिकेट ऑफेंस' (मूल अपराध) ही मौजूद नहीं है तो PMLA के तहत कार्यवाही भी नहीं चल सकती।
जस्टिस अरुण ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की ज़िम्मेदारी है, केंद्र की नहीं। साथ ही PMLA के तहत ED द्वारा निजी शिकायत दर्ज करने का कोई प्रावधान नहीं है।
कांग्रेस नेता के खिलाफ जमीन घोटाला/नौकरी घोटाला मामला
जब गौड़ा कोलार जिले के मालुर में 'लैंड ग्रांट कमिटी' (भूमि आवंटन समिति) के अध्यक्ष थे, तब उन पर आरोप लगे कि उन्होंने समिति के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर लगभग 38 लोगों को करीब 80 एकड़ जमीन आवंटित करने की सिफारिश की थी। आरोप है कि उन्होंने अपने आधिकारिक पद का दुरुपयोग करते हुए यह काम गैर-कानूनी तरीके से किया।
सोशल एक्टिविस्ट के.सी. राजन्ना ने 2022 में बैंगलोर के मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के सामने गौड़ा और अन्य लोगों के खिलाफ निजी शिकायत दर्ज कराई। इसके आधार पर भारतीय दंड संहिता (IPC), 1860 की धाराओं 468, 464, 465, 471, 420 और 120B के तहत मामला दर्ज किया गया। इसके बाद गौड़ा को कोलार और चिक्काबल्लापुर मिल्क यूनियन लिमिटेड (जिसे आगे 'KOMUL' कहा गया) का अध्यक्ष नियुक्त किया गया।
मामला दर्ज होने के बाद प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने इसे 'प्रेडिकेट ऑफेंस' (मूल अपराध) मानते हुए जांच शुरू की और 2023 में शिकायत दर्ज की। अपनी जांच के दौरान, ED को कुछ ऐसे सबूत मिले जिनसे पता चला कि KOMUL में कर्मचारियों की भर्ती में घोटाला हुआ—इसे 'नौकरी घोटाला मामला' (Job scam case) कहा गया।
PMLA Act की धारा 66(2) के तहत ED ने नौकरी घोटाले से जुड़ी जानकारी स्थानीय पुलिस के साथ साझा की। इस बीच जमीन घोटाले का मामला 'नॉन-प्रॉसिक्यूशन' (मुकदमा न चलाए जाने) के कारण खारिज हो गया। वहीं, स्थानीय पुलिस ने नौकरी घोटाले के मामले में ED द्वारा दी गई जानकारी पर कोई कार्रवाई करना उचित नहीं समझा।
इसके बाद 2024 में ED ने एक निजी शिकायत दायर की। इसमें मांग की गई कि 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम' (Prevention of Corruption Act) के तहत अपराधों की जांच के लिए इस मामले (नौकरी घोटाला मामला) को लोकायुक्त पुलिस को सौंप दिया जाए।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि एक बार जब 'प्रेडिकेट ऑफेंस' (मूल अपराध) बंद हो जाता है—चाहे वह मेरिट के आधार पर हो या तकनीकी कारणों से—तो ED, PMLA के प्रावधानों के तहत जांच जारी नहीं रख सकता। इसके अलावा, ED के पास केवल संबंधित पुलिस/प्राधिकरण के साथ जानकारी साझा करने का अधिकार है; उसे कोई निजी शिकायत दर्ज करने या इस आधार पर जांच शुरू करने का अधिकार नहीं है कि आरोपी को अपराध से प्राप्त आय से लाभ हुआ है।
एजेंसी ने इस दलील का खंडन करते हुए कहा कि एक बार जब जांच किसी विशेष अपराध की मौजूदगी के आधार पर शुरू की जाती है और उसे तकनीकी आधार पर बंद कर दिया जाता है, न कि योग्यता के आधार पर, तब भी ईडी को पीएमएलए के प्रावधानों के तहत मनी लॉन्ड्रिंग के अपराध की जांच करने का अधिकार है।
इसके अलावा, जब संबंधित प्राधिकारी PMLA की धारा 66(2) के तहत प्राप्त जानकारी पर कार्रवाई नहीं करता है तो उस स्थिति में किसी भी व्यक्ति को आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का अधिकार दिया जाता है।
न्यायालय के निष्कर्ष:
पीठ ने सबसे पहले विजय मदनलाल चौधरी और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया, जिसमें कहा कि 'अपराध की आय' के अस्तित्व या अपराध की आय के माध्यम से प्राप्त धन की लॉन्ड्रिंग के बारे में जांच या जांच केवल तभी की जा सकती है, जब किसी विधेय अपराध का पूर्व-अस्तित्व हो, अन्यथा नहीं।
PMLA के तहत ED की भूमिका तभी शुरू होती है, जब प्राथमिक कानून प्रवर्तन एजेंसी अनुसूचित/अनुसूचित अपराध के संबंध में FIR या औपचारिक आपराधिक शिकायत दर्ज करती है।
आगे कहा गया,
"वर्तमान मामले में माना जाता है कि भूमि घोटाला मामले के संबंध में दायर निजी शिकायत को सक्षम प्राधिकारी से मंजूरी के अभाव में बंद कर दिया गया। इस प्रकार, मामले के दिए गए तथ्यों और परिस्थितियों के तहत भूमि घोटाला मामले में कथित अनुसूचित अपराधों से प्राप्त अपराध की आय के अस्तित्व की जांच या पूछताछ जारी रखने वाली ईडी की कार्रवाई को बरकरार नहीं रखा जा सकता है।"
इसी तरह नौकरी घोटाला मामले में जांच के लिए ED द्वारा निजी शिकायत दायर करने के संबंध में अदालत ने कहा,
"हमारा संविधान सरकार के विभिन्न अंगों के बीच शक्तियों को अलग करने की परिकल्पना करता है। इसका कारण यह है कि देश में एक संस्था सर्वोच्च नहीं हो जाती है, ताकि वह उसे दी गई शक्तियों का दुरुपयोग करने की स्थिति में हो। कानून जांच और संतुलन की आवश्यकताओं को पहचानता है।"
जिसके बाद यह माना गया:
"ED किसी अन्य व्यक्ति की तरह BNSS की धारा 200 सीआर.पी.सी./223 के तहत शिकायत दर्ज करने के लिए उपयुक्त नहीं है। PMLA के तहत ईडी द्वारा निजी शिकायतें दर्ज करने पर विचार नहीं किया जाता।"
इसमें कहा गया:
"ED को निजी शिकायत को प्राथमिकता देने की अनुमति देना, जब अन्य सरकारी अधिकारी किसी के खिलाफ कोई कार्यवाही शुरू करना अनुचित मानते हैं तो ED को एक सुपर पुलिस के रूप में कार्य करने की अनुमति देने के समान होगा और यह अधिनियम के दर्शन के खिलाफ जाता है।"
तदनुसार, इसने कई याचिकाओं को अनुमति दी।
Case Title : Y.B. ASHWATHANARAYAN AND Union of India & ANR

