'हम आर्टिकल 21 के दौर में जी रहे हैं': झारखंड हाईकोर्ट ने बरी होने के बाद भी महिला को हिरासत में रखने पर सवाल उठाए
Shahadat
7 Oct 2026 6:47 PM IST

झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की आज़ादी को कानून के अधिकार के बिना छीना नहीं जा सकता और एक आपराधिक मामले में बरी होने के बावजूद एक महिला को हिरासत में रखे जाने पर सवाल उठाए।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अखिल कुमार की डिवीज़न बेंच संविधान के आर्टिकल 226 के तहत दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में रीना देवी को कोर्ट के सामने पेश करने की मांग की गई ताकि उनकी हिरासत की कानूनी वैधता और उसे जारी रखने की न्यायिक समीक्षा की जा सके।
यह याचिका जेल में बंद कैदियों से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता ने दायर की थी। इसमें कहा गया कि लोहसिंघना पी.एस. केस नंबर 88/2025 से जुड़े जी.आर. केस नंबर 1647/2025 में बरी होने के बावजूद, हिरासत में ली गई महिला को हिरासत में ही रखा गया।
याचिकाकर्ता ने आगे कहा कि हिरासत में ली गई महिला के साथ कथित तौर पर दो साल तक लगातार एक कॉन्स्टेबल रंजीत महतो ने रेप किया और इस संबंध में शिकायत भी की गई।
आरोपों की गंभीरता देखते हुए कोर्ट ने झारखंड राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण (JHALSA) के सदस्य सचिव को निर्देश दिया कि वे हजारीबाग के जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण (DLSA) के सचिव से जांच करवाएं और रिपोर्ट सौंपें।
JHALSA के सदस्य सचिव वर्चुअल माध्यम से पेश हुए और कोर्ट को बताया कि हजारीबाग DLSA के सचिव अपनी टीम के साथ जांच करने और हिरासत में ली गई महिला का बयान दर्ज करने गए।
कोर्ट ने रेप के आरोप के संबंध में हजारीबाग के पुलिस अधीक्षक (SP) को भी वर्चुअल माध्यम से पेश होने के लिए कहा। SP कोर्ट के सामने पेश हुए और कहा कि रंजीत महतो के कथित दुर्व्यवहार की गहन जांच तुरंत की जाएगी।
कोर्ट ने अधिकारियों से विशेष रूप से सवाल किया कि किस कानूनी अधिकार के तहत हिरासत में ली गई महिला को बरी होने के बाद भी हिरासत में रखा जा रहा है और क्या उसे जेल के अंदर रखा जा रहा है या किसी डिटेंशन सेंटर में।
कोर्ट ने कहा:
“हम भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के दौर में जी रहे हैं और इंसानों को मिली जन्मजात आज़ादी को कानून के अधिकार के बिना छीना नहीं जा सकता।”
01.10.2026 के अपने आदेश में कोर्ट ने देखा कि मामले की सुनवाई पहली बार हो रही थी, इसलिए कार्यवाही स्थगित की और निर्देश दिया कि इसे 05.10.2026 को पहले मामले के तौर पर लिस्ट किया जाए। हालाँकि, उस तारीख के लिए कोई आदेश अपलोड नहीं किया गया।
Case Title : Apurva Vivek v. Union of India and Ors

