हर चुनावी चूक 'भ्रष्ट आचरण' नहीं होती: झारखंड हाईकोर्ट ने सिंदरी से चंद्रदेव महतो का चुनाव बरकरार रखा
Praveen Mishra
6 Feb 2026 4:25 PM IST

झारखंड हाईकोर्ट ने 3 फरवरी 2026 को सिंदरी विधानसभा क्षेत्र (38) से निर्वाचित चन्द्रदेव महतो चुनाव को बरकरार रखते हुए कहा कि चुनावी अभियान में हर तरह की विसंगति मात्र से 'भ्रष्ट आचरण' सिद्ध नहीं होता, जब तक यह साबित न किया जाए कि वह मतदाताओं को गुमराह कर अन्य प्रत्याशियों की संभावनाओं को वास्तविक रूप से प्रभावित करने के लिए की गई हो।
एकल पीठ में जस्टिस गौतम कुमार चौधरी ने यह फैसला जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत दायर चुनाव याचिका पर सुनाते हुए दिया। याचिका में अक्टूबर–नवंबर 2024 के झारखंड विधानसभा चुनाव में निर्वाचित प्रत्याशी के चुनाव को चुनौती दी गई थी।
चुनाव परिणाम के अनुसार, निर्वाचित प्रत्याशी को 1,05,136 वोट, जबकि उपविजेता Bharatiya Janata Party प्रत्याशी को 1,01,688 वोट मिले थे। याचिकाकर्ता, जो All India Forward Bloc के आधिकारिक उम्मीदवार थे, को 737 वोट प्राप्त हुए थे।
याचिकाकर्ता ने चार मुख्य आरोप लगाए—
₹10,000 की जमानत राशि धारा 34(2) के अनुसार रिटर्निंग ऑफिसर/सरकारी कोष में न देकर नाजिर के पास जमा की गई।
नामांकन के साथ दायर शपथपत्र पर निर्धारित स्टांप नहीं लगे थे।
प्रचार सामग्री में पार्टी नाम से “Liberation” शब्द हटाकर मतदाताओं को गुमराह किया गया।
लंबित आपराधिक मामलों के प्रकाशन की शर्तों का पालन नहीं हुआ।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी चुनाव को अमान्य ठहराने के लिए धारा 100 में निर्दिष्ट आधारों का कड़ाई से पालन आवश्यक है, और याचिकाकर्ता को यह भी स्थापित करना होता है कि कथित उल्लंघन ने चुनाव परिणाम को भौतिक रूप से प्रभावित किया या भ्रष्ट आचरण की श्रेणी में आता है।
जमानत राशि के मुद्दे पर कोर्ट ने कहा कि राशि जमा होने से इनकार नहीं है; केवल जमा करने के तरीके पर आपत्ति “परिधीय/गौण” है और इससे चुनाव अमान्य नहीं हो सकता।
स्टांप की कमी को कोर्ट ने “तुच्छ/हल्की” आपत्ति बताते हुए कहा कि यह नोटरी की त्रुटि हो सकती है, जिसके लिए प्रत्याशी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
“Liberation” शब्द के अभाव पर कोर्ट ने कहा कि यह omission किसी भी तरह से मतदाताओं को गुमराह कर याचिकाकर्ता को नुकसान पहुँचाने वाला नहीं दिखता। कोर्ट ने दो टूक कहा कि हर विसंगति स्वतः भ्रष्ट आचरण नहीं बनती; इसके लिए यह दिखाना होगा कि वह मतदाताओं को भटकाकर अन्य प्रत्याशियों की संभावनाओं को प्रभावित करने के उद्देश्य से की गई हो।
अख़बार में कथित भ्रामक प्रकाशन के आरोप पर भी कोर्ट ने पाया कि याचिका में यह दिखाने का कोई ठोस कथन नहीं है कि निर्वाचित प्रत्याशी को वास्तव में किसी अपराध में दोषसिद्ध ठहराया गया था।
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिका में कारण-ए-दावा (cause of action) का अभाव है और न तो शपथपत्र पर झूठे कथन, न किसी भ्रष्ट आचरण, न ही प्रत्याशी/एजेंट की सहमति से कोई अवैध कृत्य प्रथम दृष्टया स्थापित होता है।
नतीजतन, चुनाव याचिका प्रारंभिक चरण में ही खारिज कर दी गई और याचिकाकर्ता पर ₹50,000 का जुर्माना (लागत) लगाया गया।

