पत्नी पर अपने विवाहेत्तर संबंध स्वीकार करने और 'प्रेमिका' के साथ 'छोटी बहन' की तरह रहने का दबाव डाल रहा था पति, झारखंड हाईकोर्ट ने तलाक की अर्जी मंजूरी की

  • पत्नी पर अपने विवाहेत्तर संबंध स्वीकार करने और प्रेमिका के साथ छोटी बहन की तरह रहने का दबाव डाल रहा था पति, झारखंड हाईकोर्ट ने तलाक की अर्जी मंजूरी की

    झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई पति अपनी पत्नी पर यह दबाव डालता है कि वह उसके विवाहेतर संबंध (Extramarital Relationship) को स्वीकार करे और उस महिला के साथ 'छोटी बहन' बनकर रहे, जिसके साथ उसके संबंध हैं, तो यह सबसे गंभीर किस्म की मानसिक क्रूरता है। अदालत ने पत्नी की अपील स्वीकार की, जिसमें उसने अपनी तलाक की याचिका खारिज किए जाने को चुनौती दी थी, और क्रूरता के आधार पर शादी को खत्म कर दिया।

    जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने कहा कि विवाह आपसी विश्वास और सम्मान पर टिका होता है। यदि कोई विवाहेतर संबंध इस विश्वास को ही खत्म कर दे, तो पति-पत्नी का एक साथ रहना असंभव हो जाता है।

    अदालत, हजारीबाग के फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज द्वारा 17 नवंबर, 2023 को दिए गए उस फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें पत्नी की तलाक की याचिका खारिज की थी। पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(i-a) के तहत क्रूरता के आधार पर तलाक मांगा था। दोनों पक्ष पेशे से डॉक्टर हैं। उनकी शादी 24 फरवरी, 2018 को हुई थी और बाद में वे धनबाद में साथ रहने लगे। पति टुंडी के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में कार्यरत है, जबकि पत्नी 'भारत कोकिंग कोल लिमिटेड' (BCCL) में काम करती है। 5 सितंबर, 2019 से वे अलग-अलग रह रहे हैं।

    पत्नी का आरोप है कि उसके पति के 'मौसमी घोष' उर्फ ​​'जूली' नाम की विधवा के साथ अवैध संबंध है। पत्नी के विरोध करने और परिवार के सदस्यों के हस्तक्षेप के बाद पति ने कथित तौर पर एक बॉन्ड पर हस्ताक्षर किए, जिसमें उसने वादा किया कि वह ऐसा व्यवहार दोबारा नहीं करेगा। हालांकि, पत्नी के अनुसार, इस आश्वासन के बावजूद संबंध जारी रहे।

    पत्नी ने यह भी आरोप लगाया कि उसके पति ने घर के सामानों (जैसे बर्तन या अन्य चीजें) से उसे कई बार बुरी तरह पीटा, जिसके कारण उसे स्लिप-डिस्क और ट्रॉमेटिक ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी स्वास्थ्य समस्याएं हो गईं। पति ने जनवरी 2022 में वैवाहिक अधिकारों की बहाली (Restitution of Conjugal Rights) के लिए कानूनी कार्यवाही शुरू की थी, जिस पर जनवरी 2023 में एकतरफा (ex parte) फैसला सुना दिया गया। इसी बीच, पत्नी ने अप्रैल 2022 में तलाक की अर्जी दाखिल की, जिसे बाद में फैमिली कोर्ट ने खारिज किया।

    पत्नी की गवाही की जांच करने पर हाईकोर्ट ने पाया कि उनके वैवाहिक जीवन में लगातार क्रूरता होती रही थी। कोर्ट ने गौर किया कि पति ने पत्नी के साथ शारीरिक मारपीट की थी। साथ ही परिवार के हस्तक्षेप और इस रिश्ते को खत्म करने के आश्वासन के बावजूद, पति का किसी अन्य महिला के साथ अवैध संबंध (Extramarital Relationship) जारी रहा। अहम बात यह है कि कोर्ट ने पति की इस जिद को भी संज्ञान में लिया, जिसमें वह चाहता था कि उसकी पत्नी मौसमी घोष के साथ उसके रिश्ते को स्वीकार कर ले और उसके साथ एक "छोटी बहन" की तरह रहे।

    कोर्ट ने टिप्पणी की:

    "याचिकाकर्ता (पत्नी) की गवाही से साबित होता है कि 'गौना' रस्म के तुरंत बाद ही, प्रतिवादी (पति) ने उसके साथ बुरा बर्ताव करना शुरू कर दिया। उसने धनबाद में पत्नी के साथ रहने से इनकार कर दिया और बाद में घर के सामानों से उसके साथ बार-बार मारपीट की। इसके कारण उसे स्लिप-डिस्क और ट्रॉमेटिक ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो गईं। उसके सबूतों से यह भी पता चलता है कि प्रतिवादी का एक विधवा, मौसमी घोष उर्फ ​​जूली के साथ अवैध संबंध था। परिवार के दखल और लिखित आश्वासन (Bond of Assurance) के बावजूद, यह रिश्ता लगातार चलता रहा। प्रतिवादी की यह जिद कि पत्नी इस रिश्ते को स्वीकार करे और मौसमी घोष के साथ 'छोटी बहन' की तरह रहे, अत्यंत गंभीर मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आती है।"

    बेंच ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने सबूतों को समग्र रूप से (पूरी तरह से) नहीं समझा, बल्कि उन्हें टुकड़ों-टुकड़ों में देखा। कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने वैवाहिक मामलों में लागू होने वाले 'संभावनाओं की प्रबलता' (Preponderance of Probabilities) के सिद्धांत को नजरअंदाज किया, जबकि पेश किए गए दस्तावेजों और सबूतों से साफ तौर पर क्रूरता का पता चलता था।

    हाईकोर्ट ने यह भी गौर किया कि दोनों पक्ष 2019 से ही अलग-अलग रह रहे थे। 'समर घोष बनाम जया घोष' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक अलग रहना भी अपने आप में मानसिक क्रूरता हो सकता है।

    बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि अवैध संबंध बनाए रखने के पति के बर्ताव ने मानसिक क्रूरता पैदा की और पत्नी को अपना वैवाहिक घर छोड़ने के लिए मजबूर किया, क्योंकि शादी में भरोसे की नींव पहले ही खत्म हो चुकी थी।

    अदालत ने टिप्पणी की:

    “पति-पत्नी का रिश्ता एक-दूसरे के प्रति भरोसे और सम्मान पर टिका होता है। अगर यह भरोसा टूट जाए तो इसे ठीक नहीं किया जा सकता, क्योंकि भरोसा ही शादी की नींव है। शादी आपसी विश्वास, साथ और साझा अनुभवों पर बना एक रिश्ता है।”

    इसके अनुसार, हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा क्रूरता (Cruelty) के आकलन को गलत माना। हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट पति के बर्ताव और उसके सामने पेश किए गए सबूतों के कुल असर पर विचार करने में विफल रहा।

    पत्नी की अपील स्वीकार करते हुए हाई कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत तलाक की डिक्री जारी की और 24 फरवरी, 2018 को हुई इस शादी को खत्म किया।

    Case Title : SK v. RK

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